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EV Adoption: शोरूम में तो बिक रहे इलेक्ट्रिक वाहन, लेकिन घरों में चार्जिंग की जगह नहीं! रिपोर्ट में खुलासा

Tue, 30 Jun 2026 07:36 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Tue, 30 Jun 2026 07:36 PM IST
सार

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती बिक्री, नए मॉडल और सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की चर्चा अक्सर सुर्खियों में रहती है। लेकिन एक नई रिपोर्ट का कहना है कि ईवी बाजार की सबसे बड़ी चुनौती सड़कों पर नहीं, बल्कि लोगों के घरों के भीतर मौजूद है।

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India’s EV Growth Slowing Down Due to Lack of Home Charging Infrastructure: AEEE-Kazam Report
EV Adoption Challenges - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की सफलता की कहानी आमतौर पर रिकॉर्ड तोड़ बिक्री के आंकड़ों, नए मॉडलों की लॉन्चिंग और सड़कों पर बनते चमचमाते पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों के जरिए सुनाई जाती है। लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस चमक-दमक के पीछे छिपी एक गंभीर और बुनियादी समस्या को उजागर किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 'अलायंस फॉर एन एनर्जी एफिशिएंट इकोनॉमी' (AEEE) और 'काजम' (Kazam) के एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि, भारत में ईवी क्रांति की रफ्तार किसी बड़ी तकनीकी कमी की वजह से नहीं, बल्कि हमारे घरों के कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से धीमी पड़ रही है। रिपोर्ट का दावा है कि देश के अधिकांश घर अभी भी इलेक्ट्रिक वाहनों को सुरक्षित, भरोसेमंद और किफायती तरीके से चार्ज करने के लिए तैयार नहीं हैं। 

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यह भी पढ़ें - Tata Sierra EV: टाटा सिएरा ईवी भारत में हुई लॉन्च, लाइफटाइम बैटरी वारंटी और QWD तकनीक से है लैस

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क्या है असली चुनौती?

यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि ईवी खरीदना सिर्फ शोरूम से गाड़ी घर लाने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती तब शुरू होती है, जब एक परिवार रात में अपनी गाड़ी को चार्जिंग पर लगाता है। क्या घर के सॉकेट इस भारी लोड को झेल पाएंगे? क्या घर की वायरिंग इतनी मजबूत है कि शॉर्ट सर्किट का खतरा न हो? शहरों में रहने वाले ग्राहकों के लिए अब यही बुनियादी सवाल ईवी खरीदने का सबसे बड़ा निर्णायक पहलू बनते जा रहे हैं।

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आंकड़ों की बात करें तो भारत में ईवी की बिक्री साल 2016 के मात्र 0.5 लाख से तेजी से बढ़कर साल 2025 में 23 लाख के पार पहुंच चुकी है। इसमें से करीब 91 फीसदी हिस्सेदारी टू-व्हीलर्स और थ्री-व्हीलर्स की है, जो यह दिखाता है कि भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां आम लोगों की रोजमर्रा की कमाई और सफर से कितनी गहराई से जुड़ी हैं। लेकिन, गाड़ियों की इस रफ्तार के मुकाबले घरों का चार्जिंग इकोसिस्टम बेहद पीछे छूट गया है। 

घरों में चार्जिंग को लेकर देश में कितना बड़ा गैप है?

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय घरों में अभी भी चार्जिंग को लेकर एक बहुत बड़ा बुनियादी ढांचागत अंतर मौजूद है:

  • सिर्फ आधे लोगों के पास सुविधा: ईवी खरीदने की इच्छा रखने वाले संभावित ग्राहकों में से केवल 55 फीसदी लोगों के पास ही फिलहाल घर पर चार्जिंग की सीधी सुविधा उपलब्ध है।

  • वायरिंग अपग्रेड की जरूरत: अन्य 30 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो अपने घर के इलेक्ट्रिकल सिस्टम को अपग्रेड (बदलने या मजबूत करने) के बाद ही चार्जिंग की व्यवस्था शुरू कर सकते हैं।

  • जुगाड़ के भरोसे चार्जिंग: इस कमी का नतीजा यह है कि एक बहुत बड़ा खरीदार वर्ग घरों में आरामदायक चार्जिंग के लिए आज भी अस्थायी और कामचलाऊ समाधानों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर है। 

रात में कामचलाऊ तरीके से गाड़ी चार्ज करना कितना खतरनाक हो सकता है?

जब घरों में सही इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होता, तो लोग ऐसे तरीके अपनाते हैं जो गाड़ी और घर दोनों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकते हैं:

  • लोड के लिए अनफिट सॉकेट: लोग अक्सर आम इस्तेमाल वाले घरेलू सॉकेट, कामचलाऊ एक्सटेंशन बॉक्स और शेयर्ड कनेक्शन्स (एक ही कनेक्शन से कई चीजें चलाना) का इस्तेमाल करते हैं। जो ईवी के लगातार रहने वाले भारी लोड को झेलने के लिए बिल्कुल नहीं बने होते।

  • हादसों का खतरा: रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि ऐसे असुरक्षित तरीकों से घरों में आग लगने और बिजली के गंभीर हादसे होने का खतरा बढ़ जाता है।

  • बैटरी को नुकसान: इसके अलावा, इस तरह की अनियंत्रित चार्जिंग से चार्जिंग की विश्वसनीयता कम होती है, चार्जिंग इक्विपमेंट खराब हो सकते हैं और गाड़ी की कीमती बैटरी भी समय से पहले खराब हो सकती है। 

अपार्टमेंट और सोसायटियों में रहने वालों के सामने क्या बड़ी चुनौतियां हैं?

