नारनौल। जिले में सड़कों पर घूम रहे बेसहारा गोवंश पर लंपी संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। करीब 2000 बेसहारा गोवंश में से अब तक केवल सात फीसदी का ही टीकाकरण हो पाया है। गोशालाओं में जगह की कमी और नगर परिषद की धीमी गति के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। गोशालाओं और पशुपालकों की करीब 60 हजार गायों का टीकाकरण पहले ही किया जा चुका है। इसके विपरीत, सड़कों पर घूम रहे लगभग 2 हजार बेसहारा गोवंश में से केवल 140 को ही लंपी से बचाव का टीका लगाया गया है। टीकाकरण के लिए नगर परिषद पहले गोवंश को पकड़कर नंदीशाला ले जाती है। इसके बाद पशुपालन विभाग के चिकित्सक टीके लगाते हैं। हालांकि, नगर परिषद की गोवंश पकड़ने की रफ्तार धीमी है। साथ ही, कई गोशालाओं में नए गोवंश के प्रवेश पर रोक है। जिले के गांव हुडीना में लंपी वायरस के कारण दो गायों की मौत भी हो चुकी है। यदि आवारा गोवंश का जल्द टीकाकरण नहीं हुआ, तो स्थिति और भयावह हो सकती है। बेसहारा गोवंश को रखने की चुनौती: जिले की 3 गोशालाओं और नंदीशाला में करीब तीन हजार गायों को रखने की व्यवस्था है। गोपाल गोशाला में 1200, श्री अनाथ गोशाला में 500 और उपचार शाला में 300 गाय पहले से रह रही हैं। नंदीशाला में भी करीब 500 गाय मौजूद हैं। ऐसे में, गोपाल गोशाला और नंदीशाला में लगभग 1 हजार गायों को ही और रखा जा सकता है। सड़कों पर घूम रहे करीब 2 हजार बेसहारा गोवंश को गोशाला में जगह मिलना एक बड़ी चुनौती है। धीमी टीकाकरण रफ्तार से बढ़ेगा खतरा नगर परिषद ने बेसहारा गोवंश को पकड़ने के लिए करीब दो सप्ताह पहले ही टेंडर जारी किया था। अब तक प्रतिदिन औसतन दस गोवंश को पकड़कर टीके लगाए गए हैं। इस रफ्तार से दो हजार गोवंश का टीकाकरण करने में सात माह से अधिक का समय लग सकता है। लंपी संक्रमण फैलने की सबसे बड़ी आशंका बेसहारा गोवंश में ही बनी हुई है। धीमी रफ्तार से यह चुनौती और बढ़ सकती है। गोवंश को पकड़ने के लिए हाल ही में टेंडर जारी किया गया है। गोवंश को पकड़ कर टीका लगाने के कार्य को तेजी से पूरा करने की योजना बनाई जा रही है। अब तक बेसहारा गोवंश में लंपी संक्रमण के लक्षण नहीं मिले हैं। विकास शर्मा, जेई, नगर परिषद, नारनौल। लंपी संक्रमण से बचाव के लिए अब तक 60 हजार टीके लगाए जा चुके हैं और अभी भी पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध है। नगर परिषद की ओर से पकड़े जाने वाले बेसहारा गोवंश को टीके लगाए जा रहे हैं। गोशाला में ही उन्हें 15 दिन तक अलग वार्ड में रखा जाता है ताकि संक्रमण का समय पर पता लगाया जा सकें और अन्य गोवंश में फैलने से रोका जा सकें डॉ. नसीब सिंह, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग, नारनौल।