फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   bihar_elections_loksabha elections

तो क्या बिहार जाति के चक्रव्यूह से बाहर निकल आया है?

Thu, 15 May 2014 11:18 AM IST
आशीष झा/ अमर उजाला,पटना
आशीष झा/ अमर उजाला,पटना Updated Thu, 15 May 2014 11:18 AM IST
विज्ञापन
bihar_elections_loksabha elections

बिहार में इस बार एग्जिट पोल का आंकड़ा एक संदेश दे रहा है। अगर इस पोल के आंकड़े 16 मई को सच निकले तो यह तय है कि बिहार जातीय खोल से काफी हद तक बाहर निकल आया है।

विज्ञापन


इस बार भाजपा के पक्ष में करीब 34 से 38 फीसदी वोट बताये जा रहे हैं जो पिछले चुनाव के मुकाबले दो गुना है। भाजपा को यह जनादेश केवल अगड़ी जातियों के वोट से नहीं मिल सकता है।
विज्ञापन


अगर अगड़ों के साथ पासवान और कुशवाहा का सारा वोट आ जाये फिर भी 24 फीसदी से अधिक वोट मिलना मुमकिन नहीं होगा। जबकि अगड़ों और कुशवाहा समाज में भारी मात्रा में पलायन हो चुका है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ऐसे में भाजपा को 30 फीसदी से ज्यादा वोट मिलने का साफ संकेत है कि भाजपा को उन वर्गों और जातियों का भी भारी मात्रा में समर्थन मिला है जो जदयू व अन्य दलों का वोट बैंक रहा है।

साथ ही बिहार में महिला वोट बैंक के वजूद पर भी सवाल खड़े होंगे कि ऐसा कुछ है या फिर बस यह कहने भर की बात थी। वैसे बिहार ऐसा समय समय पर करता रहा है। जब भी कोई बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बिहार के सामने रखा जाता है, यह प्रदेश अपने जातीय खोल से बाहर आकर मतदान करता है।

बात 1977 की हो या 1984 की या फिर 1989 की बिहार ने अपना यह चरित्र बखूबी दिखाया है। बिहार जैसे राज्य में जहां जातिगत राजनीति आज निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, ऐसे में 38 फीसदी वोट अगर भाजपा को मिल रहा है, जिसके 12 उम्मीदवार अगड़ी जाति के हैं तो यह पिछले चुनावों के मुकाबले बिहार की एक नई तस्वीर होगी।

क्योंकि भाजपा के पास अभी भी राज्य स्तर पर कोई बड़ा पिछड़ा या दलित चेहरा नहीं है। भाजपा आज भी अगड़ों की पार्टी है और उसे पिछड़ों के लिए सहयोगी दलों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

पिछड़ों की राजनीति के जानकार निराला बताते हैं कि मध्य बिहार में महादलित और अति पिछड़े अगर भूमिहार उम्मीदवार को वोट डालते हैं, तो यह इस इलाके को समझने वालों के लिए एक आश्चर्य है।

रणवीर सेना के मुखिया की हत्या के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिससे भूमिहार और दलित एक मंच पर आ जाएं। राजनीतिक विश्लेषक अरविंद कुमार का भी मानना है कि एग्जिट पोल के आंकड़े बिहार की राजनीति के स्थायी भाव के नहीं हो सकते।

यह केवल एक चुनाव के लिए हो सकते हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए कि महादलित और अति पिछड़ों में करीब 150 जातियां हैं, जिसे नीतीश कुमार ने यादव और पासवान के समक्ष खड़ा किया है।


इन्हीं के बल पर 4 फीसदी कुर्मी में से आने वाले नीतीश बिहार में राज कर रहे हैं। बिहार में अगर भाजपा को इस जनाधार को अपने पास रखना है तो उसे नीतीश और लालू का विकल्प खोजना होगा, क्योंकि जातीय खोल से बिहार अगर बाहर निकला है तो यह महज एक चुनाव के लिए ही होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed