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ईयू-चीन निवेश करार से अमेरिका में मायूसी, बाइडन की योजना को धक्का

Thu, 31 Dec 2020 03:26 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 31 Dec 2020 03:26 PM IST
सार

निवर्तमान डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने चीन के प्रति सख्त रुख अपनाया हुआ था। साथ ही वह एकतरफा ढंग से कदम उठा रहा था। उसने ईयू के साथ भी व्यापार के मामले में कड़ा नजरिया अपनाया था...

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US President Elect Joe Biden disappointed with the EU-China Investment deal
Joe Biden - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

अमेरिकी आपत्तियों को खारिज करते हुए चीन के साथ व्यापक निवेश समझौता कर लेने के यूरोपियन यूनियन (ईयू) के फैसले से अमेरिकी निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन मायूस हैं। बुधवार को इस समझौते पर मुहर लगने के बाद बाइडन टीम ने एक बयान जारी किया। इसमें कहा गया “बाइडेन-हैरिस प्रशासन चीन के अनुचित आर्थिक व्यवहार और अन्य चुनौतियों के मामले में साझा रुख तय करने के लिए ईयू के साथ विचार-विमर्श की उम्मीद कर रहा है।”

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टीम के एक अधिकारी ने कहा कि बाइडन के राष्ट्रपति पद संभालने के बाद ही नया प्रशासन ईयू-चीन समझौते के बारे में और कुछ कहेगा। पिछले हफ्ते बाइडन के मनोनीत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान ने ईयू से कहा था कि वह चीन के साथ समझौता करने के लिए बाइडन प्रशासन के सत्ता में आने तक इंतजार करे।
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लेकिन बुधवार रात एक वीडियो कांफ्रेंस में ईयू और चीन के नेताओं ने समझौते पर मुहर लगा दी। इस कांफ्रेंस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईयू की प्रमुख उरसुला वान डेर लियेन भी शामिल हुईं। ये समझौता अमल में आने के बाद यह उन लगभग दर्जन भर द्विपक्षीय समझौतों की जगह ले लेगा, जो ईयू के सदस्य देशों ने अलग-अलग चीन के साथ किए हुए हैं।
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निवर्तमान डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने चीन के प्रति सख्त रुख अपनाया हुआ था। साथ ही वह एकतरफा ढंग से कदम उठा रहा था। उसने ईयू के साथ भी व्यापार के मामले में कड़ा नजरिया अपनाया था। ट्रंप के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मैथ्यू पॉन्टिंगर ने ईयू और चीन की व्यापार वार्ता की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि ईयू चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों और दूसरे समूहों के मानवाधिकारों के हनन की अनदेखी कर रहा है। ट्रंप प्रशासन ने चीन के अनेक अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंध भी लगा दिए थे।

ईयू और चीन के निवेश समझौते में इस बात का प्रावधान है कि चीन अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और पर्यावरण रक्षा के लक्ष्यों का पालन करेगा। लेकिन पॉन्टिगर ने कहा है कि चीन शिनजियांग में लाखों वर्गफीट इलाके में ऐसी फैक्टरियां बना रहा है, जहां जबरिया मजदूरी कराई जाएगी। ऐसे में यह सोचना कि वह श्रम मानकों का पालन करेगा, एक भोलापन ही है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने स्थानीय मीडिया से कहा कि अमेरिका ईयू से कहेगा कि समझौते में चीन ने जो वायदे किए हैं, उन पर अमल सुनिश्चित कराए।

ईयू-चीन समझौता के अमल में आने में अभी वक्त लगेगा। इसके पहले इस समझौते का यूरोपीय संसद में अनुमोदन जरूरी है। कुछ विश्लेषकों की राय है कि इसमें दिक्कतें आ सकती हैं, क्योंकि ईयू के एक हिस्से में भी चीन के प्रति विरोध का भाव है। फिर भी समझौते का संपन्न होना अमेरिका के लिए एक झटका है। रिस्क कंसल्टेंसी एजेंसी- यूरेशिया ग्रुप के विश्लेषक एमरे पेकर ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा कि बाइडन ने चीन के मामले में ईयू और अमेरिका का गठबंधन बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन इस समझौते से अब इस काम में मुश्किलें पेश आएंगी। ईयू के इस कदम के बाद अमेरिका में बहुत से लोग ये दलील देंगे कि चीन के मामले में अमेरिका का एकतरफा कदम उठाना उचित है।

पेकर ने बताया कि यूरोपियन काउंसिल का कार्यकाल 31 दिसंबर को खत्म होने वाला था। इसलिए इस करार के दोनों प्रमुख पैरोकार- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल ने डील को इसी साल पूरा कर लेने के लिए अतिरिक्त सक्रियता दिखाई। शी ने कुछ अतिरिक्त रियायतें दे दीं और मैर्केल ने आगे बढ़कर हाथ मिला लिया। अमेरिका की पूर्व व्यापार प्रतिनिधि वेंडी कटलर ने कहा है कि इस समझौते से चीन के मामले में अमेरिका और ईयू के सहयोग पर फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन स्थितियां कुछ ज्यादा पेचीदा जरूर हो जाएंगी। अब यूरोपीय संसद से डील को पास कराने के लिए ईयू को इसके बचाव में खड़ा होना होगा। यानी उसे चीन के व्यापार, टेक्नोलॉजी और निवेश के मामलों में अनुचित व्यवहार पर चुप रहना पड़ेगा।


अमेरिका में हारवर्ड यूनिवर्सिटी के केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट के फेलॉ वेनची यू ने राय जताई है कि पर्यावरण और श्रम मानकों पर चीन के वायदों के साथ चीन के बाजार तक पहुंच पाने का समझौता बुरा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि चीन अपने वायदे निभाए, इसे कैसे सुनिश्चित किया जाएगा। अतीत में वह ऐसे वायदे तोड़ता रहा है। दूसरे विश्लेषकों का कहना है कि डील का परिणाम क्या सामने आएगा, यह बाद में जाकर जाहिर होगा। फिलहाल, इससे अमेरिका में निराशा पैदा हुई है। इसे चीन की एक जीत समझा जा सकता है।

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