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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   shani jayanti 2022 know story how to How Shani Dev became a Judge and impact on shani sade sati

Shani Jayanti 2022: शनिदेव कैसे बने न्यायाधीश और क्यों रहता है साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव?

Mon, 30 May 2022 04:28 PM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली
पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 30 May 2022 04:28 PM IST
सार

भगवान शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ मास की अमावस्या को हुआ। इनका जन्म सूर्यदेव की दूसरी पत्नी छाया से हुआ।

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shani jayanti 2022 know story how to How Shani Dev became a Judge and impact on shani sade sati
shani jayanti 2022: शनि जयंती के दिन छाया दान या शनिदेव पर तेल चढ़ाना अति लाभकारी माना गया है। - फोटो : iStock

विस्तार

भगवान शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ मास की अमावस्या को हुआ। इनका जन्म सूर्यदेव की दूसरी पत्नी छाया से हुआ। शनिदेव जब मां के गर्भ में थे तब मां छाया भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन थी उन्हें अपने खान-पान तक की सुध नहीं थी। छाया के तप के प्रभाव से गर्भस्थ शिशु शनि भी जन्म लेने के पश्च्यात पूर्णतः शिवभक्ति में लीन रहने लगे । एक दिन उन्होंने सूर्यदेव से कहा कि पिता श्री मैं हर तरह में आपसे सात गुना ज्यादा होना चाहता हूं,यहाँ तक कि आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना अधिक हो,मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो,मेरे वेग का कोई सामना नहीं कर पाएं,चाहे वह देव,असुर,दानव या सिद्ध साधक ही क्यों न हो। आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे,मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों और मैं भक्ति-ज्ञान से पूर्ण हो जाऊं। 

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शनि के उच्चविचारों से प्रसन्न हो सूर्यदेव ने कहा वत्स ! तुम अविमुक्त क्षेत्र काशी चले जाओ और वहीं शिव की तपस्या करो तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर शनिदेव काशी गए और शिवलिंग बनाकर अखण्ड शिव आराधना करने लगे। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उन्हें ग्रहों में सर्वोपरि स्थान तो दिया ही साथ ही मृत्युलोक का न्यायाधीश भी नियुक्त किया। इसका कठोरता से पालन हो सके उसके लिए ,साढ़ेसाती और ढैया नाम के ग्रह प्रभाव का वरदान भी दिया दिया। 
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इसमें साढ़ेसाती की अवधि सत्ताईस सौ दिन और ढैया की अवधि नौ सौ दिन घोषित की। तब से लेकर आज तक शनिदेव की ढैया और साढ़ेसाती का डर लोगों में व्याप्त है जिसका प्रभाव जीवन में व्यक्ति के शुभ-अशुभ आचरण और कर्म के अनुसार पड़ता है। पिता सूर्य ने इन्हें मकर और कुंभ राशि के साथ-साथ अनुराधा,पुष्य एवं उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का अधिपति बनाया। 
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शनिदेव ने जिस शिवलिंग की स्थापना की थी आज वही नवें ज्योतिर्लिंग 'श्रीकाशीविश्वनाथ'के नाम से जाने जाते हैं। भगवान शनि को प्रसन्न करने के लिए प्राणियों को शनि स्तोत्र,शनिकवच,शनि के वैदिक मंत्र का पाठ करना चाहिए। अपने बड़ों के प्रति सम्मान रखना चाहिए अहिंसा, उदारता,दयालुता,दया और सेवाभाव रखना ही शनिदेव की कृपा पाने के सरल उपाय हैं । इनके जन्मदिन पर वस्त्र और अन्नदान का विशेष महत्व रहता है। इस दिन शमी अथवा पीपल के वृक्ष का रोपण करने से नौ ग्रहों से सम्बंधित कष्ट कम हो जाते हैं।

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