जब कोर्ट ने पूछा, 'राम ने सीता को जंगल भेजा तो सजा किसे दें?'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार की सीतामढ़ी अदालत में सोमवार को माता सीता का परित्याग करने के मामले में भगवान राम के खिलाफ याचिका पर सुनवाई हुई। हालांकि बहुत सोच-विचार के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।
आरोपियों की गैर मौजूदगी और गवाहों की कमी के कारण राम को कोर्ट से राहत तो मिल गई, लेकिन याचिकाकर्ता की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।
सोमवार को विभिन्न संगठनों ने उन पर करीब आधा दर्जन मुकदमा दर्ज करा दिए हैं, जबकि सीतामढ़ी बार एसोसिएशन में याचिकाकर्ता वकील का लाइसेंस रद्द करने की मांग की है।
याचिकाकर्ता के लिए पैदा हुई मुश्किल
सोमवार की सुबह खचाखच भरी अदालत में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रामबिहारी के सामने याचिकाकर्ता ठाकुर चंदन सिंह ने दलील देनी शुरू की।
उन्होंने कहा कि मैंने सीता को न्याय दिलाने के लिए अर्जी लगाई है। मिथिला की बेटी सीता का कोई कसूर नहीं था, इसके बावजूद राजा राम ने उन्हें जंगल में क्यों भेजा। कोई पुरुष अपनी पत्नी को कैसे इतनी बड़ी सजा दे सकता है। राजा राम ने यह सोचा भी नहीं कि घनघोर जंगल में अकेली महिला कैसे रहेगी।
जवाब में जज ने पूछा, 'त्रेतायुग की घटना को लेकर आपने याचिका क्यों दायर की। इस घटना के लिए किसे सजा दिलाएंगे और कौन गवाही देगा। आपने केस में यह भी नहीं बताया है कि राम ने सीता को किस दिन घर से निकाला था और केस में दर्ज विवरण का आधार क्या है।'
मामले में दर्ज विवरण का कोई आधार नहीं है: कोर्ट
इस पर वकील चंदन ने कहा कि मैंने सीता को न्याय दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। मैं अदालत से केवल सीता के लिए न्याय की भीख मांगता हूं। आप और हम, सब लोग राम, सीता और रामायण को एक दस्तावेज मानते हैं। मैंने अपने केस में रामायण की घटनाओं का विवरण दिया है।
चंदन सिंह ने तर्क दिया कि जब राजा राम ने सीता के साथ न्याय नहीं किया, तो इस कलियुग में महिलाओं को कैसे न्याय मिलेगा। अगर सीता को न्याय मिलता है, तो ब्रह्मांड की सारी महिलाओं को न्याय मिलेगा। वकील की दलील सुनने के बाद जज सोच में पड़ गए।
उन्होंने कहा कि मामले पर फैसला बाद में होगा। इसके बाद शाम को जब अदालत लगी, तो न्यायाधीश ने मामले को खारिज कर दिया। न्यायाधीश ने कहा कि मामले में दर्ज विवरण का कोई आधार नहीं है।