धमतरी।अपनों का तर्पण और पिंडदान तो इस दुनिया में हर कोई करता है, लेकिन जिनका इस संसार में कोई आगे-पीछे नहीं होता, उनकी भटकती रूहों को मोक्ष और सद्गति दिलाने का बीड़ा उठाकर छत्तीसगढ़ के धमतरी की ‘स्वर्गधाम सेवा समिति’ ने मानवता की एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुकी है। वर्ष 2004 से लावारिस और अज्ञात शवों को ससम्मान विदाई देने में जुटी इस संस्था ने इस वर्ष भी सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या के पावन पर्व पर 715 अनजान मृतकों का विधिवत सामूहिक पिंडदान और तर्पण संपन्न कराया। रुद्री स्थित ऐतिहासिक रुद्रेश्वर महादेव घाट पर आयोजित इस भावुक और पुनीत महाआयोजन में शहर के जनप्रतिनिधि, प्रबुद्ध नागरिक और हजारों श्रद्धालु साक्षी बने।
अक्सर देखा जाता है कि सड़े-गले, लावारिस और दुर्घटनाग्रस्त अज्ञात शवों को देखकर आम लोग अपनी नजरें फेर लेते हैं, लेकिन धमतरी की स्वर्गधाम सेवा समिति इन देहों को लावारिस नहीं मानती। समिति के सदस्य बिना किसी हिचकिचाहट, बिना किसी जाति या धार्मिक भेदभाव के इन पार्थिव शरीरों को अपना मानकर पूरे विधि-विधान और सनातन परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करते हैं।यह सिलसिला वर्ष 2004 से अनवरत जारी है। संस्था ने अब तक 715 ऐसे मृतकों को मुखाग्नि देकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है। हर साल पितृ पक्ष के अंतिम दिन महानदी के पावन तट पर इन सभी दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए सामूहिक तर्पण अनुष्ठान आयोजित किया जाता है।
विशाल शांतिभोज और जनसहयोग का अद्भुत संगम
इस महाआयोजन की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि कार्यक्रम में शामिल होने वाले हजारों लोगों के लिए बनने वाला शांतिभोज पूरी तरह जनसहयोग पर आधारित होता है। धमतरी शहर का हर तबका इसे अपना निजी कर्तव्य समझकर स्वेच्छा से अपने पूर्वजों के नाम पर अनाज, दाल, तेल और नकदी दान करता है। समाज के इसी अटूट भरोसे और सहयोग के बल पर स्वर्गधाम सेवा समिति का यह निस्वार्थ महायज्ञ पिछले दो दशकों से बिना रुके निरंतर गतिमान है।
राज्यपाल से विशेष अनुमति और 44 अस्थियों का गंगा विसर्जन
समिति के महासचिव अशोक पवार ने इस सेवा यात्रा का एक अत्यंत संवेदनशील पहलू साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 से लेकर कोरोना महामारी के भीषण दौर तक भिलाई के शांति घाट में 44 ऐसी अस्थियां लावारिस हालत में रखी रह गईं, जिन्हें लेने कोई भी परिजन नहीं पहुंचा।इस मर्मस्पर्शी स्थिति को देखते हुए स्वर्गधाम सेवा समिति ने तत्कालीन महामहिम राज्यपाल से विशेष विधिक अनुमति प्राप्त की। इसके बाद समिति के सदस्यों ने उन सभी 44 लावारिस अस्थियों को पूरे विधि-विधान के साथ गंगा जी ले जाकर विसर्जित किया। आज समिति हर पितृ पक्ष में उन 44 आत्माओं का भी नियमित पिंडदान और तर्पण करती है।
अशोक पवार ने कहा आज की इस भागमभाग जिंदगी में जहां इंसान के पास अपने सगे-संबंधियों के लिए समय नहीं है, वहीं इन बेसहारा आत्माओं की सेवा कर हमें जो आत्मिक शांति मिलती है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। जब तक सांसें हैं, लावारिसों को सद्गति देने का यह संकल्प जारी रहेगा।