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Astrology: जानिए क्या होती है लग्न कुंडली और ज्योतिष में इसका महत्व
सार
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब किसी जातक का जन्म होता है उसी समय उसकी लग्न निर्धारित हो जाती है। यह लग्न ही उसके संम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है और प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ता है।
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लग्न कुंडली का महत्व
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Lagna Kundli: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में लग्न कुंडली को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। जब किसी जातक की कुंडली किसी ज्योतिष शास्त्र के विद्वान के पास विश्लेषण के लिए आती है तो सबसे पहले यह बताया जाता है कि अमुक कुंडली इस लग्न की है। लग्न का ज्योतिष शास्त्र में क्या और कितना महत्व है। आइए जानते हैं।
कुंडली में लग्न भाव
वैदिक शास्त्र में फलित ज्योतिष की गणना के लिए कुंडली के 12 भाव, 9 ग्रह और 12 राशियों की गणना और इनका सूक्ष्म विश्लेषण करके जातक के जीवन के सभी पहलुओं, स्थितियों और पक्षों के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। जब किसी जातक का जन्म होता है तो कुंडली का एक खाका तैयार होता है, जिसमें 12 खाने या भाव या घर होते हैं। इन सभी 12 भावों का अपना-अपना महत्व होता है। कुंडली के इन 12 भावों में लग्न और लग्न भाव का सबसे अधिक महत्व होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब किसी जातक का जन्म होता है उसी समय उसकी लग्न निर्धारित हो जाती है। यह लग्न ही उसके संम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है और प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ता है। किसी बालक या बालिका के जन्म के समय आकाश में पूर्व दिशा में यानी आकाश मंडल के पूर्वी क्षितिज में 12 राशियों में जो राशि उदित होती है वह ही लग्न होती है। जैसे अगर कहा जाय कि अभी किसी जातक का जन्म हुआ है और पूर्वी क्षितिज पर सिंह राशि उदित है तो जातक सिंह लग्न होगा। इस तरह से अगर जातक के जन्म के समय कुंभ राशि पूर्वी क्षितिज में उदित हो रही है तो जातक की कुंडली कुंभ लग्न की होगी। कुंडली के पहले भाव में लग्न राशि को बैठाकर सभी तरह की ज्योतिषीय गणनाएं की जाती हैं।
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कुंडली में लग्न और लग्नेश का महत्व
कुंडली में लग्न के निर्धारण होने के साथ ही सभी 12 भावों में 12 राशियां विराजमान हो जाती हैं और इसके साथ ही सभी 9 ग्रह भी अलग-अलग या किसी एक भाव में एक या एक से अधिक ग्रह बैठे होते हैं। जैसे की हम सभी जानते हैं कि राशिचक्र का मान 360 डिग्री का होता है और इस राशिचक्र को 12 राशियों में बांटा जाता है। इस तरह से एक राशि का मान 30 डिग्री का होता है।
कुंडली के लग्न भाव यानी प्रथम भाव में जो राशि बैठी हुई होती है उसके स्वामी को लग्नेश कहा जाता है। जैसे कि अगर जातक की कुंडली कुंभ लग्न की है तो इसके लग्नेश शनिदेव हुए, क्योंकि कुंभ और मकर राशि शनिदेव होते हैं। फलित ज्योतिष में लग्न भाव और लग्नेश की बहुत ही ज्यादा भूमिका होती है। कुंडली का लग्न भाव संपूर्ण कुंडली का महत्वपूर्ण भाव माना जाता है। लग्न और लग्नेश ही कुंडली की लगभग आधी ताकत होती है। अगर किसी जातक की कुंडली में लग्न और लग्नेश अच्छे और मजबूत स्थिति में हैं कुंडली बहुत ही बली मानी जाती है। वहीं अगर लग्न और लग्नेश कमजोर हैं तो कुंडली भी कमजोर मानी जाती है।
लग्न भाव की गणनाएं
- किसी कुंडली का लग्न भाव सबसे महत्वपूर्ण भाव माना गया है।
- लग्न भाव कुंडली का आइना होता है। इससे जातक के शरीर, बल, रूप रंग, स्वभाव, आत्मा, मस्तिष्क, आकार, सेहत, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के बारे में जाना जाता है।
-किसी कुंडली में लग्न और लग्नेश अगर मजबूत होते हैं तो व्यक्ति की जीवन अच्छे से बीतता है। वहीं अगर लग्नेश कमजोर हो जो व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव और कई तरह की परेशानियों को सामना करना पड़ता है।
- कुंडली में अगर लग्न में शुभ ग्रह हैं या शुभ ग्रहों की द्दष्टि है या फिर लग्नेश केंद्र के भावों (1,4,7,10) या त्रिकोण के भावों में स्वराशि होकर बैठे हैं या फिर अपनी उच्च राशि में तो जातक का आत्मविश्वास से परिपूर्ण , सेहतमंद, सुखी और पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति करने वाला होता है। ऐसे जातकों का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक होता है।
