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Road Safety:वैज्ञानिक स्पीड मैनेजमेंट से हाईवे पर घातक सड़क हादसों में आ सकती है बड़ी कमी, IIT की शोध में दावा

Fri, 26 Jun 2026 10:25 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Fri, 26 Jun 2026 10:25 PM IST
सार

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के एक नए शोध में सामने आया है कि वैज्ञानिक तरीके से स्पीड मैनेजमेंट लागू करने पर भारतीय हाईवे पर होने वाले घातक सड़क हादसों, मौतों और दुर्घटनाओं की गंभीरता में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत ने वर्ष 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों और गंभीर चोटों की संख्या को आधा करने का लक्ष्य तय किया है।

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IIT Kharagpur Study: Scientific Speed Management Can Drastically Reduce Fatal Crash Risks on Indian Highways
Highway Accidents - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत के नेशनल हाईवे पर सफर करने वालों और सड़क सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद नीति-निर्माताओं के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है। आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) के एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि अगर भारतीय राजमार्गों पर 'साइंटिफिक स्पीड मैनेजमेंट' (वैज्ञानिक गति प्रबंधन) को लागू किया जाए, तो जानलेवा हादसों के जोखिम, मौतों की संख्या और दुर्घटनाओं की गंभीरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

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सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना लक्ष्य

यह निष्कर्ष ऐसे समय में आए हैं जब भारत साल 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों और गंभीर चोटों को आधा (50 प्रतिशत) करने के अपने बड़े लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश में जुटा है। देश में सड़क सुरक्षा की चुनौती कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले साल 2024 में सड़क हादसों में 1.8 लाख से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। शोध के निष्कर्ष रोड सेफ्टी नेटवर्क (RSN) और आईआईटी खड़गपुर की साझेदारी में आयोजित एक उच्च स्तरीय सड़क सुरक्षा संवाद के दौरान प्रस्तुत किए गए।

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IIT Kharagpur Study: Scientific Speed Management Can Drastically Reduce Fatal Crash Risks on Indian Highways
Road Accident - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

रोड सेफ्टी नेटवर्क (RSN) क्या है?

अध्ययन के नतीजों को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि इस पूरी मुहिम के पीछे कौन सी संस्था काम कर रही है:

  • रोड सेफ्टी नेटवर्क (RSN) प्रमुख नागरिक समाज संगठनों का एक मजबूत गठबंधन है।

  • यह नेटवर्क मुख्य रूप से सड़क हादसों में होने वाली मौतों और गंभीर चोटों को कम करने के लिए जमीनी स्तर पर काम करता है।

  • इसका मुख्य उद्देश्य 2030 तक भारत में सड़क दुर्घटनाओं और मौतों को आधा करने के राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा सहयोग देना है।


आईआईटी खड़गपुर की रिसर्च में क्या बड़े बदलाव देखने को मिले?

यह अध्ययन पश्चिम बंगाल में NH-16 के बालीहाटी और कोलाघाट के बीच 51 किलोमीटर लंबे हिस्से पर किया गया था। जहां डिजाइन-आधारित गति प्रबंधन उपायों के असर को बारीकी से परखा गया। इसके जो नतीजे आए, वे बेहद चौंकाने और राहत देने वाले थे:

  • कारों की रफ्तार में कमी: इन वैज्ञानिक उपायों को लागू करने के बाद कारों की ऑपरेटिंग स्पीड में 39 से 45 प्रतिशत तक की भारी कमी दर्ज की गई।

  • भारी वाहनों पर लगाम: भारी वाहनों (ट्रकों और बसों) की गति में भी 29 से 33 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई।

  • दोपहिया वाहनों की स्पीड कंट्रोल: बाइक और स्कूटर जैसे टू-व्हीलर्स की रफ्तार भी 18 से 28 प्रतिशत तक कम पाई गई।

  • मौतों के आंकड़ों में गिरावट: सबसे बड़ी बात यह रही कि जिन जगहों पर ये वैज्ञानिक उपाय किए गए थे, वहां जानलेवा हादसों, कुल मौतों, एक्सीडेंट की गंभीरता और किसी मामूली हादसे के 'जानलेवा' में तब्दील होने के जोखिम में भारी कमी दर्ज की गई।

IIT Kharagpur Study: Scientific Speed Management Can Drastically Reduce Fatal Crash Risks on Indian Highways
Road Accident - फोटो : Amar Ujala

