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Pitra Dosh: आखिर कैसे बनता है किसी कुंडली में पितृ दोष ? क्या है इसका निवारण
Wed, 18 Jan 2023 03:38 PM IST
विनोद शुक्ला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 18 Jan 2023 03:38 PM IST
सार
वैदिक ज्योतिष में इसे पिता का कारक कहा गया है तो राहु और शनि जब सूर्य को प्रभावित करते है तो ‘पितृ दोष’ का निर्माण होता है। इस दोष में शर्त यह है कि सूर्य राहु से युति होना चाहिए और उस पर शनि की दृष्टि होनी चाहिए।
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pitru dosh : सूर्य आत्मा का कारक है वही वैदिक ज्योतिष में इसे पिता का कारक कहा गया है
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ज्योतिष में कालसर्प योग के बाद अगर कोई दोष शोध का कारण बना है तो वो है ‘पितृ दोष’, दरअसल कालसर्प दोष की तरह ही यह एक ऐसा दोष है जिसमें कमोबेश जातक को समान फल भोगने पड़ते हैं। वैसे कालसर्प योग में राहु का प्रभाव अधिक रहता है लेकिन इस दोष में राहु के साथ-साथ ही शनि का दोष भी समान रूप से प्रभावी होता है। सूर्य आत्मा का कारक है वही वैदिक ज्योतिष में इसे पिता का कारक कहा गया है तो राहु और शनि जब सूर्य को प्रभावित करते है तो ‘पितृ दोष’ का निर्माण होता है। इस दोष में शर्त यह है कि सूर्य राहु से युति होना चाहिए और उस पर शनि की दृष्टि होनी चाहिए। दूसरी ओर अगर शनि सूर्य के साथ हो या राहु उसे देख रहा हो तो भी विद्वानों से इसे ‘पितृ दोष’ कहा है।
ज्योतिष के विद्वान कहते है कि अगर पंचम और नवम में ऐसी ग्रह स्थिति हो तो निश्चित ही जातक को ‘पितृ दोष’ से पीड़ित जाने। दरअसल पंचम भाव पिछले जन्म का भाव है वही नवम भाव उससे पंचम यानी धर्म का भाव होने के कारण विद्वानों ने ऐसा कहा है। दरअसल दक्षिण भारत में कुछ विद्वान नवम भाव से पिता का विचार करते है वही इस भाव से पुत्र के पुत्र का भी विचार होता है इसलिए नवम भाव में यह दोष बने तो घातक होगा ऐसा कथन उचित जान पड़ता है।
जानकार यह भी कहते है कि अगर चन्द्रमा भी शनि राहु से युक्त पीड़ित हो तो जातक को मातामही का दोष लगता है। इसके अलावा अगर सूर्य चंद्र दोनों पीड़ित हो तो बेहद नकारात्मक प्रभाव जातक के ऊपर पड़ता है। हालांकि विज्ञान के अनुसार सूर्य चंद्र सिर्फ अमावस को ही एक दूसरे से बेहद करीब होंगे और ऐसे में पंचम नवम में शनि राहु से युति या दृष्टि की शर्त कई सालों में एक बार आएगी।
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दरअसल राहु चंद्र को कमजोर करता है वही वायु तत्व शनि उस युति को और भड़का देता है जिससे जातक जीवन भर मान सम्मान को तरस जाता है और उसे कहीं भी शांति नहीं मिलती है। हमारी संस्कृति में पितरों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और जीवित ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी हम उनके निमित्त श्राद्ध कर्म करते है।
अगर किसी जातक की कुंडली में ऊपर दी गई ग्रह स्थिति बन रही है तो उसे पितृ पक्ष में किसी विद्वान आचार्य से इस दोष की शांति करवानी चाहिए। अगर किसी की कुंडली नहीं है तो भी विद्वानों ने पितृ दोष के कुछ लक्षण कहे है।
1 - इस दोष से पीड़ित जातक हर जगह असफलता हासिल करता है भले ही वो अपना स्थान ही क्यों न बदल ले।
2 - ऐसे जातक के घर में कभी शांति नहीं होगी। विवाह के कई वर्षों के बाद भी संतान नहीं होती है।
