Biofuel Technology: ब्राजील ने फ्लेक्स वाहनों से घटाया प्रदूषण, भारत कब उठाएगा कदम?
Biofuel Technology: डाटा ग्रो कंसलटेंसी के संस्थापक डॉ. प्लिनियो नास्तारी ने कहा कि ब्राजील के पास जमीन ज्यादा है, और जनसंख्या कम है। ऐसे में यहां बायोफ्यूल का भरपूर उत्पादन होता है। उन देशों में जहां पर जनसख्यां अधिक है, लेकिन जमीन उतनी नहीं है। वहां भी तकनीक के माध्यम से बायोफ्यूल का उत्पादन संभव है...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बायोफ्यूल तकनीक, भारत और ब्राजील के रिश्तों को और ज्यादा प्रगाढ़ बना सकती है। चूंकि दोनों देशों में कृषि क्षेत्र को बड़ी प्रमुखता दी जाती है और लोगों का इसके साथ विशेष जुड़ाव रहा है। बायोफ्यूल उत्पादन की तकनीक, दोहरा फायदा प्रदान करती है। इससे जमीन और पर्यावरण, दोनों को बचाने में मदद मिलती है। साथ ही इसका इस्तेमाल विशेषकर कृषि क्षेत्र और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र से जुड़े उपकरण एवं वाहन बायोफ्यूल से संचालित होते हैं। शुक्रवार को दक्षिण दिल्ली में स्थित गार्गी कालेज में इकोमंत्रा द्वारा आयोजित सेमिनार में डाटा ग्रो कंसलटेंसी के संस्थापक डॉ. प्लिनियो नास्तारी ने यह बात कही है। उन्होंने पर्यावरण को संरक्षित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में बायोफ्यूल की अहम भूमिका के बारे में बताया।
फ्लेक्स वाहनों से कम होगा प्रदूषण
इकोनॉमिक्स एसोसिएशन ऑफ गार्गी कालेज द्वारा आयोजित सेमिनार में डॉ. प्लिनियो नास्तारी ने कई देशों के प्रदूषित शहरों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया कि ब्राजील का सबसे बड़ा वाइब्रेंट फाइनेंसियल सेंटर साऊ पोलो है, इसके बावजूद वहां की एयर क्वॉलिटी बेहतर स्थिति में है। इसके पीछे वहां के फ्लेक्स वाहन एक बड़ा कारण हैं। इन वाहनों के इंजन को ऊर्जा प्रदान करने में बायोफ्यूल ईंधन का 27 फीसदी योगदान होता है। इसके चलते ब्राजील में डी-कार्बेनाइजेशन संभव हो सका है। बता दें कि ब्राजील, दुनिया की टॉप टेन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बायोफ्यूल की ख़ासियत यह है कि इसे सुरक्षित रखने में कोई दिक्कत नहीं आती। अगर सामान्य तौर पर हाइड्रोजन को किसी टाइटेनियम टैंक में सुरक्षित रखते हैं, तो वह काफी महंगा पड़ता है और साथ ही जोखिम भरा रहता है। दुनिया में इलेक्ट्रिक व्हीकल के मुकाबले बायोफ्यूल उतना पॉपुलर क्यों नहीं हो पा रहा, प्रोफेसर सिदार्थ राठौर द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में डॉ नास्तारी ने कहा, हां ये सच है। प्रभावी मार्केटिंग की कमी, इसका एक बड़ा कारण हो सकता है, लेकिन यह तय है कि ये आसानी से उत्पादित किया जा सकता है। बायोफ्यूल का उत्पादन तकरीबन हर जगह पर संभव है।
भारत और ब्राजील के संदर्भ में उन्होंने कहा, ब्राजील के पास जमीन ज्यादा है, और जनसंख्या कम है। ऐसे में यहां बायोफ्यूल का भरपूर उत्पादन होता है। उन देशों में जहां पर जनसख्यां अधिक है, लेकिन जमीन उतनी नहीं है। वहां भी तकनीक के माध्यम से बायोफ्यूल का उत्पादन संभव है। उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा, भारत दुनिया में गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। गन्ने से एथेनॉल का उत्पादन होता है। यहां केवल मशीनरी की जरूरत है। इससे बायोफ्यूल उत्पादन किया जा सकता है। भले ही यहां जमीन कम हो, लेकिन कच्चा माल अधिक है। वह आसानी से उपलब्ध है। गन्ना की बहुतायत है। यहां की मौजूदा व्यवस्था में बायोफ्यूल की तरफ बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं।
बॉयोफ्यूल आसानी से हो सकता है ट्रांसपोर्ट
प्रोफेसर निवेदिता मलिक ने डॉ. नास्तारी से सवाल पूछा कि कैसे भारत और ब्राजीत के रिश्तों में बायोफ़्यूल कैसे मजबूती प्रदान कर सकता है, तो उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच कृषि क्षेत्र को लेकर एक जैसा जुड़ाव है। जैसे भारत में कृषि को बहुत महत्व देते हैं, ऐसे ही ब्राजील में कृषि प्राथमिकता पर रहती है। डॉ. तनजोत सिंह के इस सवाल के जवाब में कि इलेक्ट्रानिक कार बैट्री के मुकाबले बॉयोफ्यूल कहां स्टैंड करता है, इसके जवाब उन्होंने कहा कि बॉयोफ्यूल आसानी से उपलब्ध है, वितरण में आसान है। इसका ट्रांसपोर्ट सिस्टम बहुत सुगम है। ये किफायती भी है। फॉक्सवैगन के प्रोडेक्ट इंजीनियर रोजर गिलहेरमे ने ब्राजील की ऑटो इंडस्ट्री में बॉयोफ्यूल के इस्तेमाल पर प्रकाश डाला। सेमिनार में इंकोमंत्र की क्रिएटिव हेड एरा ने मॉडरेट की भूमिका निभाई, जबकि अध्यक्ष भूमिता यादव ने वोट ऑफ थैंक्स किया। इस मौके पर भारत में ब्राजील दूतावास के सेक्रेटरी डेनियल कोहलर लेइट और दूतावास में सहायक आदित्य विक्रम जैन सहित कालेज का स्टाफ एवं छात्राएं मौजूद रहीं।