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काली मठिया मंदिर: गाय के दूध गिराने वाली जगह खोदाई करने पर मिली थी मां की पिंडी, 24 घंटे होते मां के दर्शन

शास्त्रीनगर स्थित काली मठिया मंदिर आस्था, विश्वास और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। करीब 150 साल पुराने इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां कभी एक टीला हुआ करता था। टीले पर नीम और पीपल के पेड़ थे, जबकि पीछे तालाब था। यहां जानवर बैठा करते थे। इनमें एक गाय प्रतिदिन एक ही स्थान पर अपना दूध गिरा देती थी। लोगों को आश्चर्य हुआ तो उस जगह की खोदाई कराई गई। खोदाई में मां काली की पिंडी निकली। इसके बाद श्रद्धालुओं ने वहां पूजा-अर्चना शुरू कर दी। छोटे मठ में पिंडी विराजमान होने के कारण मंदिर का नाम काली मठिया पड़ गया। मंदिर के आसपास के क्षेत्र को भी बाद में मतैय्या पुरवा के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर में वर्ष 1971 में जगद्गुरु शंकराचार्य शारदानंद सरस्वती ने जयपुर से लाई गई मां काली की बड़ी प्रतिमा विधि-विधान से स्थापित कराई। मां की प्राचीन छोटी पिंडी भी मंदिर में विराजमान है। इसी वर्ष से मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्वलित हो रही है। मंदिर की खास विशेषता है कि यहां श्रद्धालु 24 घंटे मां के दर्शन कर सकते हैं। रात में मंदिर का चैनल बंद होने के बाद भी भक्त बाहर से ही मां के दर्शन कर मन्नत मांगते हैं। मंदिर में नवरात्र के पहले दिन से ही भक्तों का आना शुरू हो जाता है। षष्ठी से नवमी तक हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। दिवाली पर रातभर पूजन के बाद सुबह श्रद्धालुओं को प्रसाद और खजाना वितरित किया जाता है। चैत्र नवरात्र के समापन के बाद पहले रविवार को विशाल भंडारा होता है। 18 फरवरी को मां का स्थापना दिवस भी धूमधाम से मनाया जाता है। श्रद्धालु चुनरी चढ़ाते हैं और मनोकामना पूरी होने पर भंडारा कराते हैं। इसमें चना, हलवा, पूड़ी और खीर का प्रसाद बांटा जाता है।

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