EV: फर्श से अर्श तक का सफर, दिवालिया होने की कगार पर खड़ी कंपनी कैसे बनी ईवी डिजाइन में ग्लोबल लीडर?
From Near Shutdown to Global Leader: आज टाटा एलेक्सी इलेक्ट्रिक वाहनों के डिजाइन से लेकर हॉलीवुड फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स तक में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही है, लेकिन कभी यह कंपनी बंद होने की कगार पर थी। कंपनी के पूर्व प्रमुख एस देवराजन ने अपनी किताब डिजाइन टू विन में बताया है कि कैसे भारी घाटे से जूझ रही यह कंपनी कैसे एक ग्लोबल लीडर बनी।
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टाटा एलेक्सी आज दुनिया की एक बहुत बड़ी कंपनी है। यह बिजली से चलने वाली गाड़ियों (ईवी) का डिजाइन बनाती है और हॉलीवुड फिल्मों के लिए स्पेशल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) का काम भी करती है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। एक समय था जब यह कंपनी डूबने वाली थी और इसे बंद करने की नौबत आ गई थी। इस कंपनी के पूर्व मुखिया एस देवराजन ने अपनी नई किताब 'डिजाइन टू विन' में बताया है कि कैसे हार मान चुकी इस कंपनी ने जबरदस्त वापसी की और कामयाबी की ऊंचाइयों को छुआ।
कंपनी के शुरुआती संघर्ष
टाटा एलेक्सी की शुरुआत 1979 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में हुई थी। इसे जो रिजी और थम्पी थॉमस ने मिलकर शुरू किया था। थम्पी थॉमस उन पहले भारतीयों में से एक थे जिन्होंने अमेरिका में अपनी कंप्यूटर कंपनी खोली थी। उस दौर में जब लोग कंप्यूटर के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे तब यह कंपनी बहुत एडवांस 'सुपर कंप्यूटर' बना रही थी। टाटा ग्रुप को इस कंपनी का आइडिया बहुत पसंद आया और उन्होंने इसमें पैसा लगाया। इसके बाद 1990 में इस कंपनी को भारत लाया गया और 1991 में पहली बार इसके शेयर बाजार में आए (आईपीओ), जिससे कंपनी ने 15.50 करोड़ रुपये जुटाए।
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जब अस्तित्व पर मंडराया संकट
देवराजन साल 1993 में इस कंपनी में सेल्स हेड (बिक्री प्रमुख) बनकर आए थे। उनका कहना है कि बिजनेस के लिए पैसा इकट्ठा करना आसान है लेकिन उस पैसे से मुनाफा कमाना बहुत मुश्किल काम है। उस समय कंपनी की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसका घाटा उसकी कुल कीमत के बराबर पहुंच गया था। किताब में उन्होंने एक कड़वी याद साझा की है। जब वे पहली बार काम के सिलसिले में जमशेदपुर में टाटा स्टील के एक बड़े अधिकारी से मिले तो उस अधिकारी ने उन्हें बहुत खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा- 'तुमने इस बेकार कंपनी में नौकरी क्यों की? यह तो शुरू से ही फ्लॉप है। बेहतर होगा कि इसे बंद कर दो या फिर इसे टीसीएस में मिला दो।' उस अधिकारी की बातें सुनकर देवराजन को बहुत बुरा लगा लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय इसे एक चुनौती की तरह लिया। उन्होंने ठान लिया कि वे इस कंपनी को फिर से खड़ा करके दिखाएंगे।
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| शुरुआत | 1979 (कैलिफोर्निया, अमेरिका) |
| संस्थापक | जो रिजी और थम्पी थॉमस |
| भारत में एंट्री | 1990 में शामिल हुई, 1991 में आईपीओ आया (15.50 करोड़ रुपए) |
| सबसे बुरा दौर | 1993-95 (घाटा कंपनी की कुल कीमत के बराबर पहुंच गया था) |
| बड़ा मोड़ | 1996 में एस देवराजन सीईओ बने |
| मुख्य बदलाव | हार्डवेयर बनाने के बजाय 'डिजाइन और सर्विस' पर फोकस किया |
| आज की पहचान | ईवी डिजाइन, टेक इनोवेशन और हॉलीवुड वीएफएक्स |
टर्नअराउंड: कैसे बदली किस्मत?
1996 में देवराजन कंपनी के बॉस (सीईओ) बने। उन्होंने समझ लिया था कि सिर्फ कंप्यूटर का सामान (हार्डवेयर) बनाकर कंपनी नहीं चलेगी। उन्होंने तय किया कि टाटा एलेक्सी को अब डिजाइन और नई टेक्नोलॉजी पर ध्यान देना चाहिए।
नई प्लानिंग: कंपनी ने कंप्यूटर के पुर्जे बनाना कम कर दिया और ग्राहकों को तकनीकी सेवाएं (सर्विसेज) देना शुरू किया।
तरक्की: 1990 का दशक खत्म होते-होते कंपनी का सारा घाटा खत्म हो गया। कंपनी इतनी फायदे में आ गई कि उसने अपने निवेशकों को मुनाफे का हिस्सा (डिविडेंड) बांटना शुरू कर दिया।
बढ़त: उन्होंने केरल के तिरुवनंतपुरम में एक नया सेंटर खोला। जल्द ही कंपनी की आधी कमाई सेवाओं के जरिए होने लगी।
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आज की स्थिति
आज टाटा एलेक्सी की गिनती टाटा ग्रुप की सबसे बेहतरीन कंपनियों में होती है। यह कंपनी अब सिर्फ कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की इलेक्ट्रिक गाड़ियों (ईवी) के डिजाइन तैयार कर रही है। इतना ही नहीं, यह हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों के लिए स्पेशल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) और तकनीकी मदद भी देती है। जो कंपनी कभी पूरी तरह बंद होने की कगार पर पहुंच गई थी, आज वही कंपनी कामयाबी की नई मिसाल बन चुकी है।