Bihar Election 2025 : जेपी से उबरी कांग्रेस, लालू यादव से नहीं पार पा सकी; बिहार विधानसभा में 196 से चार पर आई
Bihar News : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर कांग्रेस प्रो-एक्टिव अप्रोच लेकर महागठबंधन के सबसे मजबूत दल राजद से स-समय डील कर रही है। राहुल गांधी का अंदाज कुछ अलग था, लेकिन आगाज़ अलग है। जानते हैं, बिहार में कांग्रेस कैसे अर्श से फर्श पर आई?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
लोकसभा चुनाव 2024 में सीट बंटवारे को लेकर बिहार में महागठबंधन के अंदर जो कुछ हुआ, उससे कांग्रेस परेशान हुई थी। बिहार में लोकसभा चुनाव भी महागठबंधन ने ही लड़ा था, विपक्षी दलों के गठबंधन- इंडी के बाकी सहयोगी यहां नहीं आ सके थे। बिहार विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन ही उतर रहा है। ऐसे में कांग्रेस ने अक्टूबर में संभावित बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पहले से कमर कस ली है। कांग्रेस के नंबर वन नेता राहुल गांधी चुनावी साल की शुरुआत से लगातार बिहार आ रहे हैं। इस महीने आए तो बाकायदा महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को चुनौती देने के मूड में। असर हुआ। लालू प्रसाद अभी इलाजरत हैं और तेजस्वी यादव अपनी टीम के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के घर सीट और चुनावी रणनीति पर बात करने पहुंच गए। ऐसे समय में यह जानना रोचक होगा कि आजादी के बाद से कांग्रेस को दो ही झटके बिहार में लगे। एक से तुरंत उबर गई, लेकिन दूसरे से उबरने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रही तो कैसे?
आजादी के बाद से एकछत्र राज, फिर जेपी मूवमेंट से झटका
आजादी के बाद देश की तरह बिहार में भी कांग्रेस का ही राज रहा था। भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 1951 में जब बिहार विधानसभा में 276 सीटें थीं तो कांग्रेस के 239 विधायक थे। वर्ष 1957 के बिहार चुनाव में 264 सीटें थीं तो कांग्रेस के पास 210 विधायक थे। बिहार चुनाव 1962 में जब 318 सीटें हो गईं तो कांग्रेस के विधायकों की संख्या 185 रही। 1969 के चुनाव में 318 में से 118 विधायक कांग्रेस के थे। 1972 में सीटों की संख्या 318 ही थी और कांग्रेस के विधायकों की संख्या बढ़कर 167 हो गई थी। इसके बाद आया जेपी आंदोलन का दौर। लोकनायक जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की शुरुआत बिहार से हुई थी, इसलिए 1977 में हुए चुनावों पर भी इसका सीधा असर पड़ा। बिहार विधानसभा में तब सीटों की संख्या 324 हो गई थी, लेकिन इस बार कांग्रेसी विधायकों की संख्या सीधे गिरकर 57 हो गई थी। यह एक बड़ा झटका था।
जेपी के झटके से उबरी कांग्रेस को लालू यादव ने कैसे किया साफ?
लोकनायक जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति की हवा से कांग्रेस हिली जरूर, लेकिन 1980 में उसने जबरदस्त वापसी की। इंदिरा गांधी ने खुद बिहार आकर मेहनत की, जिसका असर पूरे देश पर हुआ था। बिहार विधानसभा में तब सीटें 324 थीं और कांग्रेसी विधायकों की संख्या पिछले चुनाव के 57 के मुकाबले 169 हो गई थी। यह वह समय था, जब जेपी के अनुयायी अपनी सियासी जमीन मजबूत कर रहे थे। यह मजबूती 1985 आते-आते दिखने लगी, हालांकि तब भी कांग्रेस ने जलवा कायम रखा। कांग्रेस ने 324 सीटों में से 323 पर प्रत्याशी दिए और 196 पर जीत हासिल की। लेकिन, इसके बाद लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी की तिकड़ी के साथ राम विलास पासवान भी उभरने लगे। लालू तो ऐसे उभरे के 1990 में उन्होंने कांग्रेस को 71 पर ला खड़ा किया। कांग्रेस ने 1985 की तरह ही 324 सीटों में से 323 पर प्रत्याशी दिए थे, लेकिन उसे जीत महज 71 पर मिली। लालू का मुख्यमंत्री बनना कांग्रेस के लिए एक तरह से घाव रहा, जिसने धीरे-धीरे उसे मौजूदा हालत में ला खड़ा किया।
लालू के साथ रहकर भी नुकसान, दूर हटकर भी बर्बाद ही हुई कांग्रेस
