शराबबंदीः कैसे कैसे थे साइड इफेक्ट, कोई साबुन खा गया तो कोई निगल गया थिनर की बोतल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार में शराबबंदी का कानून आखिरकार हाइकोर्ट ने रद्द कर दिया। इसके साथ ही बिहार के सुरा प्रेमियों का छह महीने लंबा इंतजार भी खत्म हो गया। बिहार में एक अप्रैल से नीतीश सरकार ने अपनी चुनावी वादे के अनुरूप शराबबंदी की घोषणा की थी।
नीतीश ने अपने इस वादे पर इतनी तेजी और सख्ती से अमल दिखाया कि शराब के दीवाने ठगे से रह गए। अचानक शराब छुटने से इसके साइड इफेक्ट भी सामने आए, जब शराब के लती लोगों को अजीब-अजीब समस्याओं का सामना करना पड़ा। आइए डालते हैं ऐसे ही किस्सों पर एक निगाह।
एक अप्रैल से देशी शराब बंद करने के बाद राज्य में शराब को लेकर जबरदस्त साइड इफेक्ट सामने आए। बिहार के बेतिया निवासी 45 वर्षीय एक व्यक्ति तो कई दिन से शराब न मिलने के कारण साबुन ही चबा गया था। घरवालों ने बताया कि शराब न मिलने की वजह से वह विक्षिप्त की तरह व्यवहार कर रहे थे इसी बीच एक दिन उन्होंने घर में रखी साबुन की पूरी टिकिया ही चबा डाली। उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया।
शुरूआती तीन दिनों में मद्य निषेध केंद्र में आए थे 749 मामले
राज्य के औरंगाबाद में एक पुलिसवाले को शराब की इतनी लत थी कि शराबबंदी लागू होने से पहले ही उसने दर्जनों बोतल शराब खरीदकर अपने घर में रख ली। कानून लागू होने के बाद वह कई दिन तक घर में रखी शराब पीता रहा। शराब का स्टाक खत्म हुआ तो वह बेचैन हो उठा, इसी बेचैनी में एक दिन उसकी जान चली गई।
राज्य की मद्य निषेध सोसायटी ने शुरूआती तीन दिनों के जो आंकड़े जारी किए थे उसमें राज्य के 38 नए नशा मुक्ति केन्द्रों पर शराब के साइड इफेक्ट के 749 मामले पहुंच चुके थे।
औरांगाबाद स्थित नशा मुक्ति केन्द्र के अधिकारी डा. आरके सिंह के अनुसार उनके यहां एक मामला तो ऐसा आया था जिसमें एक व्यक्ति अपने परिवारवालों को ही नहीं पहचान पा रहा था, परिजनों के अनुसार वह रोजाना 600-1200 एमएल शराब पीता था।
जब उसे केन्द्र पर लाया गया तो वह अपने पैरों पर भी खड़ा नहीं हो पा रहा था। जैसे तैसे उसका इलाज शुरू किया गया। महीनों की मशक्कत के बाद उसकी हालत सुधर पाई। गया जिले में शराब का आदी 18 साल का एक लड़का तो थिनर की पूरी बोतल ही निगल गया। जिसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने जैसे तैसे उसकी जान बचाई।
गोपालगंज के ईट भट्टों से झारखंड के मजदूरों ने कर दिया था पलायन
पटना के नालंदा मेडिकल कालेज और हॉस्पिटल में एक ऐसे युवा मरीज को लाया गया जो शराब न मिलने की वजह से काफी हिंसक हो गया था। सरकार की ओर से नशा मुक्ति के लिए चलाए जा रहे पुर्नवास केन्द्र की काउंसलर राखी शर्मा ने बताया कि उक्त युवक के परिजनों ने उनसे बताया वह बहुत ज्यादा शराब पीता था। शराब मिलनी बंद हुई तो वह हाथ लगने वाली हर चीज को खाने लगा। एक बार वह काफी मिर्च खा गया।
शराबबंदी के शुरूआती दिनों में तो आलम ये था कि डॉक्टरों के यहां ऐसे लोगों की भीड़ लग गई थी जो शराब न मिलने के कारण चक्कर खाकर गिरने लगे था। कुछ की हालत ऐसी थी कि उनके हाथ पैर कांप रहे थे और वो सही से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।
गोपालगंज जिले में तो ईंट भट्ठो पर काम ही ठप हो गया था। वजह ये थी कि वहां काम करने वाले झारखंड निवासी मजदूरों को शराब नहीं मिल पा रही थी। नतीजतन कुछ दिनों बाद ही उन्होंने अपने घरों की ओर लौटना शुरू कर दिया। राज्य की आर्मी कैंटीनों में तो शुरूआती कई दिनों में सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने जमकर हंगामा काटा था। उनकी मांग थी कि उन्हें शराबबंदी कानून से अलग रखा जाए।