{"_id":"63c8b07d68ea7e3a2f34a630","slug":"zodiac-sign-and-nakshatra-very-important-role-in-vedic-astrology-which-is-important-rashi-or-nakshatra-2023-01-19","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Astrology: राशियां काल्पनिक हैं तो फिर कोई ग्रह कैसे राशि परिवर्तन कर सकता है?","category":{"title":"Astrology","title_hn":"ज्योतिष","slug":"astrology"}}
Astrology: राशियां काल्पनिक हैं तो फिर कोई ग्रह कैसे राशि परिवर्तन कर सकता है?
Thu, 19 Jan 2023 08:26 AM IST
विनोद शुक्ला
शैली प्रकाश
शैली प्रकाश
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 19 Jan 2023 08:26 AM IST
विज्ञापन
वैदिक ज्योतिष में नक्षत्र को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है न कि राशियों को।
- फोटो : iStock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
- जिस तरह धरती को कर्क, भूमध्य और मकर रेखा नाम से काल्पनिक रेखा में विभाजित करके हम भूगोल को समझते हैं उसी तरह आकाश मंडल को भी राशियों में विभाजित करके खगोल को समझते हैं। हमने खगोल को 360 कल्पित अंशों में विभाजित किया है ताकि हम इसकी सुगमता से शिक्षा दे पाएं। आकाश में न तो कोई बिच्छू, न मकर और न ही कोई सिंह हैं। राशियों का स्वरूप व आकृति हमारी कल्पना है।
- 360 डिग्री में विभाजित आकाश को 30-30 डिग्री में बांटा गया है। इस तरह 360 डिग्री 12 भागों में विभाजित होती है। यही बारह भाग राशियां हैं। इस राशि चक्र को भचक्र या आभासीय पथ भी कहते हैं। इस आभासीय पथ पर आने वाले तारा समूहों को 27 भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक तारा समूह एक नक्षत्र है। इस भचक्र पर सभी ग्रह और नक्षत्र बारी बारी से पूर्व में उदित होकर पश्चिम में अस्त होते हैं। पूर्व में उदित हुई राशि ही कुंडली का लग्न होती है। यानी की इस आभासीय पथ से 27 नक्षत्र एक के बाद एक गुजरते जाते हैं। इस 27 नक्षत्रों को भी सुविधानुसार 12 भागों में विभाजित कर दिया गया है। ये 12 भाग ही राशियां कहलाती हैं।
- यदि हम प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों की बात करें तो श्रौत, गृह्य, धर्म सूत्रों और याज्ञवल्क्य स्मृति में राशियों का उल्लेख नहीं मिलता है, उसमें केवल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्र 27 माने गए हैं। एक 28वां नक्षत्र भी है जिसे अभिजीत कहा गया है। आकाश में स्थित तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। एक राशि में हमें सवा दो नक्षत्र नजर आते हैं। यानी 30 डिग्री में बंटे हुए भाग में हमें 2 नक्षत्र तो स्पष्ट नजर आते हैं लेकिन एक अन्य नक्षत्र का एक चौथाई हिस्सा ही उसमें नजर आता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
- वैदिक ज्योतिष में नक्षत्र को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है न कि राशियों को। वैदिक ज्योतिषियों ने आकाश को 27 नक्षत्रों में विभाजित करके खगोल को समझा लेकिन पुराणों के काल में आसमान का विभाजन 12 हिस्सों में कर दिया गया, जिसे हम 12 अलग-अलग राशियों के नाम से जानते हैं।
- दरअसल, चंद्रमा अपनी कक्षा पर चलता हुआ पृथ्वी की एक परिक्रमा को 27.3 दिन में पूरा करता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा प्रतिदिन लगभग नक्षत्र के एक भाग में यात्रा करता है। ज्योतिष शास्त्र में सही और सटीक भविष्यवाणी करने के लिए नक्षत्र का उपयोग किया जाता हैं न कि राशियों का।
- यदि आप आकाश को 12 समान भागों में विभाजित करते हैं, तो प्रत्येक भाग को राशि कहा जाता है, लेकिन अगर आप आकाश को 27 समान भागों में विभाजित करते हैं तो प्रत्येक भाग को नक्षत्र कहा जाता है। जिस तरह हमने 360 डिग्री को 12 भागों में बांटा है उसी तरह हम 360 डिग्री को 27 भागों बांटते हैं, तो एक नक्षत्र करीब 13.33 डिग्री के रूप में आती है। देखा जाए तो नक्षत्र एक छोटा-सा हिस्सा है और राशि एक बड़ा हिस्सा होता है।
- कोई भी ग्रह मानव द्वारा निर्मित कल्पित राशियों में प्रवेश नहीं करता है बल्कि वह नक्षत्र मंडल में प्रवेश करता है। किसी भी व्यक्ति का जन्म किसी न किसी नक्षत्र में तब होता है जबकि वह 12 भागों में विभाजित राशियों में से लग्नस्थ राशि में नक्षत्र भ्रमण काल के दौरान या कि जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, वही उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र होता है। शास्त्रों में नक्षत्र शांति के उपाय हैं न कि राशि शांति के।
- यदि हम राशियों को नहीं मानते हैं तो फिर राशियों पर आधारित दैनिक, मासिक और वार्षिक भविष्यफल को भी नकारना होगा और तब फिर शनि की ढैया और साढ़े साती का भी कोई मतलब नहीं रह जाता है। उल्लेखनीय है कि राशियों पर आधारित ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह वर्तमान में कुंभ राशि में गोचर कर रहा है जबकि नक्षत्र पर आधारित ज्योतिष गणना के अनुसार वह 18 फरवरी 2022 से धनिष्ठा नक्षत्र में भ्रमण कर रहा है वहां पर वह 15 मार्च 2023 तक रहेगा। हमें यह सोचना होगा कि हम राशियों के अस्तित्व को किस तरह से सही साबित करके फलित ज्योतिष को चलाएं रख सकते हैं?
Pitra Dosh: आखिर कैसे बनता है किसी कुंडली में पितृ दोष ? क्या है इसका निवारण
12 कल्पित क्षेत्रों में भ्रमण करने वाले 27 नक्षत्र
मेष- अश्विनी, भरणी, कृतिका
वृषभ- कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा
मिथुन- मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु
कर्क- पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा
सिंह- मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी
कन्या- उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा
तुला- चित्रा, स्वाति, विशाखा
वृश्चिक- विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा
धनु- मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा
मकर- उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा
कुंभ- धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद
मीन- पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती
नक्षत्रों के गृह स्वामी :-
केतु:- अश्विनी, मघा, मूल।
शुक्र:- भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा।
रवि:- कार्तिक, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा।
चन्द्र:- रोहिणी, हस्त, श्रवण।
मंगल:- मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा।
राहु:- आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा।
बृहस्पति:- पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद।
शनि:- पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद।
बुध:- आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।
मेष- अश्विनी, भरणी, कृतिका
वृषभ- कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा
मिथुन- मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु
कर्क- पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा
सिंह- मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी
कन्या- उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा
तुला- चित्रा, स्वाति, विशाखा
वृश्चिक- विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा
धनु- मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा
मकर- उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा
कुंभ- धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद
मीन- पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती
नक्षत्रों के गृह स्वामी :-
केतु:- अश्विनी, मघा, मूल।
शुक्र:- भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा।
रवि:- कार्तिक, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा।
चन्द्र:- रोहिणी, हस्त, श्रवण।
मंगल:- मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा।
राहु:- आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा।
बृहस्पति:- पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद।
शनि:- पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद।
बुध:- आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।