लालू ने जब 1990 में बिहार की बागडोर संभाली तो निशाने पर पहले के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ही रहे। कांग्रेस से सत्ता छीनने के बाद लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने लंबे समय से उसे साथ भी रखा है, लेकिन नुकसान का दौर खत्म नहीं हुआ। 1995 के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने 324 में से 320 सीटों पर चुनाव लड़ा और महज 29 विधायकों की पार्टी बनकर रह गई। इसके बाद भी कांग्रेस ने राजद का साथ दिया, हालांकि फिर 2000 का चुनाव अकेले लड़ने उतरी। इस चुनाव में कांग्रेस को 324 में से महज 23 सीटें मिलीं। इस बड़ी हार के बाद फिर कांग्रेस ने राजद सरकार का साथ दिया। राजद ने तब 293 सीटों पर चुनाव लड़कर 124 पर जीत हासिल की थी। यह लालू-राबड़ी शासन का दौर था और इसी साल झारखंड बिहार से अलग हो गया।
दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है... फॉर्मूले से बीच में फिर हटी थी कांग्रेस
पिछले दिनों राहुल गांधी ने बिहार में राजद के कोर वोटर पिछड़ा-अति पिछड़ा और गरीब-गुरबा को लक्षित करने की जैसी बात की थी, वह बात पहले भी आई थी। 2005 में दो बार चुनाव हुए थे। फरवरी 2005 में जब चुनाव हुआ तो वह क्षेत्रीय दलों पर निर्भर पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी थी। इस चुनाव में कांग्रेस ने राजद का साथ छोड़ा था और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के सहयोगी दल की भूमिका निभाई थी। लोजपा ने 178 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर 29 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने तब 84 क्षेत्रों में चुनाव लड़कर 10 विधायक बनाए थे। फिर केंद्र की तत्कालीन सरकार ने किसी एक दल के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं होने का आधार देकर राष्ट्रपति शासन लगाया और जब अक्टूबर में चुनाव हुए तो कांग्रेस ने 51 सीटों पर प्रत्याशी देकर नौ पर जीत हासिल की। इस चुनाव में नीतीश कुमार ऐसे उभरे कि वह भाजपा के साथी होने के कारण कांग्रेस के स्थायी दुश्मन हो गए। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ राजद का साथ तो बनाए रखा, लेकिन 2010 का चुनाव अकेले उतर कर देखा। इस बार सभी 243 सीटों पर उसने प्रत्याशी दिए, लेकिन महज चार सीटों पर आकर टिक गई।
2010 के बाद कांग्रेस-राजद का साथ लगातार बना हुआ है, आगे क्या उम्मीद?
बिहार चुनाव 2025 में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस ने इस बार समय से बहुत पहले पहल इसलिए की है, क्योंकि 2010 के बाद से लगातार साथ रहने के बावजूद राजद ने कभी उसे पुराने दिनों की ओर देखने तक की हिम्मत नहीं दी। 2015 के बिहार चुनाव में कांग्रेस महज 41 सीटों पर उतरी और 27 पर जीत हासिल कर सकी। बीच में जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन छोड़कर लालू प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन में आए तो कांग्रेस को भी सत्ता का स्वाद मिला, लेकिन मंत्रीपद को लेकर कभी संतोषजनक स्थिति नसीब नहीं हुई। पिछले विधानसभा चुनाव 2020 में राजद ने कांग्रेस को 70 सीटों पर लड़ने का मौका दिया, जिसमें से वह 19 सीटें जीत सकी। इस 19 में से दो विधायक अब कांग्रेस में रहकर भी सत्ता के साथ हैं।
इस बीच लोकसभा चुनाव में जिस तरह से राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने बगैर सीटों पर समझौता हुए कांग्रेस की पसंदीदा सीटों पर भी राजद के प्रत्याशी उतार दिए, उसका डर बिहार विधानसभा चुनाव में भी देख राहुल गांधी ने दूसरी तैयारी दिखाई। असर हुआ है और अब सीटों पर बात के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पास तेजस्वी यादव राजद नेताओं के साथ बातचीत की शुरुआत करने पहुंचे। अंतिम फैसला होने में वक्त लगेगा। 17 अप्रैल को पटना में महागठबंधन की बैठक में कुछ खाका सामने आए, यह उम्मीद करना भी शायद जल्दबाजी होगी। राहुल गांधी और कांग्रेस का दबाव इस बात पर है कि उसे इस बार बिहार चुनाव में सम्मानजनक सीटें मिले, क्योंकि लोकसभा में राजद 23 में से चार और कांग्रेस नौ में से तीन सीट जीती बैठी है। कांग्रेस में आकर भी निर्दलीय लड़े पप्पू यादव भी जीते थे। यानी, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजद से ज्यादा सफलता हासिल की थी। ऐसे में उसका दावा वाजिब भी दिखता है।