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West Asia Conflict: ट्रंप को कौन सा संदेश देना चाह रहे पुतिन, रूस की मदद से कितना बदलेगा संघर्ष?
सार
रूस के राष्ट्रपति अपने विश्वसनीय एयरक्राफ्ट को ईरान के समर्थन में भेजकर अमेरिका, नाटो संगठन और इस्राइल को सीधा संदेश दे रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि रूस ईरान की सुरक्षा और उसके सहयोग में अब खुलकर आ रहा है। संदेश में यह छिपा तथ्य है कि अब अमेरिका और ईरान को शांति वार्ता प्रक्रिया पर अमल करना चाहिए।
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ट्रंप और पुतिन।
- फोटो : PTI
विस्तार
रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने ईरान के आसमान की सुरक्षा के लिए टीयू-214जीयू(डूम्सडे) एयरक्राफ्ट भेजा है। इसके बाद दुनिया के देशों की निगाह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रंप के अगले कदम पर है। पुतिन ने ऐसा करके अपना पत्ता खोल दिया है, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अपना पत्ता खोलेंगे? पुतिन का यह संदेश केवल ईरान की मदद ही नहीं बल्कि इससे कहीं आगे है।
क्या संदेश दे रहे हैं पुतिन?
रूस के राष्ट्रपति अपने विश्वसनीय एयरक्राफ्ट को ईरान के समर्थन में भेजकर अमेरिका, नाटो संगठन और इस्राइल को सीधा संदेश दे रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि रूस ईरान की सुरक्षा और उसके सहयोग में अब खुलकर आ रहा है। संदेश में यह छिपा तथ्य है कि अब अमेरिका और ईरान को शांति वार्ता प्रक्रिया पर अमल करना चाहिए। थोड़ा पीछे चलें तो रूस यूक्रेन के साथ फरवरी 2022 से युद्ध में फंसा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को कभी अमेरिका और रूस ने हवा दी थी और रूस को अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता का खतरा पैदा होने लगा था। इसके बाद अमेरिका, नाटो संगठन और इस्राइल ने बहुत आसानी से सीरिया में बशर-अल-असद को सत्ता से हटा दिया। उन्हें भागकर रूस में शरण लेनी पड़ी। यह पश्चिम एशिया में अमेरिका का दबदबा बढ़ने का साफ संकेत था।
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क्या संदेश दे रहे हैं पुतिन?
रूस के राष्ट्रपति अपने विश्वसनीय एयरक्राफ्ट को ईरान के समर्थन में भेजकर अमेरिका, नाटो संगठन और इस्राइल को सीधा संदेश दे रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि रूस ईरान की सुरक्षा और उसके सहयोग में अब खुलकर आ रहा है। संदेश में यह छिपा तथ्य है कि अब अमेरिका और ईरान को शांति वार्ता प्रक्रिया पर अमल करना चाहिए। थोड़ा पीछे चलें तो रूस यूक्रेन के साथ फरवरी 2022 से युद्ध में फंसा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को कभी अमेरिका और रूस ने हवा दी थी और रूस को अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता का खतरा पैदा होने लगा था। इसके बाद अमेरिका, नाटो संगठन और इस्राइल ने बहुत आसानी से सीरिया में बशर-अल-असद को सत्ता से हटा दिया। उन्हें भागकर रूस में शरण लेनी पड़ी। यह पश्चिम एशिया में अमेरिका का दबदबा बढ़ने का साफ संकेत था।
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फरवरी 2022 के बाद फलस्तीनी लड़ाके हमास ने इस्राइल पर हमला किया। इस्राइल ने हमास पर सैन्य कार्रवाई की और जवाब में यह संघर्ष फलस्तीन के हमास, लेबनान के हिज्बुल्ला, यमन के हूती विद्रोहियों तक पहुंच गया। तीनों संगठनों को ईरान की प्रॉक्सी माना जाता है। धीरे-धीरे सैन्य कार्रवाई की चपेट में ईरान आ गया। अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर भीषण हमला किया। उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई इसमें अपने शीर्ष नेताओं, परिवार के कई सदस्यों के साथ मारे गए। जवाब में ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिका के सैन्य अड्डों, इस्राइल के ठिकानों पर हमला किया। अमेरिका और ईरान में शांति की पहल हुई और फिर दोनों ने एक दूसरे पर हमला करना शुरू कर दिया है।
क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी आएंगे आगे?
पश्चिम एशिया में रूस और चीन दोनों को अमेरिका-नाटो-इस्राइल का दबदबा स्वीकार नहीं है। इसका एक बड़ा कारण इस पूरे क्षेत्र का ऊर्जा सुरक्षा से समृद्ध होना और रूस और चीन के भी इन देशों में अपने हित हैं। अभी तक चीन ने ईरान की पुराने सहयोगी और आपसी संबंध तथा समझौते का हवाला देकर सहायता की है। उसे आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहायता दी, लेकिन युद्ध में शामिल होने से परहेज किया है। अब धीरे-धीरे अमेरिका-ईरान का टकराव खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ‘नाक’ की लड़ाई चुनौती बन रही है। ऐसे में देखना होगा कि चीन आगे क्या रूख अपनाता है।
क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी आएंगे आगे?
