फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   ayub khan gives special recognition to lucknow with his chikankari

अयूब खान: चिकनकारी की कला ने दिलाया पुरस्कार पर छीन ली आंखें

Tue, 29 Mar 2016 06:47 PM IST
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 29 Mar 2016 06:47 PM IST
विज्ञापन
ayub khan gives special recognition to lucknow with his chikankari
...तो इत‌िहास बन जाएगी च‌िकनकारी - फोटो : Amar Ujala

लखनऊ में खदरा के पास मदेयगंज की संकरी गलियों में आपको कई बार नाक पर रूमाल रखने पड़ते हैं और पैर संभालकर रखना होता है क्योंकि दोनो ओर बजबजाती नालियां हैं।

विज्ञापन


चिकन के एक मशहूर कलाकार की कला ऐसी ही तंग इलाकों और परेशानियों के बीच परवान चढ़ी है। मदेयगंज में अयूब खान का घर ढूंढना मुश्किल नहीं हैं। घरों के बाहर चिकन का काम करती महिलाएं बड़े आदर के साथ उनका पता बताती हैं और अयूब खान ने अपने घर के दरवाजे पर शिल्पगुरु सम्मान के प्रशस्तिपत्र की छायाप्रति चिपका रखी है। 
विज्ञापन


उनसे मिलने पर वे टटोलते हुए आपका हाथ थामते हैं और बताते हैं कि डेढ़-दो साल पहले दूसरे आंख की रोशनी भी चली गई। चिकन के इस विख्यात कलाकार ने अपनी कला के लिए कई पुरस्कार पाए हैं लेकिन पहले दाई आंख गंवाई और अब पूरी तरह अंधे हो चुके हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


उनके पिता फैयाज खान, जिन्हें 1965 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था और जिनके चिकन के कई नमूने संग्रहालयों में संग्रहीत हैं, ने भी अपनी आंखें गंवा दी थी और यही कारण है कि अयूब खान की आगे की पीढिय़ां अब इस कला से दूर हो चुकी हैं। 

पैसे नहीं हैं तो फोन नंबर रहता है बंद

ayub khan gives special recognition to lucknow with his chikankari
सम्मान तो म‌िला पर छ‌िन गई आंखें - फोटो : Amar Ujala
अयूब बताते हैं कि यह बहुत महीन काम है और इसे धूप में ही किया जा सकता है, बिजली के प्रकाश में नहीं। बहुत लोगों ने मुझसे यह कला सीखी लेकिन अभ्यास नहीं कर सके। 

83 वर्षीय अयूब खान अपनी कला के कई नमूने समाज को दिए हैं। कई बार बड़े-बड़े अधिकारियों, नेताओं की मांग पर कपड़े बनाए हैं। 

2007 में शिल्प गुरू अवार्ड के अलावा उन्हें तीन बार नेशनल मेरिट अवार्ड और स्टेट अवार्ड भी मिला है लेकिन जब आप उनसे उनका मोबाइल नम्बर पूछेंगे तो वे संकोच के साथ जवाब देते हैं, मेरा नम्बर तो बन्द रहता है। 

पैसे नहीं होते, अक्सर कट जाता है। चिकन में इतिहास रचने वाले शिल्प गुरू का यह हाल हमारे समाज में कलाकारों के प्रोत्साहन के लिए बनी योजनाओं पर सवाल भी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed