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कुल्हड़ के दीवाने हो रहे युवा: लंदन से न्यूयॉर्क तक चाय-कॉफी के लिए बढ़ा चलन; पश्चिमी देशों में बढ़ी मांग

Sat, 25 Jul 2026 06:35 AM IST
प्रशांत तिवारी एजेंसी, लंदन/ न्यूयॉर्क
एजेंसी, लंदन/ न्यूयॉर्क Published by: प्रशांत तिवारी Updated Sat, 25 Jul 2026 06:35 AM IST
सार

दुनिया में बढ़ते प्लास्टिक कचरे के बीच भारत का पारंपरिक मिट्टी का कुल्हड़ पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के कई प्रीमियम कैफे भारतीय कुल्हड़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कनाडा में भारतीय प्रवासी मुफ्त चाय और भोजन बांटकर सेवा-भाव की मिसाल पेश कर रहे हैं।

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Youth crazy about kulhads Growing trend for tea-coffee from London to New York demand rising Western countries
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दुनियाभर में प्रतिवर्ष 500 अरब से अधिक सिंगल-यूज प्लास्टिक और माइक्रो-प्लास्टिक कोटेड पेपर कप कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं, जिन्हें गलने में सैकड़ों वर्ष लगते हैं। इस गंभीर पर्यावरण संकट के बीच अब ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के पर्यावरण-प्रेमी देशों को भारत की सदियों पुरानी परंपरा में एक बड़ा वैज्ञानिक समाधान नजर आया है। यह समाधान है मिट्टी का कुल्हड़। इसी के चलते पश्चिमी देशों के प्रीमियम कैफे में अब मिट्टी की सोंधी खुशबू महकने लगी है।

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आखिर पश्चिमी देशों में कुल्हड़ की मांग क्यों बढ़ रही है?
ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर सख्ती के बाद अब लंदन, न्यूयॉर्क और पेरिस के कई मशहूर कैफे में चाय-कॉफी के लिए भारतीय परंपरा वाले मिट्टी के कुल्हड़ (क्ले कप्स) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ब्रिटेन के कई प्रीमियम कैफे में तो बाकायदा भारत के उत्तर प्रदेश और राजस्थान के स्थानीय कुम्हारों से सीधे कुल्हड़ मंगाए जाने लगे हैं। विदेशी कैफे संचालकों का कहना है कि कुल्हड़ में जब गरमा-गरम चाय डाली जाती है, तो मिट्टी की सोंधी महक स्वाद को दोगुना कर देती है। इस्तेमाल के बाद इसे आसानी से मिट्टी में ही मिलाया जा सकता है।
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युवा आखिर कुल्हड़ मॉडल के दीवाने क्यों हो रहे हैं?
सिंगल-यूज और माइक्रो-प्लास्टिक के उलट भारतीय कुल्हड़ 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल है। इस्तेमाल के बाद इसे फेंकने पर यह कुछ ही दिनों में वापस प्रकृति की मिट्टी में विलीन हो जाता है। मिट्टी की प्राकृतिक क्षारीयता चाय के अम्लीय (एसिडिक) प्रभाव को संतुलित करने में भी मदद करती है, जिससे पाचन बेहतर रहता है। पश्चिमी देशों में जीरो-वेस्ट लाइफस्टाइल अपनाने वाले युवा इस मॉडल के दीवाने हो रहे हैं और इसका चलन लगातार बढ़ता जा रहा है।
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प्रवासी भारतीयों का गरम लंगर जीत रहा दिल
कनाडा में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी और शून्य से 20-25 डिग्री सेल्सियस नीचे के तापमान में सड़कों पर भारत का सेवा-भाव और गर्माहट चाय के रूप में बिखर रही है। टोरंटो और वैंकूवर जैसे शहरों में भारतीय प्रवासियों का मुफ्त कम्युनिटी लंगर और मोबाइल टी-वैन आज कनाडाई नागरिकों के लिए बड़ा सहारा बने हुए हैं। यहां की सर्दियों में ये प्रवासी सड़क पर रहने वाले बेघरों, सफाईकर्मियों और राहगीरों को गरमा-गरम देसी अदरक-इलायची वाली चाय, दाल-चावल और हलवा खिलाकर उनका दिल जीत रहे हैं।

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