ये है वो, जिसकी तकदीर बिल गेट्स भी नहीं बदल पाए
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बिहार की जिस बच्ची को गोद में लेकर माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और उनकी अपनी पत्नी ने फोटो खिंचवाई थी, उसकी हालत आज भी नहीं बदली है।
बच्ची रानी की मां रुंती देवी कहती हैं, “गांव में सब हंसी उड़ाते हैं। कहते हैं बड़का आदमी आया फिर भी ठन ठन गोपाल रह गईं। बरसात में इंदिरा आवास से पानी चूता है। चिमकी (पन्नी) डालकर, बच्चों को कोने में खड़ा करके रात गुजारते हैं।”
पटना से सटे दानापुर के जमसौत मुसहरी की 35 साल की रुंती देवी बिल गेट्स की उसी यात्रा के दौरान सुर्खियों में आई थीं। वह बताती हैं उस दिन वे खेत पर मजदूरी करने गई
थीं, अचानक उन्हें घर बुलाया गया। घर पर देखा कि एक गोरी मेम और साहेब कुछ महीनों की बेटी रानी को गोद में लिए बैठे हैं। रुंती बताती हैं, “वो लोग अंग्रेजी में बोलते थे और एक हिंदी बोलने वाले हम लोगों को हिंदी में बताते थे। रानी के साथ उन्होंने फोटो खिंचवाई, बात की और चले गए।”
बिल गेट्स आए थे जमसौत
बिल गेट्स फांउडेशन और बिहार सरकार के बीच 2010 में स्वास्थ्य सुधार को लेकर एक समझौता हुआ था। इसी के सिलसिले में बिल गेट्स और उनकी पत्नी मिलिंडा गेट्स 2011 में जमसौत आए थे।
समझौते के तहत स्वास्थ्य के विभिन्न मापदंडों मसलन मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं आदि के बीच काम होना था।
गांव वाले कहते हैं कि जब रानी को बिल गेट्स ने अपनी गोद में लिया था तो बड़ी उम्मीद जगी थी। लेकिन उस उम्मीद को नाउम्मीदी में बदलते ज़्यादा देर नहीं लगी। रानी अब 4 साल की हो गई हैं। वह बगल के आंगनबाड़ी केंद्र में कभी कभार जाती हैं।
उनके बड़े भाई का नाम नीतीश कुमार हैं। वह ज़्यादा देर खड़ा नहीं रह पाते। उनकी आंखें पीली पड़ रही हैं और डॉक्टर ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करने का सुझाव दिया है। रुंती अपनी मजबूरियां गिनाती हैं, “खाने को पैसा जुटता नहीं, हम इलाज कहां से कराएं।”
अभाव की जिंदगी
रानी के पिता साजन मांझी मजदूर हैं। उन्हें काम कभी कभार ही मिलता है। इसलिए घर परिवार चलाना बहुत मुश्किल है। गांव का स्वास्थ्य उपकेंद्र बंद पड़ा है। यहां स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों का बुरा हाल है। वीरेंद्र ने यहां के स्वास्थ्य उपकेंद्र में इलाज़ करवाया था लेकिन उनका पांव टेढ़ा हो गया।
वह बताते हैं, “यहां कोई दवा नहीं मिलती। एक महिला डॉक्टर हैं जो भी कभी-कभी आती हैं। मेरे पांव का मलहम यहां नहीं मिला। प्राइवेट इलाज कराया। एक बार सिरदर्द की दवा यहां से लेकर खाई तो बीमार हो गया।”सरकारी स्कूल की भी यही हालत है। दो कमरों में पांचवीं तक की पढ़ाई होती है।
बच्चे इन्हीं कमरों में ठुंसे रहते हैं। गांव की फुलवंती देवी बताती हैं, “मास्टर सब अपना किस्सा कहने में लगे रहते हैं और बच्चा सब यहां वहां घूमता रहता है।” गांव का आंगनबाड़ी केंद्र छोटे से अंधेरे कमरे में चल रहा है, जहां गर्मी के मौसम में बच्चों को और मुश्किल हो जाती है।
केयर का दावा
बिल गेट्स फाउंडेशन और बिहार सरकार के स्वास्थ्य को लेकर हुए समझौते को लागू करने में तकनीकी सहयोग केयर इंडिया दे रही है। केयर के तकनीकी निदेशक श्रीधर श्रीकांतिया कहते हैं, “केयर 38 जिलों में स्वास्थ्य को लेकर काम कर रही है। हम मानते हैं कि सुधार हुआ है लेकिन फिर भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।”
हालांकि इस इलाके में बीते 21 साल से काम कर रही सुधा वर्गीज कहती हैं, “21 साल से जो लड़ाई हम लड़ रहे हैं उसके बाद इन महादलितों को इंदिरा आवास मिला, लेकिन बाकी उनको क्या मिला। स्कूल में पढ़ाई नहीं, शौचालय नहीं, डॉक्टर के पास दवा नहीं।”