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क्या कड़े इम्तिहान को पास कर लेगा ईरान: अमेरिका से युद्ध हुआ तो कौन देना साथ, कौन नहीं आएगा खुलकर सामने?
सार
युद्ध हुआ तो ईरान का साथ उसके प्रॉक्सी (हिज्बुल्लाह, हमास, हूती संगठन) दे सकते हैं। दुनिया में इसको लेकर प्रदर्शन या फिर अमेरिकी राजनयिकों को टारगेट करके हमले हो सकते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन ने भी ईरान का साथ देने की मंशा व्यक्त की है।
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डोनाल्ड ट्रंप और अयातुल्ला खामेनेई
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
ईरान और उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई का ‘कड़ा इम्तिहान’ चल रहा है। अमेरिका ने सैन्य दबाव के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव बहुत बढ़ा दिया है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, पोलैंड,सर्बिया, स्वीडन समेत तमाम देशों ने तत्काल अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह दी है। क्या ऐसे दौर में ईरान का मंसूबा सफल हो जाएगा?
अमेरिका और यूरोप से लौटे विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी का कहना है कि बहुत संवेदनशील समय है। सूत्र का कहना है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिका में बड़ा मतभेद है। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका के रणनीतिकार अभी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि सैन्य कार्रवाई की दशा में ईरान की प्रतिक्रिया कब, क्या और किस तरह की रहेगी? कितना नुकसान होगा? क्या ईरान के हमलों को अमेरिका और इस्राइल की प्रतिरक्षा प्रणाली बेअसर कर सकेगी? शर्मा कहते हैं कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई शुरू होगी तो जवाबी कार्रवाई की पूरी संभावना है। वह कहते हैं कि ईरान और उसके रणनीतिकारों को इसका परिणाम पता है, लेकिन इसके बाद अमेरिका के लिए भी मुश्किलें बढ़ने के पूरे आसार हैं।
अभी अमेरिका क्या चाहता है?
अमेरिका तीन प्रमुख उद्देश्य पर काम कर रहा है। उसकी मंशा है कि ईरान से अयातुल्लाह अली खामेनेई के शासन तंत्र का अंत हो। ईरान परमाणु हथियार, यूरेनियम संवर्धन, भंडारण और मानवता के संहार के लिए घातक हथियारों से दूर हो। यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक ले आए। अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसी आईएईए को निगरानी सौंपे। हूती, हमास, हिज्बुल्लाह जैसे समूहों को वित्तीय और हथियारों की मदद बंद करे। ईरान स्थानीय नागरिकों के मानवाधिकार को लेकर संवेदनशील हो। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और उनके रणनीतिकार मध्य एशिया में दबदबा बनाए रखने के लिए इस कार्ययोजना को अंतिम रूप देने में लगे हैं। इसके पीछे मध्य एशिया में अमेरिका के सबसे मजबूत सहयोगी इस्राइल को सुरक्षित वातावरण देने की मंशा निहित है। ईरान के पस्त होते ही पूरे मध्य क्षेत्र में अमेरिका और इस्राइल का दबदबा कायम हो जाएगा।
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ये भी पढ़ें: Pakistan: 'वे क्या छिपा रहे हैं?' आधी रात को इमरान खान को अस्पताल ले जाए जाने पर परिवार ने जताई चिंता
ईरान का कौन देगा साथ?
युद्ध हुआ तो ईरान का साथ उसके प्रॉक्सी (हिज्बुल्लाह, हमास, हूती संगठन) दे सकते हैं। दुनिया में इसको लेकर प्रदर्शन या फिर अमेरिकी राजनयिकों को टारगेट करके हमले हो सकते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन ने भी ईरान का साथ देने की मंशा व्यक्त की है। लेकिन यह कह पाना मुश्किल है कि अभी कोई देश खुलकर ईरान के साथ युद्ध में साथ देने आएगा।
रूस और चीन क्या करेंगे?