- वहीं अगर कुंडली में लग्न और लग्नेश कमजोर या पीडित हो और पाप ग्रहों से प्रभावित, नीच राशि में तो व्यक्ति के आत्मविश्वास में कमी होती है, जीवन में तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सेहत अच्छी नहीं होती है और व्यक्ति के मान-सम्मान में गिरावट आती है।
ये हैं कुंडली के 12 लग्न
1- मेष लग्न
2- वृषभ लग्न
3- मिथुन लग्न
4- कर्क लग्न
5- सिंह लग्न
6- कन्या लग्न
7- तुला लग्न
8- वृश्चिक लग्न
9- धनु लग्न
10- मकर लग्न
11-कुंभ लग्न
12- मीन लग्न
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कुंडली में लग्न भाव
वैदिक शास्त्र में फलित ज्योतिष की गणना के लिए कुंडली के 12 भाव, 9 ग्रह और 12 राशियों की गणना और इनका सूक्ष्म विश्लेषण करके जातक के जीवन के सभी पहलुओं, स्थितियों और पक्षों के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। जब किसी जातक का जन्म होता है तो कुंडली का एक खाका तैयार होता है, जिसमें 12 खाने या भाव या घर होते हैं। इन सभी 12 भावों का अपना-अपना महत्व होता है। कुंडली के इन 12 भावों में लग्न और लग्न भाव का सबसे अधिक महत्व होता है।
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब किसी जातक का जन्म होता है उसी समय उसकी लग्न निर्धारित हो जाती है। यह लग्न ही उसके संम्पूर्ण जीवन का दर्पण होता है और प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ता है। किसी बालक या बालिका के जन्म के समय आकाश में पूर्व दिशा में यानी आकाश मंडल के पूर्वी क्षितिज में 12 राशियों में जो राशि उदित होती है वह ही लग्न होती है। जैसे अगर कहा जाय कि अभी किसी जातक का जन्म हुआ है और पूर्वी क्षितिज पर सिंह राशि उदित है तो जातक सिंह लग्न होगा। इस तरह से अगर जातक के जन्म के समय कुंभ राशि पूर्वी क्षितिज में उदित हो रही है तो जातक की कुंडली कुंभ लग्न की होगी। कुंडली के पहले भाव में लग्न राशि को बैठाकर सभी तरह की ज्योतिषीय गणनाएं की जाती हैं।
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कुंडली में लग्न और लग्नेश का महत्व
कुंडली में लग्न के निर्धारण होने के साथ ही सभी 12 भावों में 12 राशियां विराजमान हो जाती हैं और इसके साथ ही सभी 9 ग्रह भी अलग-अलग या किसी एक भाव में एक या एक से अधिक ग्रह बैठे होते हैं। जैसे की हम सभी जानते हैं कि राशिचक्र का मान 360 डिग्री का होता है और इस राशिचक्र को 12 राशियों में बांटा जाता है। इस तरह से एक राशि का मान 30 डिग्री का होता है।
कुंडली के लग्न भाव यानी प्रथम भाव में जो राशि बैठी हुई होती है उसके स्वामी को लग्नेश कहा जाता है। जैसे कि अगर जातक की कुंडली कुंभ लग्न की है तो इसके लग्नेश शनिदेव हुए, क्योंकि कुंभ और मकर राशि शनिदेव होते हैं। फलित ज्योतिष में लग्न भाव और लग्नेश की बहुत ही ज्यादा भूमिका होती है। कुंडली का लग्न भाव संपूर्ण कुंडली का महत्वपूर्ण भाव माना जाता है। लग्न और लग्नेश ही कुंडली की लगभग आधी ताकत होती है। अगर किसी जातक की कुंडली में लग्न और लग्नेश अच्छे और मजबूत स्थिति में हैं कुंडली बहुत ही बली मानी जाती है। वहीं अगर लग्न और लग्नेश कमजोर हैं तो कुंडली भी कमजोर मानी जाती है।
लग्न भाव की गणनाएं
- किसी कुंडली का लग्न भाव सबसे महत्वपूर्ण भाव माना गया है।
- लग्न भाव कुंडली का आइना होता है। इससे जातक के शरीर, बल, रूप रंग, स्वभाव, आत्मा, मस्तिष्क, आकार, सेहत, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के बारे में जाना जाता है।
-किसी कुंडली में लग्न और लग्नेश अगर मजबूत होते हैं तो व्यक्ति की जीवन अच्छे से बीतता है। वहीं अगर लग्नेश कमजोर हो जो व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव और कई तरह की परेशानियों को सामना करना पड़ता है।
- कुंडली में अगर लग्न में शुभ ग्रह हैं या शुभ ग्रहों की द्दष्टि है या फिर लग्नेश केंद्र के भावों (1,4,7,10) या त्रिकोण के भावों में स्वराशि होकर बैठे हैं या फिर अपनी उच्च राशि में तो जातक का आत्मविश्वास से परिपूर्ण , सेहतमंद, सुखी और पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति करने वाला होता है। ऐसे जातकों का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक होता है।
- वहीं अगर कुंडली में लग्न और लग्नेश कमजोर या पीडित हो और पाप ग्रहों से प्रभावित, नीच राशि में तो व्यक्ति के आत्मविश्वास में कमी होती है, जीवन में तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सेहत अच्छी नहीं होती है और व्यक्ति के मान-सम्मान में गिरावट आती है।
ये हैं कुंडली के 12 लग्न
1- मेष लग्न
2- वृषभ लग्न
3- मिथुन लग्न
4- कर्क लग्न
5- सिंह लग्न
6- कन्या लग्न
7- तुला लग्न
8- वृश्चिक लग्न
9- धनु लग्न
10- मकर लग्न
11-कुंभ लग्न
12- मीन लग्न