फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सतना: सड़क विहीन गांवों का करुण कहानी, झोली में मरीज ढोने को मजबूर ग्रामीण, विकास के दावों की खुली पोल

Sat, 19 Sep 2026 03:51 PM IST
सतना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सतना

प्रदेश में विकास और बुनियादी सुविधाओं के तमाम बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत आज भी बेहद भयावह बनी हुई है। ताजा मामला सतना जिले के चित्रकूट नगर परिषद क्षेत्र के थरपहाड़ गांव का है, जहां आजादी के 70 साल बाद भी पक्की सड़क न होने के कारण एक मरीज की जान पर बन आई। 

गांव तक एम्बुलेंस न पहुंच पाने की स्थिति में परिजनों और ग्रामीणों को डंडे और चादर की मदद से झोली (पालकी) बनानी पड़ी। इसके बाद वे बीमार व्यक्ति को कंधे पर उठाकर करीब डेढ़ किलोमीटर का पथरीला और दुर्गम रास्ता तय कर मुख्य सड़क तक पहुंचे, जहां से उन्हें एम्बुलेंस द्वारा अस्पताल ले जाया जा सका।

उल्टी-दस्त से गंभीर पीड़ित को झोली में लादा
जानकारी के अनुसार थरपहाड़ गांव निवासी गोरे सिंह को अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत हुई, जिससे उनका शरीर काफी कमजोर हो गया। गांव तक पक्की सड़क न होने के कारण एम्बुलेंस या अन्य कोई वाहन वहां नहीं पहुंच सकता था। ऐसी आपात स्थिति में ग्रामीणों ने एकजुट होकर एक चादर और डंडे की मदद से झोलीनुमा पालकी तैयार की। इसके बाद मरीज को झोली में लादकर अपने कंधों पर उठाकर करीब डेढ़ किलोमीटर का दुर्गम व पथरीला रास्ता पार कराया गया। मुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद मरीज को एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंचाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ।

ये भी पढ़ें: पवन खेड़ा का केंद्र पर तीखा हमला: बोले- छात्रों की गूंज से उड़ी PM की नींद, कार्यक्रम रोकने की हो रही कोशिश

गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों का भी यही सहारा
ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। जब भी गांव में कोई गर्भवती महिला, बुजुर्ग या गंभीर मरीज होता है, तो जान बचाने का एकमात्र जरिया यही जोखिम भरा कंधों का सफर बनता है। बारिश के दिनों में तो कीचड़ और पानी के कारण पैदल चलना भी बेहद दूभर हो जाता है।

कागजों पर ही दौड़ रहे विकास के घोड़े
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की ओर से लगातार आश्वासन दिए जाते रहे हैं। कभी टेंडर प्रक्रिया तो कभी भोपाल स्तर पर प्रशासनिक मंजूरी लंबित होने की बात कहकर मामला टाल दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं और प्रक्रियाएं कागजों तक सीमित हैं। जमीन पर न तो निर्माण कार्य शुरू हुआ है और न ही कोई ठेकेदार नजर आता है। आजादी के सात दशक बाद भी गांव में पक्की सड़क नहीं होने से ग्रामीणों में शासन-प्रशासन के रवैये को लेकर नाराजगी है।

विज्ञापन

Latest

Recommended

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
AU ऐप में पढ़ें