रूस और चीन लगातार मध्य एशिया के हालात पर नजर रख रहे हैं। दोनों नहीं चाहते कि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करे। लेकिन दोनों देश युद्ध की दशा में ईरान का खुलकर साथ देने से परहेज कर सकते हैं। लेकिन रूस और चीन दोनों देश ईरान को खुफिया सूचना, तकनीकी सहायता दे सकते हैं। रूस और ईरान बहुत पहले से रक्षा सहयोग करते हैं। ईरान ने यूक्रेन पर की रूस की सैन्य कार्रवाई के दौरान काफी रक्षा साजो-सामान दिया है। माना जा रहा है कि रूस भी ईरान को वायुरक्षा प्रणाली, घातक मिसाइलें और अन्य साजो-सामान का सहयोग कर सकता है। चीन से ईरान के मजबूत आर्थिक संबंध हैं। चीन ने ऊर्जा क्षेत्र में वहां निवेश किया है। ऐसे में चीन भी अपने निवेश को ध्यान में रखकर ईरान का परोक्ष रूप से साथ दे सकता है। चीन का मध्य एशिया में भी कारोबार बढ़ा है। इसलिए चीन अपने बाजार की चिंता को समझ कर कदम उठा सकता है। इतना ही नहीं रूस संयुक्त राष्ट्र में भी ईरान के पक्ष में खड़ा हो सकता है। ‘वीटो पॉवर’ का इस्तेमाल कर सकता है।
कौन-कौन से देश नहीं चाहते अमेरिका और ईरान का युद्ध?
ईरान और तुर्किए आपस में टकराते रहते हैं, लेकिन मौजूदा समय में तुर्किए ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बिल्कुल भी पक्षधर नहीं है। कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब भी ईरान के साथ युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। यह अमेरिका पर बातचीत और कूटनीतिक समाधान का जोर दे रहे हैं। उन्हें अमेरिका का सहयोग करने पर ईरान की प्रतिक्रिया का भी डर सता रहा है। अमेरिका के रणनीतिकार लगातार ईरान के समर्थक देशों की संख्या घटाने में लगे हैं।
ये भी पढ़ें: Iran Helicopter Crash: ईरान में एक हफ्ते के भीतर दूसरा सैन्य हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त, चार लोगों की मौत
कमजोर नहीं दिखना चाहता ईरान
अयातुल्लाह अली खामेनेई के शासन के अंत का अर्थ है ईरान का धुरी पर घूम जाना। प्रो-अमेरिकी सरकार का गठन। खामेनेई को यह अंत मंजूर नहीं है। ईरान के सर्वोच्च नेता कमजोर भी नहीं दिखना चाहते। माना जा रहा है कि रूस और चीन के साथ-साथ कई सहयोगियो के संपर्क में हैं। ईरान के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उसके घातक हथियार और उसकी पूरी क्षमता के बारे में अमेरिका समेत दुनिया को पूरी जानकारी नहीं है। इसलिए अमेरिका के सामानांतर ईरान धमकी, चेतावनी में कोई संकोच नहीं करता।
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अमेरिका और यूरोप से लौटे विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी का कहना है कि बहुत संवेदनशील समय है। सूत्र का कहना है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिका में बड़ा मतभेद है। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका के रणनीतिकार अभी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि सैन्य कार्रवाई की दशा में ईरान की प्रतिक्रिया कब, क्या और किस तरह की रहेगी? कितना नुकसान होगा? क्या ईरान के हमलों को अमेरिका और इस्राइल की प्रतिरक्षा प्रणाली बेअसर कर सकेगी? शर्मा कहते हैं कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई शुरू होगी तो जवाबी कार्रवाई की पूरी संभावना है। वह कहते हैं कि ईरान और उसके रणनीतिकारों को इसका परिणाम पता है, लेकिन इसके बाद अमेरिका के लिए भी मुश्किलें बढ़ने के पूरे आसार हैं।
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अभी अमेरिका क्या चाहता है?
