बिहारः क्या हैं सोनिया के लालू यादव की तारीफ के मायने?
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भारत की आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि कांग्रेस ने किसी राज्य के विधानसभा चुनावों से पहले दो ताक़तवर क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाया। इस गठजोड़ को सफल बनाने के क्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 30 अगस्त को स्वाभिमान रैली में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली से पटना भी गईं।
अब पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अगले कुछ दिनों में राजद प्रमुख लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ मंच साझा करते हुए दिखेंगे। इससे पहले, कांग्रेस लोकसभा चुनावों के दौरान दो क्षेत्रीय दलों के साथ हाथ मिला चुकी है, संयोग से ऐसा उसने बिहार में ही किया था। कांग्रेस ने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ मिलकर दूसरे दलों को चुनौती दी थी।
इन तीनों दलों के गठजोड़ ने लोकसभा की 40 में से 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि लोजपा बिहार में राजद या जद (यू) जितनी मजबूत कभी नहीं रही।
कांग्रेस, जद (यू) और राजद का एक साथ आना ही इस तथ्य को स्वीकार करना है कि भाजपा की अगुवाई वाला एनडीए मजबूत स्थिति में है। लेकिन कांग्रेस की सोच कुछ अलग है, उसका मानना है कि अगर राजद और लोजपा के साथ 2004 का उसका गठबंधन भारी जीत दिला सकता है तो इस बार तो उसके साथ सत्तारूढ़ जद (यू) भी है।
स्वाभिमान रैली में सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, शरद यादव और लालू से पहले भाषण दिया, जब उन्होंने राज्य के विकास में लालू के योगदान की चर्चा की तो भीड़ ने इस पर तालियां बजाई। ये कुछ अस्वाभाविक था, क्योंकि लालू पर अक्सर राज्य के विकास के लिए कुछ न करने की तोहमतें लगाई जाती रही हैं।
सोनिया का दांव
सोनिया का भाषण और इसकी रणनीति दिखाती है कि कांग्रेस अपनी पूर्व की नीतियों से हट गई है, हज़ारों समर्थकों के बीच लालू की तारीफ़ करना कांग्रेस के गेमप्लान का हिस्सा है, ताकि बिहार की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों से संबंध मजबूत हो सकें।
कहा जा रहा है कि कांग्रेस का एक वर्ग जो कि अधिकतर ऊंची जातियों से संबंध रखता है और जिसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं, लालू के साथ मंच साझा करने के ख़िलाफ़ था।
ऐसी अटकलें खास तौर पर 27 सितंबर 2013 की घटना के बाद लग रही हैं, जब कांग्रेस उपाध्यक्ष ने 'दागी सांसदों और विधायकों' पर लाए गए यूपीए सरकार के अध्यादेश को 'बेतुका' करार देते हुए कहा था कि इसे फ़ाडकर फेंक देना चाहिए।
जब लालू को चारा घोटाले में सीबीआई की विशेष अदालत ने दोषी करार दिया था, यह वाकया उससे ठीक तीन दिन पहले का था। दो साल बाद, लालू के प्रति हमेशा से ही नरम रहीं सोनिया, शायद इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सुलझाने में सफल रही हैं। अब राहुल गांधी के चंपारण की रैली में लालू और नीतीश के साथ मंच साझा करने की संभावना है।
प्रतिष्ठा दांव पर
बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों में जद (यू) और राजद के अलावा कांग्रेस की प्रतिष्ठा भी दांव पर है, तीनों ही दल ख़ासकर जद (यू) और राजद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
यदि इन तीनों दलों का गठबंधन जीतता है, तो आशंका है कि यह पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल (2016) और उत्तर प्रदेश (2017) के विधानसभा चुनावों में भाजपा की उम्मीदों पर असर डालेगा।
इस बात में कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस की बिहार में अब कोई ताक़त नहीं रही, फिर भी जद (यू) और राजद ने 100-100 सीटें लीं और 40 सीटें कांग्रेस को दीं। नीतीश और लालू दोनों को पता है कि कांग्रेस के उत्थान से ही उनका अस्तित्व बचा रहेगा।
यदि ये मान भी लिया जाए कि राजद-जद (यू) गठजोड़ कांग्रेस के साथ के बिना बिहार मे जीत भी जाता, तब भी ये इन क्षेत्रीय दलों के अंतिम लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता था। वह अंतिम लक्ष्य है राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को सत्ता से हटाना...।