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Guru Pushya Yoga 2021: मकान, वाहन और आभूषणों की खरीदारी का अद्भुत नक्षत्र 'पुष्य'

Thu, 25 Feb 2021 07:37 AM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 25 Feb 2021 07:37 AM IST
सार

पुष्य नक्षत्र उन्हीं नक्षत्रों में सर्वोपरि है। संहिता ज्योतिष में भी इन्हें सभी सत्ताईस नक्षत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है इस नक्षत्र के संयोग से बनने वाले शुभ योगों का प्रभाव अन्य योगों की तुलना में श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह नक्षत्र सभी अरिष्टों का नाशक औरसर्व दिग्गामी है।

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guru pushya yoga 2021 know what is guru pushya yoga
पुष्य नक्षत्र संहिता ज्योतिष में भी इन्हें सभी सत्ताईस नक्षत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सभी कार्यों में सिद्धि दिलाने वाली 'पुष्य' नक्षत्र का शुभ काल 24 फरवरी बुधवार को दोपहर 01 बजकर 15 मिनट से आरंभ होकर गुरुवार को दोपहर 01 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। इस नक्षत्र के स्वामी शनि हैं । मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार दिन-रात्रि के मध्य 30 मुहूर्त होते हैं जिनमें कई मुहूर्त ऐसे भी रहते हैं जिसमें कोई भी आवश्यक कार्य संपन्न किया जा सकता है किंतु, वार और नक्षत्र के संयोग से भी कई ऐसे अतिशुभ योग बनते हैं जिनमें कोई भी बड़े से बड़ा कार्य आरंभ करके, नए अनुबंधों पर हस्ताक्षर करके, मंत्र अनुष्ठान, औषधीय कार्य, आवश्यकवस्तुओं की खरीदारी करके तथा जमीन-जायदाद आदि का क्रय करके सभी मनोरथ सिद्ध किये जा सकते हैं ।
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पुष्य नक्षत्र
पुष्य नक्षत्र उन्हीं नक्षत्रों में सर्वोपरि है। संहिता ज्योतिष में भी इन्हें सभी सत्ताईस नक्षत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है इस नक्षत्र के संयोग से बनने वाले शुभ योगों का प्रभाव अन्य योगों की तुलना में श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह नक्षत्र सभी अरिष्टों का नाशक औरसर्व दिग्गामी है। पुराणों तथा ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार इस नक्षत्र में जन्मा जातक महान कर्म करने वाला, बलवान, कृपालु, धार्मिक, धनी, विविध कलाओंका ज्ञाता, दयालु और सत्यवादी होता है। 
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इस दिन करें स्वर्णाभूषणों की खरीदारी
रविवार, गुरुवार, शनिवार को पुष्य नक्षत्र की उपस्थिति के फलस्वरूप 'अद्भुद' योग बनता है। शास्त्रों में पुष्य नक्षत्र को ‘तिष्य’कहा गया है जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ एवं मंगलकारी। बृहस्पति भी इसी नक्षत्र में पैदा हुए थे। तैत्रीय ब्राह्मण में कहा गया है कि, बृहस्पतिं प्रथमं जायमानः तिष्यं नक्षत्रं अभिसं बभूव । बृहस्पति ग्रह की जननी को भी पुष्य ही कहा गया है। इसलिए बृहस्पति ग्रह जनित कार्यों जैसे मंत्र दीक्षा, धार्मिक ग्रंथों का दान करना, लेखन, पठन पाठन, संपादन, यज्ञ अनुष्ठान आदि आरंभ करना भी इस नक्षत्र में श्रेष्ठ फलदाई माना गया है। 
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फलित ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को हीरे जवाहरात, सोने और इससे बने हुए आभूषणों का कारक माना गया है इसीलिए जिसकी जन्म कुंडली में बृहस्पति अशुभफल कारक अथवा विल्कुल ही कमज़ोर होते हैं उन्हें सोना धारण करना, पीले पुखराज सोने की अंगूठी में धारण करना अथवा पीली वस्तुओं को धारण करने के लिए सलाह दिया जाता है। इस नक्षत्र की उपस्थिति में सोने चांदी की खरीदारी करना अत्यंत शुभ फलदायक माना गया है। सोने से बनी हुई वस्तुओं का दान करना, अथवा मांगलिक कार्यों के लिए आभूषण आदि का क्रय करना हो तो उस दृष्टि से भी यह संयोग श्रेष्ठ और मंगलकारी रहता है । इसीलिए इस नक्षत्र के आरंभ होते ही अधिकतर आभूषणों की दुकानों में खरीदारों की भीड़ लगी रहती है ।
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