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Astrology: जानिए ज्योतिष में सूर्य ग्रह और सामान्य परिचय, सूर्य का ज्योतिष में क्या महत्व है?
Sat, 14 Jan 2023 11:58 AM IST
विनोद शुक्ला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 14 Jan 2023 11:58 AM IST
सार
सूर्य को ग्रहों के मंत्रिमंडल में राजा का स्थान प्राप्त है। कालपुरुष की कुंडली में सूर्य को पंचम स्थान और सिंह राशि का स्वामित्व प्राप्त है। सभी 7 ग्रह में से सूर्य चन्द्रमा की ही एक राशि होती है बाकी सभी ग्रहों की 2 राशि होती है।
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सूर्य का ज्योतिष में क्या महत्व है?
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण सूत्र है और वो है फलित विचार, दरअसल भविष्य में होने वाली किसी भी घटना के बारे में विचार करने को फलित विचार कहते हैं। फलित सूत्र में 9 ग्रह, 12 भाव और 27 नक्षत्रों से विचार किया जाता है।
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फलित में 9 ग्रह है, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ये 7 मूल ग्रह माने गये हैं वही 2 ग्रह राहु केतु छाया ग्रह माने गए है। राहु-केतु सदैव एक दूसरे से सप्तम होते हैं और विपरीत यानी वक्री गति से ही चलते हैं तो आइए आज आपको सूर्य ग्रह का सामान्य परिचय देते हैं।
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- सूर्य को ग्रहों के मंत्रिमंडल में राजा का स्थान प्राप्त है। कालपुरुष की कुंडली में सूर्य को पंचम स्थान और सिंह राशि का स्वामित्व प्राप्त है। सभी 7 ग्रह में से सूर्य चन्द्रमा की ही एक राशि होती है बाकी सभी ग्रहों की 2 राशि होती है। सूर्य अपनी ही सिंह राशि में मूल त्रिकोण होता है वही मेष राशि में यह उच्च का और शनि की राशि तुला में यह नीच का हो जाता है। आप आप यह सोच रहे होंगे की उच्च और नीच राशि का क्या मतलब है ? दरअसल फलित में हर ग्रह की उच्च और नीच राशि होती है। जन्म के समय अगर ग्रह उच्च राशि में हो तो वो आपके कारक का शुभ फल करेगा वही जिस भाव का स्वामी होगा उसकी वृद्धि होगी। लेकिन अगर जन्म के समय ग्रह नीच राशि में है तो वो अपने कारक और भाव की हानि करेगा, लेकिन नीच भंग राजयोग एक ऐसी कंडीशन है जहां नीच का ग्रह रिवर्स राजयोग बना देता है लेकिन इसकी चर्चा हम आगे कभी करेंगे तो जैसा की मैंने आपको बताया कि सूर्य मेष में उच्च तो तुला में नीच होता है।
- अब हम बात करते हैं नक्षत्रों की, इस नज़रिए से देखा जाये तो मेष राशि में यह कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण, वृषभ राशि में 2,3,4 चरण, सिंह राशि में उत्तरा फाल्गुनी का प्रथम चरण, कन्या राशि में 2,3,4 चरण और धनु राशि में उत्तराषाढ़ा के प्रथम चरण और मकर राशि में उत्तराषाढ़ा के 2,3,4 चरण पर इसका आधिपत्य है। अब इसका मतलब क्या हुआ ? इसका मतलब यह है कि जो भी जातक इन नक्षत्रों में पैदा होगा उनका स्वामी सूर्य होगा और उसे सूर्य की महादशा प्राप्त होगी, वही सूर्य जन्म कुंडली में जिस भी स्थिति में बैठा होगा जातक उस गुण को ग्रहण करेगा और उसी हिसाब से उसका व्यक्तित्व होगा।
- अब आगे बात करते है कि अगर जातक का सूर्य बलवान हो तो उसका क्या प्रभाव रहेगा और अगर सूर्य कमजोर हो तो उसका क्या असर जीवन पर होता है ? दरअसल फलित में हर ग्रह के पास अपना एक गुण तो होता ही है वही उसके पास एक निश्चित भाव के कारक की भी ज़िम्मेदारी होती है और सूर्य को हमारे आचार्यो ने लग्न का कारक बताया है। ज्योतिष में 12 भाव से मनुष्य के प्रश्नों का विचार किया जाता है जिसमें लग्न से उसकी मानसिकता, व्यक्तित्व ,सम्मान, ऊर्जा, आत्म-विश्वास, आशा, ख़ुशी, सांसारिक मामलों में सफलता आदि का विचार किया जाता है।
- अब 12 लग्न की कुंडली में पहले भाव से लेकर 12वें भाव तक सूर्य किसी एक भाव का स्वामी होगा तो अगर सूर्य बलवान है तो वो ना सिर्फ उस भाव के फलो में वृद्धि करेगा बल्कि ऊपर आपको कारक बताए है वो उसकी भी वृद्धि करेगा।वही प्रशासनिक अधिकारी, राजा का मंत्री जैसे पद भी सूर्य से प्राप्त होते हैं, अब कितनी वृद्धि करेगा ये डिपेंड करता है लग्नेश कितना बलवान है ! इसकी चर्चा हम आने वाले लेख में करेंगे। अब प्रश्न यह है की अगर सूर्य कमजोर हो तो वो कैसा फल देगा ? अगर किसी जातक की कुंडली में सूर्य अशुभ है तो वो जिस भाव का स्वामी है उसके फल में कमी करेगा वही जिस लग्न का कारक है तो उसके गुणों में कमी करेगा। आम तौर पर पीड़ित सूर्य के प्रभाव से जातक अहंकारी, उदास, विश्वासहीन, ईर्ष्यालु, क्रोधी, महत्वाकांक्षी, आत्म केंद्रित, क्रोधी बनता है। सूर्य आत्मकारक ग्रह होता है, इसके कमजोर होने से जातक आत्मविश्वासी नहीं होता है। पिता का कारक है तो पिता के सुख में भी यह कमी करता है।
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