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बिटिया बेमिसाल : कभी जूते नहीं थे, पहाड़ के कठिन रास्तों पर नंगे पांव दाैड़ीं सीमा की कामयाबी गर्व भर देगी, देश का चमका दिया नाम

धर्मशाला। जापान के नागोया में चल रहे 20वें एशियन गेम्स में चंबा के रेटा गांव की उड़नपरी सीमा कुमारी की कामयाबी अपने सपनों को हर कीमत पर हासिल करने की जिद और जुनून का फल है। तमाम संघर्षों को पार कर हिमाचल की बिटिया ने हर भारतीय को गर्व से भर दिया। महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ को 32 मिनट 50.05 सेकंड में पूरा कर उन्होंने देश को कांस्य पदक दिलाया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही एशियाई खेलों के इस इवेंट में भारत का 16 साल का पदक का सूखा खत्म हो गया है। इससे पहले 2010 में भारत को इस स्पर्धा में स्वर्ण व रजत पदक मिले थे। पोडियम तक पहुंचने का सीमा का यह सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। आर्थिक तंगी के कारण चंबा की पगडंडियों पर नंगे पांव अभ्यास करने वाली सीमा ने महज 12 साल की उम्र 2012 में पिता को खो दिया था। तब उनका खेल न बिगड़े, इसलिए परिवार ने ट्रैक पर यह दुखद खबर उनसे छिपाई। बाद में मां केसरी देवी ने ढाल बनकर अपनी एफडी तुड़वाकर बेटी को ट्रेनिंग के लिए बैंकॉक भेजा, जिसके बाद 2014 में कोच केहर सिंह पटियाल ने उनकी इस प्रतिभा को पहचाना। एशियन गेम्स में देश का मान बढ़ाने के बाद अब सीमा का अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारत के लिए मेडल जीतना है। सीमित संसाधनों और मुश्किलों के बीच आसमान छूने वाली हिमाचल की यह बेटी आज देश के हर युवा के लिए मिसाल बन गई है।

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