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Video: मजहब से ऊपर भाईचारे की मिसाल बनी परंपरा, 25 फुट ऊंचे दस सिर वाले रावण का पुतला तैयार

दशहरे की शाम रामलीला मैदान में जब रावण का पुतला जलता है तो उसके साथ एक ऐसी परंपरा भी रोशन होती है जो समाज को जोड़ने का संदेश देती है। करीब 55 साल पहले घोषियाना मोहल्ला निवासी इस्माइल चाचा ने रामलीला कमेटी के कहने पर रावण का पुतला बनाना शुरू किया था। चार साल पहले 23 सितंबर 2022 को उनका इंतकाल हो गया। लेकिन उनकी बनाई परंपरा आज भी जिंदा है। अब उनके बेटे सलीम और बेटी आसमा बानो इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। इस साल भी परिवार के लोग और मोहल्ले के बच्चे मिलकर 25 फुट ऊंचा दस सिर वाला रावण तैयार कर रहे हैं। इसे बनाने में करीब एक महीने की मेहनत लगती है। बांस, कागज और कपड़े से तैयार होने वाले इस पुतले में परिवार को इस्माइल चाचा की यादें नजर आती हैं। सलीम बताते हैं कि पहले वह बाहर नौकरी करते थे। ऐसे में उनकी बहन आसमा बानो पिता के साथ पुतला बनाने में मदद करती थीं। अब दोनों मिलकर इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। आसमा कहती हैं कि अब्बा ने यह काम मजहब के लिए नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने के लिए किया था। यही वजह है कि उनके जाने के बाद भी परिवार ने इस परंपरा को टूटने नहीं दिया। मेहनत ज्यादा लेकिन कम पड़ रही लागत सलीम कहते हैं कि समय के साथ पुतला बनाने की लागत बढ़ गई है। इसे तैयार करने में काफी मेहनत लगती है लेकिन कमाई बहुत कम होती है। आसमा बानो का कहना है कि रामलीला कमेटी अब भी पुराने दर पर पुतला बनाने की बात करती है। उचित लागत मिले तो परिवार का उत्साह बढ़ेगा और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। सलीम कहते हैं कि जब दशहरे पर पुतला जलता है और लोग तालियां बजाते हैं तो उन्हें खुशी होती है। वह इसे अपने पिता की यादों से जुड़ा काम मानते हैं। उनका कहना है कि जब तक संभव होगा वह इस परंपरा को निभाते रहेंगे ताकि अब्बा का नाम और भाईचारे का संदेश कायम रहे।

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