पश्चिम एशिया में रूस और चीन दोनों को अमेरिका-नाटो-इस्राइल का दबदबा स्वीकार नहीं है। इसका एक बड़ा कारण इस पूरे क्षेत्र का ऊर्जा सुरक्षा से समृद्ध होना और रूस और चीन के भी इन देशों में अपने हित हैं। अभी तक चीन ने ईरान की पुराने सहयोगी और आपसी संबंध तथा समझौते का हवाला देकर सहायता की है। उसे आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहायता दी, लेकिन युद्ध में शामिल होने से परहेज किया है। अब धीरे-धीरे अमेरिका-ईरान का टकराव खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ‘नाक’ की लड़ाई चुनौती बन रही है। ऐसे में देखना होगा कि चीन आगे क्या रूख अपनाता है।
ईरान अपने सर्वोच्च नेता का जनाजा ऐसे ही नहीं ले गया था इराक
विदेश मामले के जानकार एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका और ईरान में शांति वार्ता प्रक्रिया टिकने की गुंजाइश कम नजर आ रही थी। अमेरिका ईरान को कई मामलों में स्पष्टता नहीं देना चाहता था। वह यह भी संदेश नहीं देना चाहता था कि बिना उद्देश्य पूरा हुए उसने समर्पण कर दिया। दूसरे ईरान अमेरिका की हार प्रचारित करने के साथ-साथ कुछ मुद्दों पर पहले स्पष्टीकरण चाहता था। एसके शर्मा कहते हैं कि ईरान के रणनीतिकारों ने बहुत सोच समझकर अपने सर्वोच्च नेता खामेनेई के जनाजे को इराक तक ले जाने का निर्णय लिया। संभव है कि ईरान की इस कोशिश में उसे अंतरराष्ट्रीय मित्र देशों का समर्थन मिला हो। यह एक तरह से ईरान की पश्चिम एशिया में अपनी मजबूती दर्शाने के संदेश से जुड़ा था। विदेश मामले के जानकार रंजीत कुमार भी मानते हैं कि यह अमेरिका के रणनीतिकारों को शायद ही हजम हुआ हो। अमेरिका के रणनीतिकारों ने सीरिया के नेतृत्व से इस विषय में एक समीकरण बिठाना चाहा, लेकिन मौजदा नेतृत्व ने भी इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। रंजीत कुमार कहते हैं कि खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की प्रक्रिया जारी रहने के दौरान ही शांति के प्रयास का खटाई में पड़ना और हमले शुरू हो जाना विश्वास की कमी का ही नतीजा माना जाएगा।
विदेश मामले के जानकार एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका और ईरान में शांति वार्ता प्रक्रिया टिकने की गुंजाइश कम नजर आ रही थी। अमेरिका ईरान को कई मामलों में स्पष्टता नहीं देना चाहता था। वह यह भी संदेश नहीं देना चाहता था कि बिना उद्देश्य पूरा हुए उसने समर्पण कर दिया। दूसरे ईरान अमेरिका की हार प्रचारित करने के साथ-साथ कुछ मुद्दों पर पहले स्पष्टीकरण चाहता था। एसके शर्मा कहते हैं कि ईरान के रणनीतिकारों ने बहुत सोच समझकर अपने सर्वोच्च नेता खामेनेई के जनाजे को इराक तक ले जाने का निर्णय लिया। संभव है कि ईरान की इस कोशिश में उसे अंतरराष्ट्रीय मित्र देशों का समर्थन मिला हो। यह एक तरह से ईरान की पश्चिम एशिया में अपनी मजबूती दर्शाने के संदेश से जुड़ा था। विदेश मामले के जानकार रंजीत कुमार भी मानते हैं कि यह अमेरिका के रणनीतिकारों को शायद ही हजम हुआ हो। अमेरिका के रणनीतिकारों ने सीरिया के नेतृत्व से इस विषय में एक समीकरण बिठाना चाहा, लेकिन मौजदा नेतृत्व ने भी इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। रंजीत कुमार कहते हैं कि खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की प्रक्रिया जारी रहने के दौरान ही शांति के प्रयास का खटाई में पड़ना और हमले शुरू हो जाना विश्वास की कमी का ही नतीजा माना जाएगा।
क्या है अमेरिका और ईरान की रणनीति?
अमेरिका ने भारी भरकम हमले के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका के हमलों में ईरान के होर्मुज को लेकर शर्तों पर न अड़ने, परमाणु हथियार को लेकर स्पष्ट तौर से समझौते की मेज पर आने, प्राक्सी को समर्थन देने की नीति से पीछे हटने का संदेश छिपा है। जबकि ईरान शिया मिलिशिया, इस्लाम की एकता और क्षेत्रीय संप्रभुता का रंग देते हुए अमेरिका के पश्चिम एशिया में स्थिति सैन्य अड्डों को निशाना बना रहा है। ईरान बार-बार कह रहा है कि वह अमेरिका और उसकी फौज को क्षेत्र से बाहर कर देगा। ईरान की कुद्दस फोर्स और अमेरिकी हमले में मारे गए उसके मेजर जनरल सुलेमानी इसी डॉक्टरिन पर काम कर रहे थे।
...तो आगे क्या होगा?
