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रेप के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर अमल नहीं

Wed, 31 Jul 2013 05:35 AM IST
Badaun
Badaun Updated Wed, 31 Jul 2013 05:35 AM IST
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नए कानून को दरकिनार कर हो रही हैं विवेचना
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बदायूं। महिलाओं और बालिकाओं के साथ यौन उत्पीड़न की वारदातें अपने जिले में भी बढ़ रही हैं। दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद इस दिशा में जागृति आई है। वारदातों पर अंकुश लगाने और पीड़ित को इंसाफ दिलाने की बड़ी पहल सुप्रीम कोर्ट ने की है। कोर्ट ने इसके लिए दंड विधि, संशोधन अधिनियम 2013 में पुलिस के लिए तमाम निर्देश दिए हैं। लेकिन देखने में आया है कि इन पर अमल होता ही नहीं है। जिले में पूर्व में हुए दुराचार के मामलों में इस तरह से विवेचना हुई ही नहीं। इन मामलों की गहराई से पड़ताल की जाए तो भी लगता है कि या तो इस कानून का पुलिस को पता नहीं है, या फिर वह इनकी अवहेलना कर रही है।
कई साल पहले बिल्सी के चर्चित छात्रा अपहरण और रेप कांड ने जिले की राजनीति में सनसनी मचाई थी। सुप्रीम कोर्ट की हालिया गाइड लाइन से मेल खाती नियमावली उस वक्त भी लागू थी पर पुलिस ने विवेचना के दौरान इसका पूरी तरीके से पालन नहीं किया। इसका लाभ प्रतिपक्षी तत्कालीन बसपा विधायक योगेंद्र सागर और अन्य आरोपियों को मिला। उनको जमानत मिलने में आसानी हुई। हालांकि बाद में मीडिया के बढ़ते दबाव में पुलिस बैक फुट पर आ गई और प्रतिवादी इस केस में बुरी तरह घिर गए। मौजूदा वक्त में सागर फरार घोषित हैं और उसकी संपत्ति की नीलामी हो रही है।
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जिले में अलापुर थाना क्षेत्र में पूर्व ब्लॉक प्रमुख पातंजलि भारद्वाज के पुत्र पर भी रेप का मुकदमा दर्ज हुआ। इस मामले में भी नियम-कानून को दरकिनार कर विवेचना की गई। बाद में आरोपी को सजा हुई और जेल जाना पड़ा। शहर में बिरुआबाड़ी मंदिर के पास व्यवसायी की पत्नी से चार महीने पहले रेप की वारदात हुई। इस मामले की विवेचना भी विसंगतियों से भरी रही। संतोष बस इतना है कि पुलिस ने आरोपी पकड़ लिए और उन्हें जेल भेज दिया। व्यवसायी के परिवार को भी इससे काफी संबल मिला।
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यह है सुप्रीम कोर्ट की ताजा रूलिंग
- जैसे ही बलात्कार या महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा की घटना की सूचना मिले, फौरन थाने के ड्यूटी अफसर महिला पुलिस अधिकारी को बुलाएं। महिला अधिकारी का प्रथम दायित्व होगा कि वह पीड़ित और उसके परिवार को सांत्वना देकर आश्वस्त करें।
- ड्यूटी अफसर का यह दायित्व है कि वह पीड़ित की कानूनी सहायता के लिए फौरन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कानून सहायक स्वयंसेवी या अधिवक्ता को बुलाएंगे। यदि पीड़ित और उसके परिवार ने अपने किसी अधिवक्ता को नहीं बुलाया है तो थाने पर ऐसे स्वयंसेवी अधिवक्ता की सूची होनी चाहिए जो महिला उत्पीड़न संबंधी मामलों में पीड़ित की मदद करना चाहते हों।
- थाने पहुंचने पर अधिवक्ता की भूमिका यह होगी कि वह पीड़ित को अग्रिम वैधानिक कार्यवाही के बारे में अच्छी तरह से अवगत कराएं। मानसिक रूप से मेडिकल कराने के लिए तैयार करें और थाने में बयान देने के बारे में समझाते हुए वैधानिक कार्यवाही पूरी होने तक मौजूद रहें।
- यदि अधिवक्ता नहीं आते हैं या उनके आने में देरी होती है तो महिला पुलिस अधिकारी का दायित्व होगा कि वह खुद पीड़ित के साथ रहकर पूरी कार्यवाही करें और उसे ढांढस बंधाती रहें।
- थाने में पीड़ित के पहुंचने पर होने वाली पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी होनी चाहिए।
- आईपीसी की धारा 164 के अंतर्गत फौरन ही पीड़ित के बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने कराए जाने चाहिए।
- प्रारंभिक विवेचना की कार्यवाही कर विवेचक महिला पुलिस अधिकारी के साथ तुरंत पीड़ित को मेडिकल के लिए अस्पताल ले जाएंगे।
- आईपीसी की धारा 161 के तहत पीड़ित का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा लिया जाए। इस बयान को लेने के लिए पीड़ित महिला को किसी भी दशा में नोटिस नहीं दिया जाए और न ही उसे किसी अन्यत्र स्थान पर बुलाया जाए। यह बयान पीड़ित के घर पर जाकर लिया जाए।

- विवेचक का यह दायित्व है कि वह तत्काल किसी एनजीओ से संपर्क कर पीड़ित को आवश्यक सहायता पहुंचाएंगे।
- विवेचक की यह जिम्मेदारी होगी कि वह बिना देरी के विवेेचना का निस्तारण करें ताकि अभियुक्त को धारा 167 का लाभ मिलने से जमानत न मिल जाए।
- महिलाओं के प्रति घटित अपराधों में संलिप्त अभियुक्तों की समीक्षा करके आवश्यकतानुसार उनकी हिस्ट्रीशीट खोली जाएं
- पुलिस का यह दायित्व है कि वह पीड़ित से प्रश्न पूछने के पूर्व उसके विधिक अधिकारों के बारे में सूचित करें और इस बात का उल्लेख जीडी और सीडी में भी करें।
- महिला उत्पीड़न से संबंधित मामलों में मदद करने को तत्पर अधिवक्ताओं की सूची प्रत्येक थाने में रखी जाए।
- विवेचक को घटना स्थल पर पहुंचते ही फील्ड यूनिट की टीम को बुलाकर उनकी मदद लेनी चाहिए। ताकि घटना स्थल से साक्ष्य संकलित हो जाएं।
- पीड़ित के बयान की वीडियोग्राफी कराई जानी चाहिए।
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