यह समस्या उन लोगों के लिए और भी ज्यादा सिरदर्द बन जाती है जो बहुमंजिला इमारतों, गेटेड कम्युनिटीज या किराए के मकानों में रहते हैं। क्योंकि वहां पार्किंग और बिजली की लाइन पर उनका अपना सीधा नियंत्रण नहीं होता:

  • शहरों की बड़ी आबादी अपार्टमेंट में: भारत के शहरी इलाकों में करीब 70 से 75 फीसदी परिवार मल्टी-फैमिली यूनिट्स (जैसे अपार्टमेंट) में रहते हैं। मुंबई और बंगलूरू जैसे महानगरों में तो 60 से 80 फीसदी से ज्यादा आबादी ऐसे अपार्टमेंट्स में रहती है, जहां पार्किंग साझा होती है और बिजली के लोड की क्षमता भी सीमित होती है।

  • एनओसी और अप्रूवल का लंबा चक्कर: इन जगहों पर रहने वालों को ईवी खरीदने में कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि दिक्कत है इमारत के अंदर एक स्पष्ट चार्जिंग सेटअप न होना। मकान मालिकों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन्स (RWA) और बिजली कंपनियों से मंजूरी लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाती है कि रातभर की साधारण चार्जिंग का मामला एक लंबी बहस और आपसी मोलतोल में बदल जाता है।

किफायती होना समस्या नहीं, तालमेल की कमी है: काजम के को-फाउंडर और सीईओ अक्षय शेखर ने साफ किया कि परेशानी पैसे की नहीं है। उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि किफायती होना  मुख्य चिंता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में चार्जर की कीमत गाड़ी की कीमत में ही शामिल होती है।" उनके अनुसार, असली चुनौती विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाने की है ताकि चार्जर लगाने की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

होम चार्जिंग की यह समस्या गिग वर्कर्स की आजीविका को कैसे प्रभावित कर रही है?

रिपोर्ट इस बात पर विशेष जोर देती है कि घर पर चार्जिंग की सुविधा न होना डिलीवरी करने वाले और गिग वर्कर्स की रोजमर्रा की कमाई पर सीधा असर डालता है:

  • साप्ताहिक सफर और कमाई का चक्र: गिग-इकोनॉमी में काम करने वाले राइडर्स हर हफ्ते औसतन 250 से 300 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। उनकी आय की स्थिरता पूरी तरह से इस बात पर टिकी है कि उनकी गाड़ी रात में भरोसेमंद तरीके से चार्ज हो जाए।

  • काम के घंटों का नुकसान: अगर उन्हें घर पर चार्जिंग की सुविधा मिलने में देरी होती है, या चार्जिंग महंगी और अविश्वसनीय होती है, तो इसका सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है। इसके कारण उनके ट्रिप मिस हो जाते हैं और काम का कीमती समय बर्बाद होता है।

इस धीमी पड़ती रफ्तार को सुधारने के लिए रिपोर्ट में क्या दावे और सुझाव दिए गए हैं?

AEEE के सुमेध अग्रवाल का कहना है कि असली रुकावट गाड़ी या चार्जर में नहीं, बल्कि इमारतों के अंदर की इलेक्ट्रिकल वायरिंग में है। यदि देश में ईवी अपनाने की रफ्तार को तेज करना है, तो घरेलू बिजली प्रणालियों और सुरक्षा मानकों को अपग्रेड करना ही होगा। रिपोर्ट में निम्नलिखित प्रमुख दावे और मांगें की गई हैं:

  • 45% घरों को अपग्रेड की जरूरत: भारत के लगभग 45 फीसदी घरों को ईवी को सुरक्षित रूप से चार्ज करने के लिए अपने इलेक्ट्रिकल सिस्टम में सुधार और अपग्रेडेशन की सख्त जरूरत है।

  • राष्ट्रीय फ्रेमवर्क की मांग: देश में 'ईवी-रेडी होम्स' के लिए एक राष्ट्रीय नीति या फ्रेमवर्क तैयार किया जाना चाहिए।

  • अलग बिजली मीटर और कड़े मानक: इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए समर्पित अलग मीटरिंग व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही इंस्टॉलेशन के सुरक्षित मानक तय होने चाहिए।

  • अथॉरिटीज के बीच बेहतर तालमेल: हाउसिंग अथॉरिटीज, बिजली प्रदाताओं और नीति निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।

निष्कर्ष: अब सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या भारत को ईवी-रेडी घरों की जरूरत है या नहीं। बल्कि सवाल यह है कि इन्हें कैसे परिभाषित किया जाए, कैसे फंड किया जाए, कैसे बनाया जाए और इनका संचालन कैसे हो। यह कोई छोटा-मोटा या बाद का विषय नहीं है, बल्कि यह वह बुनियादी नींव है जिस पर भारत की ईवी महत्वाकांक्षाओं की इमारत टिकी है। साफ है कि भारत के ईवी बाजार की अगली ग्रोथ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि शोरूम में क्या बिक रहा है। बल्कि इस बात पर करेगी कि देश के घरों, अपार्टमेंट्स और पार्किंग स्पेस के भीतर का सिस्टम कितना तैयार है।

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