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73 साल पुराने ऑपरेशन गुलमर्ग के मंसूबे को अंजाम देने में जुटा है पाकिस्तान, जानिए क्या हुआ था उस समय

Sat, 17 Oct 2020 03:25 PM IST
अनवर अंसारी एएनआई, एमर्स्टडम
एएनआई, एमर्स्टडम Published by: अनवर अंसारी Updated Sat, 17 Oct 2020 03:25 PM IST
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What is Operation Gulmarg, Pakistan continues its attempt to seize jammu kashmir from 1947, says European think tank
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

जम्मू-कश्मीर के इतिहास में सन 1947 की 21-22 अक्तूबर की दरम्यानी रात को सबसे भयानक और अंधकारमय रात के तौर पर जाना जाता है। इस रात धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को बर्बाद करने और उस पर कब्जे के इरादे से पाकिस्तान ने ऑपरेशन गुलमर्ग शुरू किया था। इस घटना को 73 साल बीत चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान अब भी उसी प्लान के तहत जम्मू-कश्मीर को कब्जाने के लिए दिन में सपने देख रहा है। एक यूरोपीय थिंक टैंक ने इसकी जानकारी दी है। 


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जम्मू-कश्मीर के इतिहास में सन 1947 की 21-22 अक्तूबर की दरम्यानी रात को सबसे भयानक और अंधकारमय रात के तौर पर जाना जाता है। इस रात धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को बर्बाद करने और उस पर कब्जे के इरादे से पाकिस्तान ने ऑपरेशन गुलमर्ग शुरू किया था। इस घटना को 73 साल बीत चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान अब भी उसी प्लान के तहत जम्मू-कश्मीर को कब्जाने के लिए दिन में सपने देख रहा है। एक यूरोपीय थिंक टैंक ने इसकी जानकारी दी है। 

यूरोपीय फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (ईएफएसएएस) ने एक व्याख्या में कबाइलियों के हमले के खौफ को याद किया है, जिसमें 35 से 40 हजार लोग मारे गए थे। यह जम्मू-कश्मीर के इतिहास का एक काला अध्याय है, जिसे यादकर आज भी लोग सिहर उठते हैं।


ईएफएसएएस ने कहा, इसी दिन कश्मीरी पहचान को खत्म करने के लिए पहला और सबसे घातक कदम उठाया गया। संयुक्त राष्ट्र की ओर से खींचे गए एलओसी (नियंत्रण रेखा) से लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया गया, जिसने पूर्ववर्ती रियासत और उसके निवासियों को विभाजित कर दिया। 

यह भी पढ़ें: आतंक को पनाह देने और अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने के बाद भी यूएन मानवाधिकार परिषद में चुना गया पाकिस्तान

जिन्ना के करीबी और मेजर जनरल अकबर खान ने रची थी घुसपैठ की साजिश
थिंक टैंक के मुताबिक, ऑपरेशन गुलमर्ग अगस्त 1947 में मेजर जनरल अकबर खान की कमांड में तैयार किया गया था। उन्होंने हाल ही में अपनी पुस्तक में इसकी जानकारी दी है। वॉशिंगटन डीसी आधारित राजनीतिक और कूटनीतिक विश्लेषक शुजा नवाज ने 22 पश्तून कबाइलियों की सूची तैयार की है जो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ में शामिल थे। जनरल खान के अलावा इस ऑपरेशन की प्लानिंग और इसे अंजाम देने वालों में सरदार शौकत हयात खान भी शामिल था, जो पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का करीबी था।

पाकिस्तान सरकार ने दिए थे पैसे
शौकत ने बाद में 'द नेशन दैट लॉस्ट इट्स सोल' नाम की एक किताब में स्वीकार किया कि उसे कश्मीर ऑपरेशन का सुपरवाइजर नियुक्त किया गया था। उसने यह भी बताया कि इस ऑपरेशन के लिए उस समय के पाकिस्तानी वित्त मंत्री गुलाम मोहम्मद ने पाकिस्तान के खजाने से तीन लाख रुपए की सहायता दी थी।

बसों में भरकर लड़ने के लिए पहुंचाया गया

ईएफएसएएस ने कहा, मेजर जनरल अकबर खान ने जम्मू-कश्मीर पर हमले के लिए 22 अक्तूबर 1947 की तारीख तय की थी। सभी लड़ाकों से जम्मू-कश्मीर सीमा के नजदीक 18 अक्तूबर को एबटाबाद में इकट्ठा होने को कहा गया। रात में इन लड़ाकों को नागरिकों के लिए इस्तेमाल होने वाली बसों और ट्रकों में भरकर पहुंचाया जा रहा था। 

धार्मिक जिहाद के नाम पर फैलाई झूठी कहानी
यूरोपीय थिंक टैंक के मुताबिक, पाकिस्तान ने एक झूठी कहानी रचते हुए कबाइली घुसपैठियों को मुक्तिदाता के रूप में पेश किया और बताया कि ये लोग कश्मीर में अपने धार्मिक कर्तव्य 'जिहाद' के लिए जा रहे हैं, क्योंकि जम्मू में मुसलमानों को सांप्रदायिक दंगों में मारा जा रहा है। हालांकि, वास्तविकता यह नहीं थी और कबाइलियों ने मुसलमानों को भी नहीं बख्शा। घुसपैठियों ने बारामूला में 26 अक्तूबर 1947 को करीब 11 हजार लोगों को मार डाला और श्रीनगर में बिजली सप्लाई करने वाले मोहरा पावर स्टेशन को नष्ट कर दिया। 

यह भी पढ़ें: उइगुर मुस्लिमों पर अत्याचार को लेकर संयुक्त राष्ट्र में घिरा चीन, बचाव में कूदा कर्जदार पाकिस्तान

श्रीनगर तक पहुंच गए थे घुसपैठिए
जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस घुसपैठ के बारे में बताते हुए कहा, हमलावर हमारी जमीन पर आए। उन्होंने हजारों लोगों को मार डाला। मरने वालों में हिंदू, सिख और मुस्लिम लोग थे। हमलावरों ने हिंदू, सिख और मुस्लिमों की हजारों बेटियों को अगवा कर लिया। संपत्तियों को लूटा और ग्रीष्मकालीन राजधानी, श्रीनगर के द्वार तक पहुंच गए। 

पाकिस्तान परस्त लोगों को नहीं भूलना चाहिए ये वाकया
निष्कर्ष में ईएफएसएएस ने कहा कि जो लोग पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा और जम्मू कश्मीर में मुसलमानों के कल्याण को लेकर चिंतित हैं। उन्हें अक्तूबर 1947 वाली इस्लामाबाद की नीति को नहीं भूलना चाहिए। पाकिस्तान ने बल द्वारा राज्य को हथियाने का प्रयास किया, जिसने जम्मू-कश्मीर के अस्तित्व को सबसे बड़ा झटका दिया। 

यूरोपीय थिंक टैंक ने कहा, कबाइली घुसपैठ की योजना तैयार करने वाले और इसे अंजाम देने वाले बेशक कश्मीरी लोगों के सबसे बड़े दुश्मन बने हुए हैं। 22 अक्तूबर 1947 का दिन जब घुसपैठ की शुरुआत हुई, जम्मू-कश्मीर के इतिहास का सबसे बुरा दिन बना हुआ है। 
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