किसी जगह को हम सिर्फ उसकी मिट्टी, पेड़ों और खुले आसमान से नहीं याद रखते। कई बार कोई भू-दृश्य बचपन की स्मृतियों, स्पर्श और भावनाओं में बस जाता है और समय के साथ हमारे भीतर उसका एक नया रूप बनता रहता है। कलाकार और कला शिक्षक गजाली मोइनुद्दीन की एकल चित्र प्रदर्शनी बिलांदा इसी भीतरी भू-दृश्य को कैनवास पर तलाशती है। गैलरी श्री आर्ट्स की ओर से प्रस्तुत और जितेंद्र पदम जैन की संयोजित यह प्रदर्शनी बीते सोमवार को इंडिया हैबिटेट सेंटर की विजुअल आर्ट्स गैलरी में समाप्त हुई। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व छात्र गजाली के कैनवास पर खेत, जंगल, पेड़ और बदलते आकाश किसी वास्तविक भू-दृश्य की हूबहू तस्वीर नहीं हैं। ये वे दृश्य हैं जिन्हें स्मृति ने अपने ढंग से सहेजा और कल्पना ने समय के साथ नया रूप दिया।