बिहार में शिक्षा व्यवस्था का हाल, खाली जमीन पर बिना छात्रों के चल रहे हैं निजी स्कूल
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बिहार में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली देखनी हो तो खाली जमीन देखिए और शिक्षा विभाग का सरकारी रिकॉर्ड, हकीकत खुद ब खुद सामने आ जाएगी। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि खाली जमीनों पर ऐसे इंटर कॉलेज चल रहे हैं जिनको सरकार से मान्यता लिए तीन साल बीत चुके हैं। कुछ जगह स्कूल ऐसे हैं जो खाली कमरों में है।
जमीनी हकीकत में वहां न टेबल-कुर्सी, न शिक्षक और न ही छात्र मौजूद हैं। चार स्कूल तो ऐसे हैं जो सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं। वास्तविकता में उन स्कूलों का अस्तित्व है ही नहीं।
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में ये बात सामने आई कि जेडीयू और राजद की संयुक्त सरकार की नाक के नीचे बिहार में शिक्षा विभाग के ग्रेडिंग सिस्टम में भ्रष्टाचार तेजी से फल-फूल रहा है।
खाली जमीन और कुछ ईंटों पर चल रहा स्कूल
टॉपर्स घोटाले में बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड के चेयरमैन ललकेश्वर प्रसाद सिंह गिरफ्तार हो चुके हैं। इन्होंने अपने दो साल के कार्यकाल में 196 ऐसे स्कूलों को मान्यता दी जो कि बारहवीं के कोर्स संचालित करते हैं।
इन स्कूलों पर आरोप है कि ये छात्रों को बेहतर अंकों के लिए उत्तरपुस्तिका उपलब्ध कराते थे। वैशाली के विशन राय कॉलेज चलाने वाले अमित कुमार उर्फ बच्चा राय भी गिरफ्तार हुए हैं। टॉपर्स में शामिल 13 में से तीन छात्र इसी कॉलेज से थे।
खाली जमीन और कुछ ईंटों पर चल रहा स्कूल
बिंदा धरोहर उच्च माध्यमिक विद्यालय, पंचभिंडी, गरखा
स्कूल संचालक: उपेंद्र राय, किसान
बीएसईबी के आंकड़ों में बारहवीं तक चलने वाले स्कूल को कॉमर्स, साइंस, और आर्ट्स में 120 बच्चों को पढ़ाने की मान्यता दी गई है। इस स्कूल को मान्यता दिए हुए तीसरा साल है। गांव के ही हरेश्वर मांझी कहते हैं कि तीन साल पहले स्कूल का उद्घाटन हुआ था, लेकिन अब तक वहां स्कूल नहीं बना। पूछने पर स्कूल मालिक कहते हैं कि हम स्कूल बनाने की प्रक्रिया में हैं। हम टीन शेड वाले 12 कमरों का एक स्कूल चला रहे हैं जिसमें से 50 बच्चों ने इस बार परीक्षा 12वीं की परीक्षा भी दी थी।
4 कमरों केढांचे के बाहर स्कूल का बोर्ड लगा है
सीवान के एक स्कूल का हाल
4 कमरों के एक ढांचे के बाहर स्कूल का बोर्ड लगा है, जो कि महज एक गोदाम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इस स्कूल को 2014-16 के लिए मान्यता दी गई थी। बोर्ड पर तीन नंबर लिखे हैं जिसमें पहले नंबर पर संपर्क करने पर एक व्यक्ति ने स्कूल से किसी प्रकार का संपर्क होने से मना कर दिया।
दूसरा फोन नंबर स्विच ऑफ और तीसरे नंबर पर कोई उत्तर नहीं मिल सका। सक्काड़ी गांव के लोग कहते हैं कि यहां दो कमरे छात्रों को पढ़ाने के लिए बनाए गए हैं जो कि बिना-टेबल कुर्सी के हैं। तीसरा कमरा प्रिंसिपल के लिए और चौथा कमरा स्टाफ के लिए बनाया गया है। ये खुले में बना एक ढांचा भर है। एक बरामदा है जिसे ऑटो रिक्शा वाले इस्तेमाल कर रहे हैं।
उषाअरविंद माध्यमिक साह उच्च माध्यमिक विद्यालय, अशोकनगर जलालपुर
संचालक: अरविंद सिंह, छपरा
दो मंजिला इमारत के अंदर स्कूल बना हुआ है, जिसके प्रवेश पर ही एक सैलून और हार्डवेयर स्टोर है। पहली मंजिल पर आठ कमरे हैं जहां फर्नीचर नहीं है। स्कूल संचालक कहते हैं कि उन्हें स्कूल कोड नहीं मिला है हालांकि इस स्कूल को मान्यता मिल चुकी है। मालिक के मुताबिक ट्रस्ट द्वारा चल रहे इस स्कूल में कक्षाएं नहीं चल रही हैं।
दो स्कूल जो हैं ही नहीं
चन्द्रज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, सुतिहार
संचालक: राशंकर सिंह, परसा
इस स्कूल में टॉयलेट और पानी के नाम पर कुछ नहीं है। बिना प्लास्टर की हुई दीवारे हैं। एक ढांचा है जिसमें कुछ टेबल-कुर्सियां हैं, लेकिन इस स्कूल में छात्र और टीचर नहीं हैं। स्कूल के प्रिंसिपल और मालिक कहते हैं कि स्कूल काम कर रहा है। वो दावा करते हैं कि 2014 में 115 छात्रों ने वहां से बारहवीं पास की। 2015-17 में 80 छात्र पंजीकृत हैं। हालांकि इस बैच में कोई भी छात्र पंजीकृत नहीं है।
दो स्कूल जो हैं ही नहीं
बिहार के सारन में दो स्कूल कागजों पर तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में खोजने पर इनका कोइ अस्तित्व ही नहीं मिला।
आसा सिन्हा मेमोरियल उच्च माध्यमिक विद्यालय, दरियापुर
सोनपुर और रविंद्र मीना उच्च माध्यमिक विद्यालय, बसतपुर
केएमडी स्कूल, बिहारशरीफ और दिलीप महतो बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय, हसनपुर कागजों पर है लेकिन पड़ताल में ये स्कूल मिला ही नहीं। वहीं रामविलास सकला देवी उच्च माध्यमिक विद्यालय, सवारी, जबलपुर में कोई छात्र नहीं है हालांकि यहां एक शिक्षक है। इसके अलावा नालंदा के सुभाष सेकेंड्री स्कूल, मोरा तालाब, बिहारशरीफ में छात्र छुट्टी पर हैं।