अमेरिका तीन प्रमुख उद्देश्य पर काम कर रहा है। उसकी मंशा है कि ईरान से अयातुल्लाह अली खामेनेई के शासन तंत्र का अंत हो। ईरान परमाणु हथियार, यूरेनियम संवर्धन, भंडारण और मानवता के संहार के लिए घातक हथियारों से दूर हो। यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक ले आए। अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसी आईएईए को निगरानी सौंपे। हूती, हमास, हिज्बुल्लाह जैसे समूहों को वित्तीय और हथियारों की मदद बंद करे। ईरान स्थानीय नागरिकों के मानवाधिकार को लेकर संवेदनशील हो। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और उनके रणनीतिकार मध्य एशिया में दबदबा बनाए रखने के लिए इस कार्ययोजना को अंतिम रूप देने में लगे हैं। इसके पीछे मध्य एशिया में अमेरिका के सबसे मजबूत सहयोगी इस्राइल को सुरक्षित वातावरण देने की मंशा निहित है। ईरान के पस्त होते ही पूरे मध्य क्षेत्र में अमेरिका और इस्राइल का दबदबा कायम हो जाएगा।
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ईरान का कौन देगा साथ?
युद्ध हुआ तो ईरान का साथ उसके प्रॉक्सी (हिज्बुल्लाह, हमास, हूती संगठन) दे सकते हैं। दुनिया में इसको लेकर प्रदर्शन या फिर अमेरिकी राजनयिकों को टारगेट करके हमले हो सकते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन ने भी ईरान का साथ देने की मंशा व्यक्त की है। लेकिन यह कह पाना मुश्किल है कि अभी कोई देश खुलकर ईरान के साथ युद्ध में साथ देने आएगा।
रूस और चीन क्या करेंगे?
रूस और चीन लगातार मध्य एशिया के हालात पर नजर रख रहे हैं। दोनों नहीं चाहते कि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करे। लेकिन दोनों देश युद्ध की दशा में ईरान का खुलकर साथ देने से परहेज कर सकते हैं। लेकिन रूस और चीन दोनों देश ईरान को खुफिया सूचना, तकनीकी सहायता दे सकते हैं। रूस और ईरान बहुत पहले से रक्षा सहयोग करते हैं। ईरान ने यूक्रेन पर की रूस की सैन्य कार्रवाई के दौरान काफी रक्षा साजो-सामान दिया है। माना जा रहा है कि रूस भी ईरान को वायुरक्षा प्रणाली, घातक मिसाइलें और अन्य साजो-सामान का सहयोग कर सकता है। चीन से ईरान के मजबूत आर्थिक संबंध हैं। चीन ने ऊर्जा क्षेत्र में वहां निवेश किया है। ऐसे में चीन भी अपने निवेश को ध्यान में रखकर ईरान का परोक्ष रूप से साथ दे सकता है। चीन का मध्य एशिया में भी कारोबार बढ़ा है। इसलिए चीन अपने बाजार की चिंता को समझ कर कदम उठा सकता है। इतना ही नहीं रूस संयुक्त राष्ट्र में भी ईरान के पक्ष में खड़ा हो सकता है। ‘वीटो पॉवर’ का इस्तेमाल कर सकता है।
कौन-कौन से देश नहीं चाहते अमेरिका और ईरान का युद्ध?
ईरान और तुर्किए आपस में टकराते रहते हैं, लेकिन मौजूदा समय में तुर्किए ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बिल्कुल भी पक्षधर नहीं है। कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब भी ईरान के साथ युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। यह अमेरिका पर बातचीत और कूटनीतिक समाधान का जोर दे रहे हैं। उन्हें अमेरिका का सहयोग करने पर ईरान की प्रतिक्रिया का भी डर सता रहा है। अमेरिका के रणनीतिकार लगातार ईरान के समर्थक देशों की संख्या घटाने में लगे हैं।
ये भी पढ़ें: Iran Helicopter Crash: ईरान में एक हफ्ते के भीतर दूसरा सैन्य हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त, चार लोगों की मौत
कमजोर नहीं दिखना चाहता ईरान
अयातुल्लाह अली खामेनेई के शासन के अंत का अर्थ है ईरान का धुरी पर घूम जाना। प्रो-अमेरिकी सरकार का गठन। खामेनेई को यह अंत मंजूर नहीं है। ईरान के सर्वोच्च नेता कमजोर भी नहीं दिखना चाहते। माना जा रहा है कि रूस और चीन के साथ-साथ कई सहयोगियो के संपर्क में हैं। ईरान के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उसके घातक हथियार और उसकी पूरी क्षमता के बारे में अमेरिका समेत दुनिया को पूरी जानकारी नहीं है। इसलिए अमेरिका के सामानांतर ईरान धमकी, चेतावनी में कोई संकोच नहीं करता।
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