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बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण: उत्तर कोरिया पर अमेरिका और रूस के अपने-अपने दांव, दक्षिण कोरिया का मध्यमार्गी रुख
Fri, 26 Mar 2021 03:46 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 26 Mar 2021 03:46 PM IST
सार
लावरोव की सियोल यात्रा रूस और दक्षिण कोरिया के बीच राजनयिक संबंध बनने की 30वीं सालगिरह के मौके पर हुई है। जानकारों के मुताबिक इस दौरान लावरोव की कोशिश इस क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ रही सक्रियता के मद्देनजर दक्षिण कोरिया के साथ संबंध नई गर्मजोशी लाने पर रहा...
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रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव
- फोटो : ANI (File)
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने गुरुवार को चेतावनी दी कि अगर उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण जारी रखा, तो उसका जवाब दिया जाएगा। बाइडन ने यह भी कहा कि अमेरिका इस मामले में अपने सहयोगियों से राय-मशविरा कर रहा है। लेकिन उन्होंने यह साफ नहीं किया कि उन सहयोगी देशों में कौन शामिल हैं। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की 2016 में कही गई इस बात से सहमति जरूर जताई कि उत्तर कोरिया अमेरिका के लिए विदेश नीति संबंधी सबसे बड़ी चुनौती है।
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इस बीच रूस ने उत्तर कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर छह देशों की बातचीत फिर शुरू करने का ठोस प्रस्ताव रखा है। दक्षिण कोरिया की यात्रा पर गए रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के साथ-साथ जापान, अमेरिका, चीन और रूस की वार्ता फिर शुरू करने की पेशकश की। गौरतलब है कि साल भर तक कोई परीक्षण ना करने के बाद इस हफ्ते उत्तर कोरिया ने मिसाइलों का परीक्षण फिर शुरू कर दिया है। इससे न सिर्फ उसके पास-पड़ोस, बल्कि अमेरिका तक में चिंता जताई गई है।
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पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में उत्तर कोरिया के सवाल पर बहुपक्षीय वार्ता पर विराम लग गया था। ट्रंप ने सीधे उत्तर कोरिया से बात करने की नीति अपनाई थी। ट्रंप ने तमाम परंपराओं को तोड़ते हुए उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन से मुलाकात की। उससे चीन और रूस सहित बाकी देश भी इस प्रक्रिया से बाहर हो गए। विश्लेषकों का कहना है कि इसीलिए लावरोव ने बदले हालात में फिर से बहुपक्षीय प्रयास पर जोर दिया है।
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लावरोव की सियोल यात्रा रूस और दक्षिण कोरिया के बीच राजनयिक संबंध बनने की 30वीं सालगिरह के मौके पर हुई है। जानकारों के मुताबिक इस दौरान लावरोव की कोशिश इस क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ रही सक्रियता के मद्देनजर दक्षिण कोरिया के साथ संबंध नई गर्मजोशी लाने पर रहा। दक्षिण कोरिया इस समय मध्यमार्गी रुख अपना रहा है। इसके पीछे उसकी मजबूरी भी है। एक तरफ उसकी अमेरिका के साथ सुरक्षा भागीदारी है, दूसरी तरफ वह आर्थिक मामलों में वह चीन की अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। इसके बीच रूस को आशा है कि दक्षिण कोरिया को जापान और दक्षिण कोरिया के साथ त्रिपक्षीय गठबंधन बनाने की अमेरिकी कोशिश को नाकाम किया जा सकता है।
दक्षिण कोरिया पहुंचने से पहले एक इंटरव्यू में लावरोव ने कहा था कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गुट बनाने की अमेरिकी कोशिश का मकसद यहां सकारात्मक पहल करना नहीं है। बल्कि उसका मकसद कुछ देशों के खिलाफ लामबंदी है। यहां साझा प्रेस कांफ्रेंस में लावरोव और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चुंग इवी योंग ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र संबंधी मसलों पर कोई बात नहीं की। लेकिन विश्लेषकों ने इस तरफ ध्यान खींचा है कि दक्षिण कोरिया ने अपने को अमेरिकी नेतृत्व में चौगुट (क्वैड) से खुद को अलग रखा है। साफ तौर पर इसका मकसद चीन को नाराज करने से बचना है।
उत्तर कोरिया के सवाल पर सियोल में लावरोव ने कहा कि रूस और दक्षिण कोरिया संबंधी पक्षों के बीच बातचीत जल्द शुरू करने के लिए संकल्पबद्ध हैं, ताकि इस क्षेत्र की तमाम समस्याओं का टिकाऊ हल निकाला जा सके। इस टिप्पणी के कुछ ही घंटों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने उत्तर कोरिया को उचित जवाब देने का इरादा जताया। जानकारों के मुताबिक इससे ये तो साफ हो गया है कि उत्तर कोरिया का मसला फिर से विश्व एजेंडे पर ऊपर आ गया है, लेकिन उसको लेकर आने वाले दिनों में कैसी पहल होगी, इस पर स्पष्टता नहीं है। आशंका यह है कि ये मुद्दा भी अमेरिकी खेमे के देशों और रूस-चीन के बीच टकराव का बिंदु बन सकता है।