भारतीय सड़कों पर ओवर-स्पीडिंग कितनी बड़ी विलेन है?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की 'रोड एक्सीडेंट्स इन इंडिया 2024' की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि तेज रफ्तार हमारी सड़कों पर कितनी जानलेवा साबित हो रही है:

  • 62% हादसों की वजह: देश में होने वाले कुल सड़क हादसों में से 62 प्रतिशत केवल ओवर-स्पीडिंग (तय सीमा से तेज गाड़ी चलाना) की वजह से होते हैं।

  • 1 लाख से ज्यादा मौतें: इस बेलगाम रफ्तार के कारण देश भर में एक साल के भीतर एक लाख से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

  • पैदल यात्री सबसे ज्यादा असुरक्षित: इस स्थिति का सबसे दुखद पहलू यह है कि सड़कों पर चलने वाले सबसे कमजोर लोग इसका शिकार बनते हैं, जिनमें कुल सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में 20.6 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले पैदल चलने वालों की है।

 

एक्सपर्ट्स का 'सेफ सिस्टम एप्रोच' को लेकर क्या कहना है?

आईआईटी खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और रोड सेफ्टी नेटवर्क के सदस्य प्रो. (डॉ.) भार्गव मैत्रा ने इस रिसर्च और 'सेफ सिस्टम एप्रोच' पर जोर देते हुए कहा:

"सेफ सिस्टम एप्रोच हमें यह याद दिलाता है कि इंसान गलतियां कर सकता है, लेकिन हमारी सड़कें, नीतियां और सिस्टम ऐसे डिजाइन होने चाहिए कि उन मानवीय गलतियों की कीमत किसी को अपनी जान देकर या गंभीर रूप से घायल होकर न चुकानी पड़े। वैज्ञानिक गति प्रबंधन इसी दृष्टिकोण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।"

उन्होंने आगे कहा कि साक्ष्य बताते हैं कि जब वाहनों की गति को सड़क की बनावट और सड़क का उपयोग करने वाले सभी लोगों (विशेषकर पैदल यात्रियों) की सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप तय किया जाता है, तो सुरक्षा के परिणाम काफी बेहतर होते हैं। 

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IIT Kharagpur Study: Scientific Speed Management Can Drastically Reduce Fatal Crash Risks on Indian Highways
Road Accident - फोटो : संवाद

इस हाई-लेवल मीटिंग में किन दिग्गजों ने अपने विचार रखे?

इस अध्ययन के निष्कर्षों को आईआईटी खड़गपुर रिसर्च पार्क में 'रोड सेफ्टी नेटवर्क' और 'आईआईटी खड़गपुर' द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक उच्च स्तरीय संवाद के दौरान प्रस्तुत किया गया। इसमें "साक्ष्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से सड़क सुरक्षा को आगे बढ़ाना" विषय पर आयोजित मुख्य सत्र में कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

रोड सेफ्टी नेटवर्क ने सरकार को क्या मुख्य सुझाव दिए हैं?

संवाद के दौरान, रोड सेफ्टी नेटवर्क (RSN) ने केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के साथ-साथ राज्य और स्थानीय अधिकारियों के सामने स्पीड मैनेजमेंट को मजबूत करने के लिए कुछ प्रमुख सिफारिशें रखी हैं, जो एक व्यापक 'सेफ सिस्टम दृष्टिकोण' पर आधारित हैं:

  • सड़क के प्रकार और उस पर चलने वाले लोगों के जोखिम के आधार पर स्पीड लिमिट का तार्किक निर्धारण किया जाए।

  • सड़क के माहौल को देखते हुए कांटेक्स्ट-सेंसिटिव स्पीड जोनिंग फ्रेमवर्क अपनाया जाए।

  • सड़क के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए और एक्सेस कंट्रोल की व्यवस्था सुधारी जाए।

  • नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए टेक्नोलॉजी और आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए।

  • दुर्घटना के आंकड़ों और साक्ष्य प्रणालियों को बेहतर किया जाए ताकि भविष्य की नीतियां सटीक बन सकें।

  • परिवहन, पुलिस, स्वास्थ्य और शहरी विकास जैसे विभिन्न विभागों के बीच आपसी संस्थागत समन्वय को और ज्यादा मजबूत किया जाए।

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