3 - ऐसे जातक को कोई ना कोई बीमारी घेरे रहती है। उसे शरीर में हमेशा भारीपन लगता है।
4 - ऐसा जातक घर में कोई मांगलिक काम भी करवाना चाहे तो उसके काम में बाधा आती है।
5 - ऐसे जातक के घर में अच्छी खासी कमाई के बाद भी पुत्रों में झगड़ा लगा रहता है।
इस दोष से बचने के कुछ उपाय
1 - हर अमावस को देवताओं को भोग लगाकर अपने पितरों के निमित्त अन्न और वस्त्र भेंट करना चाहिए।
2 - सूर्य देव की रोजाना विधिवत पूजा करे और अर्घ्य दे।
3 - सूर्य देव के सामने अपने पितरों की शांति की प्रार्थना करें।
4 - साल में एक बार किसी पवित्र नदी के किनारे पितरों के निमित्त गरीबों को भोजन दे।
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ज्योतिष के विद्वान कहते है कि अगर पंचम और नवम में ऐसी ग्रह स्थिति हो तो निश्चित ही जातक को ‘पितृ दोष’ से पीड़ित जाने। दरअसल पंचम भाव पिछले जन्म का भाव है वही नवम भाव उससे पंचम यानी धर्म का भाव होने के कारण विद्वानों ने ऐसा कहा है। दरअसल दक्षिण भारत में कुछ विद्वान नवम भाव से पिता का विचार करते है वही इस भाव से पुत्र के पुत्र का भी विचार होता है इसलिए नवम भाव में यह दोष बने तो घातक होगा ऐसा कथन उचित जान पड़ता है।
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जानकार यह भी कहते है कि अगर चन्द्रमा भी शनि राहु से युक्त पीड़ित हो तो जातक को मातामही का दोष लगता है। इसके अलावा अगर सूर्य चंद्र दोनों पीड़ित हो तो बेहद नकारात्मक प्रभाव जातक के ऊपर पड़ता है। हालांकि विज्ञान के अनुसार सूर्य चंद्र सिर्फ अमावस को ही एक दूसरे से बेहद करीब होंगे और ऐसे में पंचम नवम में शनि राहु से युति या दृष्टि की शर्त कई सालों में एक बार आएगी।
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दरअसल राहु चंद्र को कमजोर करता है वही वायु तत्व शनि उस युति को और भड़का देता है जिससे जातक जीवन भर मान सम्मान को तरस जाता है और उसे कहीं भी शांति नहीं मिलती है। हमारी संस्कृति में पितरों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और जीवित ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी हम उनके निमित्त श्राद्ध कर्म करते है।
अगर किसी जातक की कुंडली में ऊपर दी गई ग्रह स्थिति बन रही है तो उसे पितृ पक्ष में किसी विद्वान आचार्य से इस दोष की शांति करवानी चाहिए। अगर किसी की कुंडली नहीं है तो भी विद्वानों ने पितृ दोष के कुछ लक्षण कहे है।
1 - इस दोष से पीड़ित जातक हर जगह असफलता हासिल करता है भले ही वो अपना स्थान ही क्यों न बदल ले।
2 - ऐसे जातक के घर में कभी शांति नहीं होगी। विवाह के कई वर्षों के बाद भी संतान नहीं होती है।
3 - ऐसे जातक को कोई ना कोई बीमारी घेरे रहती है। उसे शरीर में हमेशा भारीपन लगता है।
4 - ऐसा जातक घर में कोई मांगलिक काम भी करवाना चाहे तो उसके काम में बाधा आती है।
5 - ऐसे जातक के घर में अच्छी खासी कमाई के बाद भी पुत्रों में झगड़ा लगा रहता है।
इस दोष से बचने के कुछ उपाय
1 - हर अमावस को देवताओं को भोग लगाकर अपने पितरों के निमित्त अन्न और वस्त्र भेंट करना चाहिए।
2 - सूर्य देव की रोजाना विधिवत पूजा करे और अर्घ्य दे।
3 - सूर्य देव के सामने अपने पितरों की शांति की प्रार्थना करें।
4 - साल में एक बार किसी पवित्र नदी के किनारे पितरों के निमित्त गरीबों को भोजन दे।
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