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लोकतंत्र की बिसात पर फिर वही जाति के मोहरे

Thu, 25 Jun 2015 06:02 PM IST
Updated Thu, 25 Jun 2015 06:02 PM IST
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bihar assembly election 2015

बिहार में सितंबर-अक्तूबर महीने में राज्य विधान सभा का चुनाव होने जा रहा है। भाजपा नेतृत्व में एनडीए और नीतीश कुमार के नेतृत्व में लालू यादव, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर होने का अनुमान है।

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भाजपा बिहार के किसी नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार न घोषित कर अपने विकास पुरुष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर के विकास के नाम पर वोट लेने की राजनीति करती दिख रही है। वहीं नीतीश कुमार भी सुशासन और विकास पुरुष के रूप में अपनी छवि को ही आगे रखकर चुनाव में उतारना चाहते हैं।
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अखबारों में खबर है कि उनके मीडिया मैनेजमेंट और इमेज मैनेजमेंट में लगे हुए प्रोफेसनल्स भी उन्हें यही सुझाव दे रहे हैं। लेकिन अगर ध्यान से देखें तो दोनों ही गठबंधन जातीय समीकरण को मजबूत करना चाहते हैं।
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जातीय समीकरण
भाजपा रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और जीतन राम मांझी के हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को अपने से जोड़कर दलितों में दुसाध और मुसहर जैसे बड़े दलित समूह का समर्थन लेना चाहती है। भाजपा पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी को भी अपने में शामिल कर लालू यादव के यादव मतों में भी सेंध लगाना चाहती है।

उपेंद्र कुश्वाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेतृत्व से भाजपा ‘कोइरी’ मतों के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़े ही हुए है। भाजपा जातीय नेताओं और उनके छोटे-छोटे दलों को साथ मिलकर राजनीति करना चाहती है।

वहीं नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस के सेक्युलर महागठबंधन का जातीय आधार पर हो रही चुनावी ब्यूह रचना साफ़ दिख रही है। नीतीश के साथ कुछ महादलित जातियां, कुछ प्रतिशत कोइरी, कुर्मी, जैसी मध्य जातियां और कुछ सवर्ण और कुछ प्रतिशत मिली-जुली जातियों का मत संगठित होता दिख रहा है।

युवा वोटर

bihar assembly election 2015

नीतीश कुमार के पक्ष में विकास आकांक्षी 18 से 25 वर्ष का पहली बार मतदाता हो रहा युवाओं का समर्थन भी बढ़ता दिख रहा है। नरेंद्र मोदी के प्रति युवाओं में बढ़ते निराशा का लाभ नीतीश कुमार को मिल सकता है। लालू यादव का जनाधार यादव और मुस्लिम समीकरण के कारण मजबूत माना जाता रहा है।

बिहार में यादव एक बड़ी जनसंख्या की जाति मानी जाती है। यादव, मुस्लिम जनमत के साथ महागठबंधन को मिलने से नीतीश कुमार भाजपा से आगे निकलते दिख रहे हैं। लोग मानते हैं कि नीतीश बहुत अच्छे मुख्यमंत्री है, लेकिन बिहार में बिना लालू यादव से जुड़े उन्हें विजय मिल सकती थी।

सवर्णों का वोट
सवर्णों का ज्यादातर वोट बीजेपी के पक्ष में गोलबंद होता दिख रहा है, किंतु ब्राह्मण जैसी जाति का मत भाजपा और कांग्रेस में बंट सकता है। कांग्रेस ने अपना पारंपरिक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम आधार तो खोया है लेकिन ब्राह्मण जाति के एक बड़े भाग की सहानुभूति उसके साथ अभी भी है।

अगर कांग्रेस का उम्मीदवार मजबूत होगा तो एक अच्छा खासा ब्राह्मण मत उधर जा सकता है। वहीं मुसलमानों में भी कांग्रेस की छवि अच्छी है। बिहार में कांग्रेस अकेले रहकर मात्र हराने वाली पार्टी और किसी के साथ मिलकर जिताने वाली पार्टी बनकर रह गई है। महागठबंधन में उसके जुड़ने से इस गठबंधन के जीत की संभावना और बढ़ रही है।

वामपंथ का असर

bihar assembly election 2015

बिहार में वामपंथी दलों की स्थिति भी ऐसी ही है. महागठबंधन में शामिल होने से उनकी प्रासंगिकता भी बढ़ी है। बिहार के हर विधान सभा क्षेत्र में इनके पास इनके पारंपरिक मत हैं। महागठबंधन को इनका भी फायदा मिलेगा।

यह रोचक है कि विकास केंद्रित जनतंत्र में जनतंत्र रचने की शक्ति आज भी ‘जातीय शक्ति’ से जुड़ी है। यह महागठबंधन जीतेगा तो जनता में बढ़ रही विकास और जनतंत्र के प्रसार की चाह के साथ जातियों के ‘महागठबंधन’ की बड़ी भूमिका होगी।

दरअसल विकास दोधारी तलवार है। एक तरफ वह जन आकांक्षाओं को पूरा करती है, दूसरी तरफ नई चाहतें पैदा करती है। ऐसे में ‘जाति भाव’ ‘विकास भाव के असंतुलन को दूर कर जनतंत्र में विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। यह प्रक्रिया हर दल और हर चुनाव के लिए सच है। बिहार के इस चुनाव में भी जनतंत्र और विकास का यही अंतर्विरोध देखने को मिल रहा है।

जाति के नाम पर
इस पूरी चुनावी चर्चा में भोजपुरी क्षेत्र के एक युवक का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है, "नीतीश जी ने बहुत काम किया है, लेकिन मत तो जाति के आधार पर जाएगा, हालांकि उनके विरोध में वोट देने वाला भी यह मानकर ही उनके खिलाफ वोट देगा कि उन्होंने बिहार को काफी आगे बढ़ाया है।

उनके पक्ष में वोट करने वाला उन्हें विकास पुरुष मानते हुए भी महागठबंधन से पैदा हुए जाति भाव के गठबंधन के आधार पर वोट देगा।" इन दोनों ही गठबंधनों भाजपा के नेतृत्व में एनडीए और नीतीश कुमार के नेतृत्व में धर्म निरपेक्ष महागठबंधन दोनों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सीटों का बंटवारा किस प्रकार होता है और जीत दिलाने वाले उम्मीदवार अधिक से अधिक किस गठबंधन के पास होते हैं।

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