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Bangladesh Quota Protest: क्या है बांग्लादेश का आरक्षण आंदोलन, जिसकी वजह से PM शेख हसीना को देना पड़ा इस्तीफा
Mon, 05 Aug 2024 04:15 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 05 Aug 2024 04:15 PM IST
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बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले और बाद में आरक्षण
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
पड़ोसी देश बांग्लादेश में नए सिरे से जारी हिंसा में नया मोड़ आ गया है। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को इस्तीफा दे दिया है। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया है। कहा जा रहा है कि शेख हसीना ने बांग्लादेश छोड़ दिया है। देश के हालात पर सेना प्रमुख ने बयान जारी किया है। सेना प्रमुख ने प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की है।इससे पहले रविवार को सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन एक बार फिर उग्र हो गया। इस हिंसक आंदोलन के चलते 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। हिंसा को रोकने के लिए देश में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई, देश में कर्फ्यू लगा दिया गया। सरकार ने तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी घोषित कर दी। इन सब के बाद हालात काबू में नहीं आ सके। बांग्लादेश में जारी हिंसा के चलते भारत, अमेरिका समेत कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी कर दी। उधर संयुक्त राष्ट्र संगठन ने भी हिंसा पर चिंता जताते हुए इसे तत्काल रोकने की अपील की है।
पिछले महीने यहां की सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की अधिकांश व्यवस्था को खत्म कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन एक बार फिर हिंसा की आग फैल गई।
आइये जानते हैं कि आखिर बांग्लादेश में दोबारा क्यों भड़क उठा आरक्षण आंदोलन? यह आंदोलन कब और कैसे शुरू हुआ? बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था क्या है जिसका विरोध हो रहा है? इस प्रदर्शन में अब तक क्या क्या हुआ? प्रदर्शनकारियों की मांग क्या है?
बांग्लादेश आरक्षण आंदोलन,
- फोटो :
PTI
सबसे पहले जान लीजिए बांग्लादेश में अभी क्या हो रहा है?
देश में जारी हिंसा के बीच सोमवार को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपनी बहन के साथ ढाका छोड़कर चली गईं। उनके देश छोड़ने के बाद पद से इस्तीफे की अटकलें लग रही हैं। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया है।
इससे पहले रविवार (4 अगस्त) को देश भर में हुई हिंसा में करीब 100 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाईं, जिसके चलते ये मौतें हुईं। रविवार को हुई मौतों की संख्या, जिसमें कम से कम 14 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। यह आंकड़ा बांग्लादेश के हाल के इतिहास में किसी भी विरोध प्रदर्शन में एक दिन में सबसे अधिक है। इससे पहले 19 जुलाई को 67 लोगों की मौत हुई थी। उत्तर-पश्चिमी शहर सिराजगंज के इनायतपुर थाने पर हुए हमले में 13 पुलिसकर्मी मारे गये। बताया गया कि रविवार की दोपहर कुछ लोगों ने थाने पर आकर हमला कर दिया। कुछ जगहों पर सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प भी हुई है। कुछ जगहों पर अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और नेताओं की मौत भी हुई है।
रविवार शाम से पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया, रेलवे ने अपनी सेवाएं निलंबित कर दीं और देश का वस्त्र उद्योग बंद कर दिया गया। सरकार ने रविवार को शाम छह बजे से अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा की और सोमवार से तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी की भी घोषणा की।
मोबाइल ऑपरेटरों ने बताया कि हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दूसरी बार सरकार ने हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप भी ब्रॉडबैंड कनेक्शन के जरिए उपलब्ध नहीं हैं। जुलाई में छात्र समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू करने के बाद हुई हिंसा में 300 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए हैं।
देश में जारी हिंसा के बीच सोमवार को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपनी बहन के साथ ढाका छोड़कर चली गईं। उनके देश छोड़ने के बाद पद से इस्तीफे की अटकलें लग रही हैं। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा जमा लिया है।
इससे पहले रविवार (4 अगस्त) को देश भर में हुई हिंसा में करीब 100 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाईं, जिसके चलते ये मौतें हुईं। रविवार को हुई मौतों की संख्या, जिसमें कम से कम 14 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। यह आंकड़ा बांग्लादेश के हाल के इतिहास में किसी भी विरोध प्रदर्शन में एक दिन में सबसे अधिक है। इससे पहले 19 जुलाई को 67 लोगों की मौत हुई थी। उत्तर-पश्चिमी शहर सिराजगंज के इनायतपुर थाने पर हुए हमले में 13 पुलिसकर्मी मारे गये। बताया गया कि रविवार की दोपहर कुछ लोगों ने थाने पर आकर हमला कर दिया। कुछ जगहों पर सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प भी हुई है। कुछ जगहों पर अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और नेताओं की मौत भी हुई है।
रविवार शाम से पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया, रेलवे ने अपनी सेवाएं निलंबित कर दीं और देश का वस्त्र उद्योग बंद कर दिया गया। सरकार ने रविवार को शाम छह बजे से अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा की और सोमवार से तीन दिन की सार्वजनिक छुट्टी की भी घोषणा की।
मोबाइल ऑपरेटरों ने बताया कि हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दूसरी बार सरकार ने हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप भी ब्रॉडबैंड कनेक्शन के जरिए उपलब्ध नहीं हैं। जुलाई में छात्र समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू करने के बाद हुई हिंसा में 300 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए हैं।
बांग्लादेश आरक्षण आंदोलन,
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PTI
बांग्लादेश में कैसे शुरू हुई थी हिंसा?
