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झुलसों के जख्मों को ठीक करना बना लिया जिंदगी का मकसद
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
Updated Tue, 08 Mar 2016 11:48 AM IST
सार
- कमल पट्टियां वाले के नाम से मशहूर इस शख्स ने पिछले 14 सालों में सैकड़ों झुलसे लोगों का आयुर्वेद की ठंडी पट्टियों से इलाज किया है।
- 45 वर्षीय कमल किशोर के इस अनोखे अभियान में उतरने का भी एक किस्सा है।
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जले हुए व्यक्ति के हाथ पर पट्टी बांधते हुए कमल किशोर
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
पेशे से कमल किशोर दुपट्टे बेचने का काम करते हैं, लेकिन झुलसे लोगों के जख्मों का इलाज करना आज उनके जीवन का मकसद बन चुका है। जम्मू के पुराने शहर गली मल्होत्रा में कमल पट्टियां वाले के नाम से मशहूर इस शख्स ने पिछले 14 सालों में सैकड़ों झुलसे लोगों का आयुर्वेद की ठंडी पट्टियों से इलाज किया है।
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खासबात यह है कि वह इसके लिए कोई फीस नहीं लेते और जब तक झुलसे व्यक्ति के जख्म ठीक नहीं होते, वह अपना इलाज जारी रखते हैं।उधमपुर से लेकर लखनपुर तक के लोग उनके पास इलाज के लिए पहुंचते हैं। अपनी छोटी से दुकान से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा वह इसी मिशन पर खर्च करते हैं।
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45 वर्षीय कमल किशोर के इस अनोखे अभियान में उतरने का भी एक किस्सा है। कमल के अनुसार उनके एक रिश्तेदार के घर में शादी थी। वह समारोह में जाने की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान उनका पैर गलती से खौलते पानी में पड़ गया और वह बुरी तरह झुलस गए।
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उनके रिश्तेदार का फोन आया तो उन्होंने घटना का जिक्र करते हुए समारोह में पहुंचने में असमर्थता जताई। उनके रिश्तेदार लैब में काम करते थे। वह उन्हें अपने घर ले गए और आयुर्वेदिक तरीके से उनका इलाज किया। लगातार इलाज से वह काफी प्रभावित हुए और उन्होंने अपने रिश्तेदार से यह काम स्वयं करने की इच्छा जताई।
उन्होंने दवा बनाने से लेकर उसके उपयोग की विधि बताई। फिर उन्होंने यह काम शुरू कर दिया। आयुर्वेद की दवा घंटों खौलाकर तैयार की जाती है और फिर उसे ठंडा करने में 6-7 घंटे लगते हैं।
उस दवा की पट्टियां बनाकर मरीजों की सेवा करते हैं। कमल कहते हैं कि उनके इस जुनून पर उसके परिवार वाले भी उनके विरोधी हो गए थे। विरोध के बावजूद उन्होंने अपना मिशन जारी रखा। अब उनके परिवार वाले, खासकर मां कहती हैं कि यह सिलसिला नहीं रुकना चाहिए।
कमल 25 फीसदी तक झुलसे व्यक्ति का ही इलाज करते हैं। इससे ज्यादा जले मरीजों को वह अस्पताल भेज देते हैं। मिशन पर होने वाले खर्च और फीस के संबंध में पूछे जाने पर कमल कहते हैं कि मरीज से वह कभी भी पैसे नहीं मांगते।
यदि कोई पूछता है या जिद करता है तो उन्होंने अपनी दुकान के कोने में एक डिब्बा लटका रखा है। उसमें मरीज अपनी श्रद्धा व हैसियत के अनुसार कुछ भी डाल देता है। इस बाक्स से मिलने वाली राशि दवा के खर्च का दस फीसदी ही होती है। 90 फीसदी वह अपने पास से लगाते हैं। कई लोग पट्टियां दे जाते हैं। उससे भी मिशन में काफी मदद मिलती है।