प्रेतशिला की खास परंपरा: पिंडदान के बाद ठहाका लगाते हैं श्रद्धालु, सत्तू अर्पितकर आत्माओं की तृप्ति की मान्यता
गयाजी के विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले में प्रेतशिला पिंडवेदी पर अकाल मृत्यु को प्राप्त पूर्वजों की मुक्ति के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां पिंडदान से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। प्रेतशिला की चोटी पर ब्रह्मा के चरणचिह्न और तीन स्वर्ण रेखाओं की मान्यता के साथ यहां सत्तू अर्पित करने और पिंडदान के बाद ठहाका लगाने की अनोखी परंपरा भी है।
विस्तार
विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला महासंगम के दौरान गयाजी की 45 पिंडवेदियों में प्रेतशिला सबसे रहस्यमयी और आस्था का प्रमुख केंद्र मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि यहां अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों के लिए पिंडदान करने से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु प्रेतशिला पहुंचकर अपने पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। यहां की परंपराएं भी अन्य वेदियों से अलग हैं। पिंडदान के बाद श्रद्धालु सत्तू अर्पित करते हैं, ठहाका लगाते हैं और ब्रह्मा के चरणचिह्नों का दर्शन कर पूर्वजों की मुक्ति की कामना करते हैं।
प्रतिपदा पर विशेष महत्व, ब्रह्मकुंड से शुरू होती है पूजा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा के दिन प्रेतशिला वेदी का विशेष महत्व होता है। श्रद्धालु सबसे पहले पर्वत की तलहटी में स्थित ब्रह्मकुंड में स्नान और तर्पण करते हैं। इसके बाद करीब 975 फीट ऊंचे प्रेतशिला पर्वत पर चढ़कर विधि-विधान से पिंडदान किया जाता है। यह पूरा कर्मकांड पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किया जाता है।
अकाल मृत्यु वालों की मुक्ति का प्रमुख तीर्थ
गयाजी शहर से लगभग आठ से दस किलोमीटर दूर स्थित प्रेतशिला को पंचतीर्थों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि दुर्घटना, डूबने, आग लगने, विषपान, प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य असामान्य परिस्थितियों में जिन लोगों की मृत्यु हुई हो, उनके लिए यहां पिंडदान करने से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
श्रीराम के स्पर्श से मिला प्रेतशिला नाम
लोकमान्यता के मुताबिक, प्राचीन काल में इस स्थान को प्रेत पर्वत कहा जाता था। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम अपने पिता महाराजा दशरथ का श्राद्ध करने गयाजी आए, तब उनके स्पर्श से यह स्थान प्रेतशिला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तभी से इसे मोक्षदायिनी वेदी के रूप में पूजा जाता है।
पिंडदान के बाद सत्तू अर्पित करने की अनोखी परंपरा
प्रेतशिला की सबसे अलग परंपराओं में से एक है मुख्य शिला की दरारों में सत्तू अर्पित करना। श्रद्धालु जौ, चना सहित सात प्रकार के अनाज से बने सत्तू को अर्पित करते हैं। धार्मिक विश्वास है कि इससे अतृप्त आत्माओं की तृप्ति होती है और उन्हें शांति मिलती है। वर्षों से यह परंपरा श्रद्धापूर्वक निभाई जा रही है।
पिंडदान के बाद क्यों लगाते हैं ठहाका?
प्रेतशिला की सबसे अनोखी परंपरा पिंडदान के बाद ठहाका लगाना है। मान्यता है कि यह शोक नहीं, बल्कि पूर्वजों के मोक्ष और आनंद का प्रतीक है। श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि पिंडदान के बाद उनके पूर्वज भगवान विष्णु के चरणों में स्थान प्राप्त करते हैं, इसलिए प्रसन्नता प्रकट करने के लिए जोर से हंसते हैं। यह परंपरा केवल प्रेतशिला की विशेष पहचान मानी जाती है।
ब्रह्मा के चरणचिह्न और तीन स्वर्ण रेखाओं की मान्यता
प्रेतशिला की चोटी पर भगवान ब्रह्मा के चरणचिह्न होने की धार्मिक मान्यता है। यहां तीन स्वर्ण रेखाओं का भी उल्लेख स्थानीय परंपराओं में मिलता है। श्रद्धालु इन्हें दिव्यता का प्रतीक मानकर नमन करते हैं। कहा जाता है कि सतयुग में यह पूरा पर्वत स्वर्ण का था, जो युग परिवर्तन के साथ पत्थर का हो गया।
पुराने वस्त्र बांधने की भी है परंपरा
कर्मकांड पूरा होने के बाद कई श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनों की स्मृति में उनके पुराने कपड़े या कोई निजी वस्तु यहां स्थित एक विशेष पेड़ पर बांधते हैं। इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक माना जाता है। पुजारी सूर्यकांत मिश्रा ने बताया कि प्रेतशिला पंचतीर्थों में शामिल है और यहां आना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
उनके अनुसार, ब्रह्मा जी ने ब्रह्म सरोवर में स्नान कर यहां पिंडदान किया था। उन्होंने कहा कि सात प्रकार के अनाज से बना सत्तू अर्पित करने की परंपरा आत्माओं की तृप्ति का प्रतीक है। पिंडदान के बाद लगाया जाने वाला ठहाका इस विश्वास का प्रतीक है कि पूर्वजों को भगवान विष्णु के चरणों में स्थान मिल गया है।
पुजारी धर्मेंद्र गीरी ने बताया कि प्रेतशिला की चोटी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान है और पिंडदान के साक्षी स्वयं भगवान विष्णु होते हैं। उन्होंने बताया कि पर्वत पर ब्रह्मा जी के चरणचिह्न और तीन स्वर्ण रेखाओं की मान्यता है तथा यहां पिंडदान करने से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है।
वहीं, गयावाल पंडा मनोज धामी ने बताया कि पंचतीर्थों में ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला और कागबली सहित प्रमुख स्थलों का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि आग, दुर्घटना, विषपान, प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य असामान्य परिस्थितियों में जिन लोगों की मृत्यु होती है, उनके लिए प्रेतशिला पर पिंडदान का विशेष विधान है।
देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु
दिल्ली से आए पिंडदानी अजय कुमार ने बताया कि वह पत्नी के साथ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और प्रेत योनि से मुक्ति की कामना लेकर प्रेतशिला पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि यहां भगवान ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवताओं का वास होने की मान्यता है। नेपाल से आए दयाल राय ने बताया कि हाल की आपदा में जान गंवाने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए वे प्रेतशिला पर पिंडदान करने आए हैं। पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनकी आंखें नम हो गईं।
जम्मू-कश्मीर से आए विशन दास ने बताया कि माता-पिता, पुत्र और पुत्री के लिए पिंडदान करने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो उनके परिजनों को भगवान विष्णु के चरणों में स्थान मिल गया हो। वहीं, श्रद्धालु मीणा देवी ने बताया कि वह अपने माता-पिता और सास-ससुर की आत्मा की शांति तथा अकाल मृत्यु को प्राप्त परिजनों की मुक्ति की कामना लेकर प्रेतशिला आई हैं।
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आस्था के साथ लोकविश्वास भी
प्रेतशिला से जुड़ी कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह मान्यता है कि रात के समय इस पर्वत पर कोई नहीं रुकता। हालांकि, ये धार्मिक और लोकविश्वास पर आधारित मान्यताएं हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद पितृपक्ष मेले के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था प्रेतशिला को गयाजी के सबसे महत्वपूर्ण मोक्ष तीर्थों में शामिल करती है।