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Iran-US: ईरान में असंतोष का फायदा उठाने की फिराक में यूएस; सुलह वाला नेतृत्व आया तो होगी ट्रंप की रणनीतिक जीत

Sun, 22 Jun 2025 04:15 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sun, 22 Jun 2025 04:15 AM IST
सार

खामनेई  के शासनकाल (1989–अब तक) में ईरान ने विज्ञान, परमाणु तकनीक, मिसाइल क्षमता, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय तरक्की की है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, राजनीतिक दमन, आर्थिक बदहाली ने देश के विकास कई बार बाधित किया है, जिससे सामाजिक असंतोष भी बढ़ा है।
 

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us trying to take advantage of discontent in Iran; if reconciliatory leadership emerges, its strategic victory
खामनेई- ट्रंप - फोटो : ANI

विस्तार

इस्राइल के साथ संघर्ष और ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई की बढ़ती उम्र व स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बीच सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता संभाल रहे खामेनेई की अनुपस्थिति में ईरान का नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा, यह सवाल चर्चा में है।

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पश्चिम एशिया की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं जहां आंतरिक, राजनीतिक और धार्मिक समीकरणों से जुड़ी हैं, वहीं इसमें अमेरिका की भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। खामनेई  के शासनकाल (1989–अब तक) में ईरान ने विज्ञान, परमाणु तकनीक, मिसाइल क्षमता, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय तरक्की की है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, राजनीतिक दमन, आर्थिक बदहाली ने देश के विकास कई बार बाधित किया है, जिससे सामाजिक असंतोष भी बढ़ा है।
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अमेरिकी दखल से बदली थी सत्ता
ईरान और अमेरिका के रिश्तों का इतिहास बहुत उलझा हुआ है। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन की गुप्त एजेंसी (सीआईए और एमआई6) की मदद से ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक का तख्तापलट किया गया था, जिससे पश्चिमी समर्थक शाह को सत्ता में वापस लाया गया। इस ऐतिहासिक घटना ने ईरानी समाज में
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अमेरिकी दखल को लेकर गहरी अविश्वास की भावना पैदा की, जो आज तक कायम है।

 ईरान के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम, इस्राल विरोधी नीति और यमन, इराक, सीरिया व लेबनान में उसकी शिया मिलिशिया गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका का रुख आक्रामक रहा है। ऐसे में यदि ईरान में ऐसा नेतृत्व आए जो अमेरिका से सुलह की नीति अपनाए तो यह वाशिंगटन की रणनीतिक जीत होगी। हालांकि अमेरिका का सीधा हस्तक्षेप आसान नहीं है। 

ओबामा से बड़ा बनने की चाह मेें ट्रंप को नोबेल का ख्वाब
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल में नोबल शांति पुरस्कार हासिल करने का सपना पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से बड़ा बनने की चाह में पल रहा है। अपनी इसी हसरत को पूरा करने के लिए ट्रंप आए दिन भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रुकवाने का बेतुका दावा करते रहते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने रूस-यूक्रेन जंग में भी शांति दूत बनने की कोशिश की लेकिन रूस ने उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया। अब वह इस्राइल-ईरान युद्ध में भी अपनी अहमियत साबित कराना चाह रहे हैं। इसलिए ईरान के खिलाफ जंग में अपने देश के शामिल होने या न होने का खुलकर एलान नहीं कर पा रहे। 


इसे भी पढ़ें- Operation Sindhu: अब तक 1117 भारतीयों की ईरान से वतन वापसी, बोले- देश आकर जान में जान आई; सरकार का जताया आभार

अमेरिका के अश्वेत पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को 2009 में नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ओबामा को यह सम्मान वैश्विक शांति व परमाणु हथियारों के खात्मे की कोशिशों के लिए दिया गया था। हालांकि तब भी कई आलोचकों ने ओबामा को नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़े किए थे लेकिन ट्रंप इस सम्मान को अपनी विरासत का हिस्सा बनाना चाहते हैं क्योंकि उनका राजनीतिक सफर हमेशा दूसरों से बड़ा बनने वाला रहा है।

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