रामायण की कहानी में भगवान राम और रावण के बीच हुए युद्ध से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में स्थित मां निकुम्भला का मंदिर भी ऐसी ही मान्यताओं से जुड़ा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां निकुम्भला लंकापति रावण की कुलदेवी थीं और उन्हें बैतूल बाजार की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। कहा जाता है कि भगवान राम के साथ युद्ध के दौरान रावण के पुत्र मेघनाद ने इसी स्थान पर देवी की कठिन साधना की थी। आज भी मंदिर में मां निकुम्भला की पूजा-अर्चना के साथ मेघनाद का पूजन किया जाता है। खास बात यह है कि रावण और उसके वंश को लेकर प्रचलित नकारात्मक छवि के बावजूद, यहां के लोगों की मां निकुम्भला के प्रति गहरी आस्था है। बैतूल बाजार के भवानीपुरा में स्थित है मां निकुम्भला का मंदिर मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के बैतूल बाजार गांव के भवानीपुरा इलाके में मां निकुम्भला का मंदिर स्थित है। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यहां मां निकुम्भला को नगर की रक्षक देवी माना जाता है। मान्यता है कि देवी की कृपा से नगर की रक्षा होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु नियमित रूप से मंदिर पहुंचते हैं और मां की आराधना करते हैं। मेघनाद ने की थी मां निकुम्भला की कठिन साधना पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां निकुम्भला रावण की कुलदेवी थीं। बताया जाता है कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर रावण के पुत्र मेघनाद ने बैतूल स्थित मां निकुम्भला शक्तिपीठ में देवी की कठिन साधना की थी। मान्यता है कि भगवान राम के साथ युद्ध के समय मेघनाद ने देवी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी, जिसके बाद मां निकुम्भला ने उसे वरदान दिया था। इसी मान्यता के कारण मंदिर में मां निकुम्भला की पूजा के साथ मेघनाद का भी पूजन किया जाता है। यहां रोजाना मां की महाआरती होती है और श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से देवी की आराधना करते हैं। हालांकि, मेघनाद की साधना और देवी से वरदान मिलने से जुड़ी ये बातें स्थानीय धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित हैं। लंका ले जाई गई थीं मां निकुम्भला की चरण पादुकाएं मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता मां निकुम्भला की चरण पादुकाओं से संबंधित है। स्थानीय कथाओं के अनुसार, रावण के वंशज मां निकुम्भला की चरण पादुकाएं लंका लेकर गए थे, जहां उनकी प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। बताया जाता है कि इस परंपरा से जुड़ी जानकारी आज भी गुप्त रखी गई है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह मान्यता लंबे समय से प्रचलित बताई जाती है। दंडकारण्य क्षेत्र और मेघनाद के शासन से जुड़ी मान्यता बैतूल जिले का संबंध रामायण काल से जोड़ने वाली एक अन्य पौराणिक मान्यता भी प्रचलित है। इसके अनुसार, यह क्षेत्र कभी दंडकारण्य का हिस्सा था और यहां रावण के पुत्र मेघनाद का शासन था। इसी मान्यता के आधार पर मां निकुम्भला के मंदिर को रावण के परिवार और मेघनाद की साधना से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों के बारे में भी बताया जाता है कि वे मेघनाद को अपना राजा और मां निकुम्भला को अपनी आराध्य देवी मानते हैं। उनके लिए मेघनाद और मां निकुम्भला से जुड़ी परंपराएं स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। रावण की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं मां निकुम्भला टेलीविजन पर रामायण देखने या रामायण की कथा पढ़ने वाले बहुत से लोगों को शायद यह जानकारी न हो कि मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में रावण की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली मां निकुम्भला का मंदिर भी है। यहां स्थानीय लोग बड़ी श्रद्धा के साथ देवी की पूजा करते हैं और उन्हें नगर की रक्षक मानते हैं।