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बिहारः वामपंथी नीतीश की राह का रोड़ा?

Mon, 31 Aug 2015 06:34 PM IST
बद्री नारायण समाजशास्त्री/बीबीसी हिंदी के लिए
बद्री नारायण समाजशास्त्री/बीबीसी हिंदी के लिए Updated Mon, 31 Aug 2015 06:34 PM IST
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bihar election: comunists stands in the way

बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जातिय और सामाजिक समीकरणों का तरह–तरह से लेखा–जोखा पेश किया जा रहा है और उसका विश्लेषण किया जा रहा है। जातिय समीकरणों को ध्यान में रख राजनीतिक और जाति आधारित पार्टियों का गठबंधन बनाया जा रहा है।

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नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जेडी-यू, आरजेडी, कांग्रेस और सपा के महागठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले लोजपा, रालोसपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के एनडीए गठबंधन को बारीकी से देखें तो इनमें परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से जातियों का चेहरा झलकता है।
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लेकिन जनतंत्र और चुनावों के जाति आधारित चेहरे की चमक में वामपंथी मतों का प्रश्न अछूता रह जाता है। क्या बिहार चुनाव में वामपंथी मतों की कोई जगह बची है?हम जानते हैं कि बिहार में वामपंथी आंदोलन काफी मजबूत रहा है, ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका क्या होगी।

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यह सवाल विचारणीय है

bihar election: comunists stands in the way

यह सवाल विचारणीय है।आजादी के बाद 1957 के चुनाव में सीपीआई कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर की पार्टी थी।साल 1970 तक बिहार के चुनावी घमासान में सीपीआई और सीपीएम की महत्वपूर्ण उपस्थिति वामपंथी मतों की भूमिका को प्रासंगिक बनाती रही थी।फिर 70-80 के दशक में मध्य बिहार में एक ताकतवर नक्सलवादी आंदोलन उठ खडा हुआ।

नक्सलवादी आंदोलन संसदीय प्रणाली से असहमत था। इसलिए वो चुनाव में भाग नहीं लेता था।साल 1980 के बाद धीरे-धीरे बिहार नक्सलवादी आंदोलन का एक अहम धडा सीपीआई (एमएल) विनोद मिश्र गुट ने संसदीय प्रणाली को स्वीकार कर चुनावों में भाग लेना शुरू किया।

इसके बाद मध्य बिहार और दक्षिणी बिहार में फिर से एक महत्तवपूर्ण वामपंथी मतों की उपस्थिति का अहसास हुआ।1990 के बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसके 5 से 10 उम्मीदवार जीतते रहे। कई जगह वामपंथी उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे।इसके बाद भी बिहार विधानसभा के चुनाव में वामपंथी दलों की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति बनी रही।मध्य बिहार, दक्षिणी बिहार और उत्तरी बिहार के कई भागों में वामपंथी लगातार सशक्त बनकर उभरते रहे।

प्रभावी वामपंथी मत?

bihar election: comunists stands in the way

जैसा कि हम जानते हैं कि वामपंथी राजनीति 'वर्गीय प्रश्न' पर केंद्रित थी। गरीब-अमीर, खेत मजदूर-धनी किसान, मध्य वर्ग और अभिजात्य वर्ग जैसे प्रश्नों पर वामपंथी राजनीति ने अपनी गोलबंदी विकसित की थी।

1990 के बाद जब जातीय अस्मिता के सवाल पर आधारित पिछडा और दलित राजनीति विकसित हुआ तो इससे वामपंथी राजनीति को बडा झटका लगा।

मंडल और कमंडल की लडाई में न केवल बिहार में बल्कि पूरे देश में ऐसा माहौल बना कि राजनीति में वामपंथी धारा हिंदी क्षेत्रों में हाशिए पर आ गई।ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या बिहार में आज कोई प्रभावी 'वामपंथी मत' रह गया है?

जीत की संभवनाए कुछ कम!

bihar election: comunists stands in the way

अगर बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के आंकडे को देखें तो जाहिर होता है कि अभी भी यहाँ के कई क्षेत्रों में जैसे- मध्य बिहार, आरा मंडल, मोकामा परिक्षेत्र, दक्षिण और उत्तर बिहार के कई क्षेत्रों के विधानसभा क्षेत्रों में पांच से दस हजार तक मत वामपंथी उम्मीदवारों को मिलते रहे हैं।

जब महागठबंधन और एनडीए के बीच कांटे की लडाई तय मानी जा रही है। ऐसे में एक-एक वोट अहम हो तो ये दस हजार के आसपास के वामपंथी मत बिहार की कम से कम 30-40 विधानसभा क्षेत्रों में जीत और हार में अहम भूमिका निभा सकते हैं।महागठबंधन में पहले वामपंथी दलों के शामिल होने की चर्चा थी, पर बाद में यह संभव नहीं हुआ।

ऐसे में ये मत जो संभावित महागठबंधन के मत होते, अब महागठबंधन की जीत की संभावनाओं को कुछ कम कर सकते हैं।सवाल यह भी उठता है कि बिहार में लगातार तेज हो रही जातीय 'गोलबंदी' वामपंथी मतों को वामपंथी घेरे से निकाल कर जातीय पहचान के आधार पर महागठबंधन से जोड पाएगी?

विकास पुरुष के रूप में नीतीश कुमार उन्हें आकर्षित कर पाएंगे? क्या मैजिक या हिंदुत्व की चाह उन्हें एनडीए गठबंधन की ओर खींच पाएगी?आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में वामपंथी मतों की भूमिका क्या होती है, यह देखना रोचक होगा।

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