कहानी 1971 से शुरू होती है। ये वो साल था जब मुक्ति संग्राम के बाद बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी मिली। एक साल बाद 1972 में बांग्लादेश की सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण दे दिया। इसी आरक्षण के विरोध में इस वक्त बांग्लादेश में प्रदर्शन हो रहे हैं।
यह विरोध जून महीने के अंत में शुरू हुआ था तब यह हिंसक नहीं था। हालांकि, मामला तब बढ़ गया जब इन विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग सड़क पर उतर आए। 15 जुलाई को ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों की पुलिस और सत्तारूढ़ अवामी लीग समर्थित छात्र संगठन से झड़प हो गई। इस घटना में कम से कम 100 लोग घायल हो गए।
अगले दिन भी बांग्लादेश में हिंसा जारी रही और कम से कम छह लोग मारे गए। 16 और 17 जुलाई को भी और झड़पें हुईं और प्रमुख शहरों की सड़कों पर गश्त करने के लिए अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया। 18 जुलाई को कम से कम 19 और लोगों की मौत हो गई जबकि 19 जुलाई को 67 लोगों की जान चली गई। इस तरह से इस हिंसक आंदोलन के चलते अब तक 300 से ज्यादा लोगों की जान चली गई है।
कहानी 1971 से शुरू होती है। ये वो साल था जब मुक्ति संग्राम के बाद बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी मिली। एक साल बाद 1972 में बांग्लादेश की सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण दे दिया। इसी आरक्षण के विरोध में इस वक्त बांग्लादेश में प्रदर्शन हो रहे हैं।
यह विरोध जून महीने के अंत में शुरू हुआ था तब यह हिंसक नहीं था। हालांकि, मामला तब बढ़ गया जब इन विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग सड़क पर उतर आए। 15 जुलाई को ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों की पुलिस और सत्तारूढ़ अवामी लीग समर्थित छात्र संगठन से झड़प हो गई। इस घटना में कम से कम 100 लोग घायल हो गए।
अगले दिन भी बांग्लादेश में हिंसा जारी रही और कम से कम छह लोग मारे गए। 16 और 17 जुलाई को भी और झड़पें हुईं और प्रमुख शहरों की सड़कों पर गश्त करने के लिए अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया। 18 जुलाई को कम से कम 19 और लोगों की मौत हो गई जबकि 19 जुलाई को 67 लोगों की जान चली गई। इस तरह से इस हिंसक आंदोलन के चलते अब तक 300 से ज्यादा लोगों की जान चली गई है।
बांग्लादेश आरक्षण आंदोलन,
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अब सवाल उठता है कि आरक्षण 1972 में दिया गया तो आंदोलन अभी क्यों हो रहा है?
1972 से जारी इस आरक्षण व्यवस्था को 2018 में सरकार ने समाप्त कर दिया था। जून में उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण प्रणाली को फिर से बहाल कर दिया। कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने के फैसले को भी गैर कानूनी बताया था। कोर्ट के आदेश के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
हालांकि, बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सरकार की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को निलंबित कर दिया और मामले की सुनवाई के लिए 7 अगस्त की तारीख तय कर दी।
मामले ने तूल और तब पकड़ लिया जब प्रधानमंत्री हसीना ने अदालती कार्यवाही का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों की मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया। सरकार के इस कदम के चलते छात्रों ने अपना विरोध तेज कर दिया। प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को 'रजाकार’ की संज्ञा दी। दरअसल, बांग्लादेश के संदर्भ में रजाकार उन्हें कहा जाता है जिन पर 1971 में देश के साथ विश्वासघात करके पाकिस्तानी सेना का साथ देने के आरोप लगा था।
1972 से जारी इस आरक्षण व्यवस्था को 2018 में सरकार ने समाप्त कर दिया था। जून में उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण प्रणाली को फिर से बहाल कर दिया। कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने के फैसले को भी गैर कानूनी बताया था। कोर्ट के आदेश के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
हालांकि, बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सरकार की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को निलंबित कर दिया और मामले की सुनवाई के लिए 7 अगस्त की तारीख तय कर दी।
मामले ने तूल और तब पकड़ लिया जब प्रधानमंत्री हसीना ने अदालती कार्यवाही का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों की मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया। सरकार के इस कदम के चलते छात्रों ने अपना विरोध तेज कर दिया। प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को 'रजाकार’ की संज्ञा दी। दरअसल, बांग्लादेश के संदर्भ में रजाकार उन्हें कहा जाता है जिन पर 1971 में देश के साथ विश्वासघात करके पाकिस्तानी सेना का साथ देने के आरोप लगा था।
बांग्लादेश आरक्षण आंदोलन,
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PTI
बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था क्या है जिस पर बवाल हो रहा है?
विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था है। इस व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण का प्रावधान था। 1972 में शुरू की गई बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था में तब से कई बदलाव हो चुके हैं। 2018 में जब इसे खत्म किया गया, तो अलग-अलग वर्गों के लिए 56% सरकारी नौकरियों में आरक्षण था। समय-समय पर हुए बदलावों के जरिए महिलाओं और पिछड़े जिलों के लोगों को 10-10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी तरह पांच फीसदी आरक्षण धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए और एक फीसदी दिव्यांग कोटा दिया गया। हालांकि, हिंसक आंदोलन के बीच 21 जुलाई को बांग्लादेश के शीर्ष न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अधिकतर आरक्षण खत्म कर दिया।
विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था है। इस व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण का प्रावधान था। 1972 में शुरू की गई बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था में तब से कई बदलाव हो चुके हैं। 2018 में जब इसे खत्म किया गया, तो अलग-अलग वर्गों के लिए 56% सरकारी नौकरियों में आरक्षण था। समय-समय पर हुए बदलावों के जरिए महिलाओं और पिछड़े जिलों के लोगों को 10-10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी तरह पांच फीसदी आरक्षण धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए और एक फीसदी दिव्यांग कोटा दिया गया। हालांकि, हिंसक आंदोलन के बीच 21 जुलाई को बांग्लादेश के शीर्ष न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अधिकतर आरक्षण खत्म कर दिया।
बांग्लादेश में प्रदर्शनकारी
- फोटो :
एक्स/तारीक रहमान
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर क्या फैसला सुनाया?
21 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत सभी सिविल सेवा नौकरियों के लिए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय में, यह निर्धारित किया गया कि अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों या दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी। वहीं बाकी बचे पदों के लिए अदालत ने कहा कि ये योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए खुले होंगे। यानी 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होंगी।
21 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत सभी सिविल सेवा नौकरियों के लिए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय में, यह निर्धारित किया गया कि अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों या दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी। वहीं बाकी बचे पदों के लिए अदालत ने कहा कि ये योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए खुले होंगे। यानी 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होंगी।
शेख हसीना
- फोटो :
एएनआई
कोर्ट ने लगभग आरक्षण खत्म कर दिया, फिर क्यों प्रदर्शन हो रहे हैं?
शुरुआत से प्रदर्शनकारी छात्र मुख्य रूप से स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए आरक्षित नौकरियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि इसकी जगह योग्यता आधारित व्यवस्था लागू हो। प्रदर्शनकारी इस व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे थे, उनका कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है और प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी के समर्थकों के फायदे के लिए है। बता दें कि प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब उर रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद माना जा रहा था कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आंदोलन और भी उग्र हो गया। छात्र संगठनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब विरोध प्रदर्शनों का अंत नहीं है और इन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।
जहांगीरनगर विश्वविद्यालय के विरोध समन्वयक महफूजुल हसन ने कहा कि उनकी अभी भी कई मांगें हैं जिन्हें सरकार को पूरा करना होगा, तभी वे प्रदर्शन समाप्त करेंगे। उन्होंने कहा, 'अब हम अपने भाइयों की जान के लिए न्याय चाहते हैं। प्रधानमंत्री को माफी मांगनी चाहिए और जो लोग दोषी हैं, उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।'
हसन ने कहा कि छात्र समूह उन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को हटाने की भी मांग कर रहे हैं, जहां प्रदर्शनकारियों को हिंसा का सामना करना पड़ा और उन राजनेताओं को भी हटाया जाना चाहिए, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों के बारे में भड़काऊ टिप्पणियां फैलाईं।
ढाका विश्वविद्यालय के छात्र और विरोध-प्रदर्शन के समन्वयक हसीब अल-इस्लाम ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सकारात्मक मानते हैं, लेकिन मांग की कि आरक्षण संशोधन विधेयक संसद में पारित किया जाए। इस्लाम ने कहा कि विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार उनकी संशोधन मांगों के अनुसार एक कार्यकारी आदेश जारी नहीं करती।