होर्मुज से दुनिया के देशों का 20 प्रतिशत से अधिक ईधन तेल, गैस, यूरिया और अन्य खाद के मालवाहक जहाज गुजरते हैं। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में यह काफी असरकारक है। ईरान और अमेरिका के जवाबी हमले के बाद यह रास्ता एक बार फिर बंद हो चुका है। इसके कारण कच्चे तेल, गैस, उर्रवरक आदि का संकट खड़ा होने के आसार बन गए हैं। कच्चे तेल के दामों में बढ़ोत्तरी की आशंका है। इसका असर तमाम देशों के उद्योगों, आयात-निर्यात तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ने के आसार है। दुनिया में मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी बढ़ने की प्रबल आशंका है। इसके अलावा अमेरिका-इस्राइल और ईरान में शांति की संभावना धूमिल हो जाने के आसार बढ़ गए हैं। पूर्ण कालिक युद्ध की तरफ स्थितियां बनने लगी है। अब इसका भी डर बढ़ रहा है कि कहीं महाशक्तियों के बीच में टकराव की नौबत तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ न ले जाए?
अमेरिका ने भारी भरकम हमले के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका के हमलों में ईरान के होर्मुज को लेकर शर्तों पर न अड़ने, परमाणु हथियार को लेकर स्पष्ट तौर से समझौते की मेज पर आने, प्राक्सी को समर्थन देने की नीति से पीछे हटने का संदेश छिपा है। जबकि ईरान शिया मिलिशिया, इस्लाम की एकता और क्षेत्रीय संप्रभुता का रंग देते हुए अमेरिका के पश्चिम एशिया में स्थिति सैन्य अड्डों को निशाना बना रहा है। ईरान बार-बार कह रहा है कि वह अमेरिका और उसकी फौज को क्षेत्र से बाहर कर देगा। ईरान की कुद्दस फोर्स और अमेरिकी हमले में मारे गए उसके मेजर जनरल सुलेमानी इसी डॉक्टरिन पर काम कर रहे थे।
...तो आगे क्या होगा?
होर्मुज से दुनिया के देशों का 20 प्रतिशत से अधिक ईधन तेल, गैस, यूरिया और अन्य खाद के मालवाहक जहाज गुजरते हैं। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में यह काफी असरकारक है। ईरान और अमेरिका के जवाबी हमले के बाद यह रास्ता एक बार फिर बंद हो चुका है। इसके कारण कच्चे तेल, गैस, उर्रवरक आदि का संकट खड़ा होने के आसार बन गए हैं। कच्चे तेल के दामों में बढ़ोत्तरी की आशंका है। इसका असर तमाम देशों के उद्योगों, आयात-निर्यात तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ने के आसार है। दुनिया में मंहगाई, बेरोजगारी, भुखमरी बढ़ने की प्रबल आशंका है। इसके अलावा अमेरिका-इस्राइल और ईरान में शांति की संभावना धूमिल हो जाने के आसार बढ़ गए हैं। पूर्ण कालिक युद्ध की तरफ स्थितियां बनने लगी है। अब इसका भी डर बढ़ रहा है कि कहीं महाशक्तियों के बीच में टकराव की नौबत तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ न ले जाए?
शांति की क्या है उम्मीद?
अमेरिका और ईरान के बीच में फासला है, लेकिन बीच में कुछ देश हैं। इनमें ओमान भी प्रमुख है। ओमान जैसे देश की सहायता से शांति प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। पूर्ण कालिक युद्ध की स्थिति से बचा जा सकता है। हालांकि एसके शर्मा का कहना है बिना किसी मजबूत मध्यस्थ के उन्हें स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं दिखाई देती। एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका और ईरान का झगड़ा अब विश्व स्तर की पंचायत के दखल की मांग कर रहा है। तभी शांति प्रक्रिया किसी अंजाम तक पहुंच सकेगी और अमेरिका या ईरान दोनों उसकी अवहेलना करने से पहले सोचेंगे।
अमेरिका और ईरान के बीच में फासला है, लेकिन बीच में कुछ देश हैं। इनमें ओमान भी प्रमुख है। ओमान जैसे देश की सहायता से शांति प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। पूर्ण कालिक युद्ध की स्थिति से बचा जा सकता है। हालांकि एसके शर्मा का कहना है बिना किसी मजबूत मध्यस्थ के उन्हें स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं दिखाई देती। एसके शर्मा कहते हैं कि अमेरिका और ईरान का झगड़ा अब विश्व स्तर की पंचायत के दखल की मांग कर रहा है। तभी शांति प्रक्रिया किसी अंजाम तक पहुंच सकेगी और अमेरिका या ईरान दोनों उसकी अवहेलना करने से पहले सोचेंगे।