लालू-नीतीश को मात दे पाएगी भाजपा की ये 'सोशल इंजीनियरिंग'?
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बिहार विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने बेशक सीटों के बंटवारे का फैसला सबसे अंत में लिया हो लेकिन उम्मीदवारों की सूची जारी करने में उसने बाकी पार्टियों को मात दे दी। मंगलवार को उसने 43 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर सबको भौंचक्का कर दिया।
पहली नजर में भाजपा की यह पहली सूची बेशक सामान्य सी दिखाई दे लेकिन इसके बहाने उसने बिहार चुनाव में अलग तरह की सोशल इंजीनियरिंग की झलक दे दी है जिसके सहारे वह बिहार फतह की जद्दोजहद में लगी है।
भाजपा ने 43 उम्मीदवारों की सूची में सभी तबकों के अलावा जातिगत दावपेंच में उलझी बिहार की राजनीति को साधने का प्रयास किया है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 43 उम्मीदवारों में 17 अलग-अलग जातियों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, तो कुल टिकटों में से 50 फीसदी युवाओं और महिलाओं को दिए गए हैं।
यादवों का भी रखा पूरा ख्याल
भाजपा की पहली सूची में बिहार की राजनीति में जातिगत रूप से सबसे ज्यादा दखल रखने वाले यादवों का पूरा ख्याल रखा गया है। यही कारण है कि 43 में से सबसे ज्यादा पांच यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है।
माना जा रहा है कि आगे आने वाली सूचियों में यादव उम्मीदवारों की संख्या और बढ़ सकती है। इसके अलावा इस लिस्ट में ब्राह्मण और वैश्यों का भी पूरा ख्याल रखा गया है। वहीं दलित और अन्य ओबीसी जातियों के उम्मीदवारों को भी बराबर मात्रा में टिकट दिए गए हैं।
भाजपा की मंशा टिकट वितरण के बहाने हर किसी तबके को खुश रखने की है। जिससे वह सभी बिरादरियों के वोटों में सेंध लगा सके। बिहार चुनावों में भाजपा की यह अलग तरह की सोशल इंजीनियरिंग है जिसमें अगर वह सफल रहती है तो पूरी संभावना है इसका उपयोग वह डेढ़ साल बाद होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी कर सकती है।
नीतीश-लालू के मात देने की तैयारी
हर राज्य के लिए नई रणनीति के साथ उतरने वाली भाजपा बिहार चुनावों में बिल्कुल नए कलेवर के साथ मैदान में है। अपनी इस नई सोशल इंजीनियरिंग से भाजपा की मंशा मंडल के हीरो लालू यादव और ओबीसी बिरादरियों पर खासा प्रभाव रखने वाले नीतीश कुमार की काट करने की है।
यादव बिरादरियों के साथ अन्य ओबीसी बिरादरियों पर खासा प्रभाव रखने वाले लालू यादव और ओबीसी के साथ दलित बिरादरियों में गहरी पैंठ रखने वाले नीतीश कुमार का मुख्य अस्त्र बिहार की ये जातियां ही हैं जो उसका पुख्ता वोट बैंक मानी जाती हैं।
भाजपा की मंशा इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की है जिससे वह महागठबंधन का किला ध्वस्त कर सके। ऐसे में अगर भाजपा की यह रणनीति सफल रही तो इसका असर उत्तर प्रदेश चुनावों में भी दिखेगा।