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लोजपा: 21 साल बाद पासवान परिवार में दरार, केंद्र सरकार में शामिल हो सकते हैं पशुपति पारस

Mon, 14 Jun 2021 08:21 AM IST
दीप्ति मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Mon, 14 Jun 2021 08:21 AM IST
सार

लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान पर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए से अलग होना अब भारी पड़ रहा है। पार्टी के पांचों सांसदों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को सभी पदों से हटा दिया है।

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Bihar Politics: LJP Faces Fresh Crisis as MPs Meet Speaker, Ask Him to Replace Chirag Paswan as Leader in Lower House election commission
पशुपति कुमार पारस, चिराग पासवान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिवंगत दिग्गज नेता रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) में बड़ी टूट हो गई है। लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान पर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए से अलग होना अब भारी पड़ रहा है। पार्टी के पांचों सांसदों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को सभी पदों से हटा दिया है। साथ ही चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस को अपना नेता चुन लिया है। उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ संसदीय दल के नेता का जिम्मा भी सौंपा गया है। चिराग पासवान, बिहार की सियासत में बिल्कुल अलग-थलग पड़ गए हैं। लोजपा में इस टूट की वजह भाजपा और जदयू के बीच चिराग को लेकर जारी तकरार को माना जा रहा है।

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लोजपा सांसद पशुपति कुमार पारस, चौधरी महबूब अली कैसर, वीणा सिंह, चंदन सिंह और प्रिंसराज की चिराग पासवान से राहें अलग हो गई हैं। रविवार देर शाम तक चली लोजपा सांसदों की बैठक में इस फैसले पर मुहर लग गई। बाद में पांचों सांसदों ने अपने इस फैसले की जानकारी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी दे दी। सांसदों ने उन्हें इस संबंध में आधिकारिक पत्र भी सौंप दिया। सोमवार यानी आज ये सांसद चुनाव आयोग को भी इसकी जानकारी देंगे। उसके बाद अपने फैसलों की आधिकारिक घोषणा भी करेंगे। उधर पार्टी प्रवक्ता अशरफ अंसारी ने ऐसी किसी टूट से इनकार किया है।
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21 साल बाद परिवार में दरार
बता दें कि 28 नवंबर, 2000 को लोजपा बनी थी। रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग को पुत्र होने का फायदा मिला। विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताया था। लेकिन एनडीए से बाहर निकलकर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर उनके चाचा पशुपति कुमार पारस नाराज थे।
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विधानसभा चुनाव के पहले भी पार्टी के सांसदों में टूट की बात सामने आई थी। उस वक्त भी बागी सांसदों का नेतृत्व पशुपति कुमार पारस ही कर रहे थे। हालांकि, बाद में अपने लेटर हेड पर इन चर्चाओं का खंडन कर पारस ने इस मामले पर विराम लगा दिया था। लेकिन चिराग के खिलाफ पार्टी में नाराजगी कम नहीं हुई। विधानसभा चुनाव में लोजपा के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद यह नाराजगी चरम पर पहुंच गई। उधर, जेडीयू भी कई सीटों पर हार के लिए लोजपा को जिम्मेदार मानती है। चुनाव के दौरान और उसके बाद जेडीयू के नेता लोजपा पर तीखे हमले बोलते रहे हैं। अब पार्टी पर कब्जे को लेकर भी जोर-आजमाइश होनी तय है।

पार्टी नेताओं को मनाने में जुटे चिराग

पांच सांसदों के निर्णय के बाद लोजपा में बड़े घमासान की आशंका है। लोजपा के कई नेता पहले ही जेडीयू में शामिल हो चुके हैं। यह सिलसिला जारी रह सकता है। वहीं चिराग पासवान पार्टी के रूठे नेताओं को मनाने में जुट गए हैं। देर रात तक कड़ी मशक्कत जारी रही। पिछली बार सांसदों ने चिराग की बात मान ली थी, लेकिन इस बार वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

जेडीयू सांसद के संपर्क में थे पारस
पशुपति कुमार पारस पिछले कुछ दिनों से लगातार जेडीयू सांसद ललन सिंह के संपर्क में थे। हाल में ही पटना में दोनों के बीच मुलाकात भी हुई थी। दिल्ली में भी इनके बीच लगातार बातचीत होती रही है। सांसदों के साथ भी उनका संपर्क बना हुआ था। सूरजभान ललन सिंह के करीबी भी रहे हैं।

बागी नेताओं ने पारस को क्यों चुना नेता?
पारस लोजपा सांसदों में सबसे वरिष्ठ हैं। बड़ी बात ये है कि वे रामविलास पासवान के छोटे भाई हैं। वे सबको साथ लेकर चल सकते हैं। उनके नेता होने से किसी अन्य सांसदों को भी असहज महसूस नहीं होगा।

लोजपा के इकलौते विधायक ने भी थामा जेडीयू का दामन
बिहार विधानसभा चुनाव में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली लोजपा महज एक सीट जीत पाई थी। महिटानी के जीतकर आए लोजपा के इकलौते विधायक को भी चिराग पासवान अपनी पार्टी में नहीं रख पाए और वह जेडीयू में शामिल हो गए। इसके पहले, चुनाव परिणाम के बाद कई जिलाध्यक्ष समेत दो सौ से ज्यादा नेता लोजपा छोड़कर जेडीयू में शामिल हो गए थे। 

दरक गई पासवान परिवार की एकता

राजनीति में पासवान परिवार की एकता की मिसाल दी जाती थी। रामविलास पासवान, पशुपति कुमार पारस और रामचंद्र पासवान तीनों भाईयों में अगाध प्रेम अक्सर चर्चा का विषय रहता था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि जब भी तीनों भाई जुटते हैं, तो साथ ही खाना खाते हैं। कोई भी फैसला सामूहिक रूप से लेते हैं।

वर्ष 2019 में रामविलास चुनाव नहीं लड़े तो अपनी हाजीपुर की सीट पारस को ही सौंपी थी। रामचंद्र पासवान का निधन हुआ तो समस्तीपुर से भतीते प्रिंस राज को लड़ाया था। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया, लेकिन रामविलास पासवान के निधन के बाद चाचा-भतीजे में नीतीश के सवाल पर मनमुटाव शुरू हो गया। चिराग, नीतीश के धुर आलोचक और पारस प्रशंसक बने रहे। यहां बता दें कि पारस, नीतीश कैबिनेट में पशुपालन मंत्री थे। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नीतीश के सवाल पर चाचा-भतीजे में मनमुटाव संवादहीनता के स्तर तक पहुंच गया और परिवार टूट गया।

केंद्र सरकार में शामिल हो सकते हैं पशुपति पारस
इन दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा तेज है। पारस केंद्र में मंत्री बन सकते हैं। वर्ष 2019 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने दोबारा कमान संभाली, तब एक फार्मूला बना कि सहयोगी दलों को मंत्रिपरिषद में एक-एक सीट दी जाएगी। तब 16 सांसदों वाली जेडीयू मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं हुई। उसकी कम से कम दो सीटों की मांग थी। 6 सांसदों वाली लोजपा से रामविलास पासवान मंत्री बने। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनका निधन हो गया। लोजपा का कोटा खाली हुआ तो अभी तक भरा नहीं गया।

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