शुरुआत से प्रदर्शनकारी छात्र मुख्य रूप से स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए आरक्षित नौकरियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि इसकी जगह योग्यता आधारित व्यवस्था लागू हो। प्रदर्शनकारी इस व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे थे, उनका कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है और प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी के समर्थकों के फायदे के लिए है। बता दें कि प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब उर रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद माना जा रहा था कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आंदोलन और भी उग्र हो गया। छात्र संगठनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब विरोध प्रदर्शनों का अंत नहीं है और इन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।
जहांगीरनगर विश्वविद्यालय के विरोध समन्वयक महफूजुल हसन ने कहा कि उनकी अभी भी कई मांगें हैं जिन्हें सरकार को पूरा करना होगा, तभी वे प्रदर्शन समाप्त करेंगे। उन्होंने कहा, 'अब हम अपने भाइयों की जान के लिए न्याय चाहते हैं। प्रधानमंत्री को माफी मांगनी चाहिए और जो लोग दोषी हैं, उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।'
हसन ने कहा कि छात्र समूह उन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को हटाने की भी मांग कर रहे हैं, जहां प्रदर्शनकारियों को हिंसा का सामना करना पड़ा और उन राजनेताओं को भी हटाया जाना चाहिए, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों के बारे में भड़काऊ टिप्पणियां फैलाईं।
ढाका विश्वविद्यालय के छात्र और विरोध-प्रदर्शन के समन्वयक हसीब अल-इस्लाम ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सकारात्मक मानते हैं, लेकिन मांग की कि आरक्षण संशोधन विधेयक संसद में पारित किया जाए। इस्लाम ने कहा कि विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार उनकी संशोधन मांगों के अनुसार एक कार्यकारी आदेश जारी नहीं करती।
पूरे मसले पर सरकार का क्या रुख है?
बांग्लादेश में ताजा हिंसा के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा पैनल की बैठक की थी। इसके बाद एक बयान में पीएम हसीना ने कहा, 'जो लोग इस समय सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, वे छात्र नहीं बल्कि आतंकवादी हैं जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं।' प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं अपने देशवासियों से इन आतंकवादियों का सख्ती से दमन करने की अपील करती हूं।'
राजधानी ढाका में एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तोड़फोड़ हुई। इस घटना के बाद स्वास्थ्य मंत्री सामंत लाल सेन ने कहा कि अस्पताल पर हमला अस्वीकार्य है। उन्होंने ने कहा कि हर किसी को इससे बचना चाहिए।
विरोध के शुरुआत प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण प्रणाली का बचाव करते हुए कहा था कि युद्ध में अपने योगदान के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उनका राजनीतिक जुड़ाव कुछ भी हो। उनकी सरकार ने मुख्य विपक्षी दलों, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर अराजकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
इस बीच, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने पीएम हसीना से सड़कों से सैनिकों को हटाने और संकट को हल करने के लिए 'राजनीतिक पहल' करने का आग्रह किया है। वहीं सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने कहा है कि सेना हमेशा लोगों के हितों और देश की किसी भी जरूरत के लिए मौजूद रहेगी।
बांग्लादेश में ताजा हिंसा के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा पैनल की बैठक की थी। इसके बाद एक बयान में पीएम हसीना ने कहा, 'जो लोग इस समय सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, वे छात्र नहीं बल्कि आतंकवादी हैं जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं।' प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं अपने देशवासियों से इन आतंकवादियों का सख्ती से दमन करने की अपील करती हूं।'
राजधानी ढाका में एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तोड़फोड़ हुई। इस घटना के बाद स्वास्थ्य मंत्री सामंत लाल सेन ने कहा कि अस्पताल पर हमला अस्वीकार्य है। उन्होंने ने कहा कि हर किसी को इससे बचना चाहिए।
विरोध के शुरुआत प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण प्रणाली का बचाव करते हुए कहा था कि युद्ध में अपने योगदान के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उनका राजनीतिक जुड़ाव कुछ भी हो। उनकी सरकार ने मुख्य विपक्षी दलों, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर अराजकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
इस बीच, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने पीएम हसीना से सड़कों से सैनिकों को हटाने और संकट को हल करने के लिए 'राजनीतिक पहल' करने का आग्रह किया है। वहीं सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने कहा है कि सेना हमेशा लोगों के हितों और देश की किसी भी जरूरत के लिए मौजूद रहेगी।