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US-Iran War: वेंस-रूबियो थे खिलाफ, सिर्फ यह एक मंत्री साथ; फिर क्यों जंग को तैयार हुए ट्रंप, इनसाइड स्टोरी

Thu, 09 Apr 2026 08:41 PM IST
Kirtivardhan Mishra स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 09 Apr 2026 08:41 PM IST
सार

11 फरवरी 2026। सुबह-सुबह एक काली SUV व्हाइट हाउस पहुंची। उसमें बैठे थे बेंजामिन नेतन्याहू। उनकी जेब में था एक ऐसा प्रेजेंटेशन, जो अमेरिका को युद्ध में धकेलने वाला था। सिचुएशन रूम में बैठे ट्रंप ने सुना, मुस्कुराए और कहा- साउंड्स गुड टू मी। उस एक वाक्य ने इतिहास की धारा मोड़ दी। सीआईए ने नेतन्याहू की योजना को हास्यास्पद बताया। रूबियो ने कहा- यह बकवास है। जेडी वेंस और जनरल केन चेताते रहे, लेकिन 26 फरवरी की शाम ट्रंप ने कहा- हमें लगता है हमला करना चाहिए। जानिए पूरी कहानी...

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US Iran War Inside Story Israel PM Benjamin Netanyahu US President Donald Trump Conflict Plan JD Vance Rubio
अमेरिका-ईरान युद्ध की रूपरेखा 11 फरवरी से तय हुई। - फोटो : एआई से निर्मित तस्वीर।

विस्तार

यह सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है। यह वो वाकया है, जिसकी वजह से अमेरिका-इस्राइल ने ईरान पर युद्ध का फैसला किया। व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में वे लोग बैठे थे, जो जानते थे कि यह युद्ध खतरनाक है, फिर भी उनकी बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खुलकर विरोध किया, लेकिन उनके विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया। एक जनरल था, जो हर जोखिम गिनाता रहा, लेकिन सीधे इनकार नहीं कर सके। इस सब के बीच एक प्रधानमंत्री थे, इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू। उन्होंने एक घंटे में ट्रंप को वह यकीन दिला दिया, जो अमेरिका के अपने खुफिया तंत्र ने अब तक उन्हें नहीं दिलाया था। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक आगामी किताब के लिए की गई रिपोर्टिंग पर आधारित एक खबर प्रकाशित की है। यह खबर बताती है कि ईरान पर हमले का फैसला आखिर किस तरह लिया गया। सिलसिलेवार तरीके से जानिए...

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11 फरवरी को व्हाइट हाउस में क्या हुआ?

इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस पहुंचे। वे महीनों से अमेरिका को ईरान पर एक बड़े संयुक्त हमले के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे थे। यह उनके लंबे राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा दांव था। पहले कैबिनेट रूम में बैठक हुई, जो ओवल ऑफिस से सटा है। यहां नेतन्याहू ने ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की वजह से इस्राइल के वजूद को लेकर पैदा हुए खतरे पर ध्यान केंद्रित कराया। जब कमरे में किसी ने ऑपरेशन के संभावित जोखिमों के बारे में पूछा, तो नेतन्याहू ने उन्हें स्वीकार किया, लेकिन उनका केंद्रीय तर्क एक ही था। उनकी नजर में निष्क्रियता के जोखिम, कार्रवाई के जोखिमों से कहीं बड़े हैं। अगर वे देरी करें तो ईरान को अपना मिसाइल उत्पादन बढ़ाने और अपने परमाणु कार्यक्रम के चारों ओर सुरक्षा कवच बनाने का समय मिल जाएगा। उस बैठक में मौजूद सभी जानते थे कि ईरान महंगे अमेरिकी इंटरसेप्टरों की तुलना में कहीं कम लागत और कहीं तेजी से अपने मिसाइल और ड्रोन भंडार बढ़ा सकता है।

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नेतन्याहू सिचुएशन रूम में आए, जहां विदेशी नेताओं के साथ बैठकें बहुत कम होती हैं। ट्रंप अपनी सामान्य जगह पर नहीं बैठे। वे एक तरफ बैठे, दीवार पर लगी बड़ी स्क्रीन की ओर मुंह करके। नेतन्याहू ठीक उनके सामने बैठे। स्क्रीन पर नेतन्याहू के पीछे मोसाद के निदेशक डेविड बार्निया और इस्राइली सैन्य अधिकारी दिख रहे थे। व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ सुजी वाइल्स टेबल के दूर सिरे पर थीं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो अपनी नियमित सीट पर थे। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और ज्वाइंट चीफ्स के चेयरमैन जनरल डैन केन एक तरफ थे। सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ भी उनके साथ थे। एक और व्यक्ति यहां मौजूद थे- ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर। साथ ही विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जो ईरानियों से बातचीत कर रहे थे। 

लीक से बचने के लिए बैठक जानबूझकर बेहद छोटी रखी गई थी। कई शीर्ष नेताओं, मंत्रियों को पता ही नहीं था कि यह बैठक हो रही है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अजरबैजान में थे और इतनी जल्दी वापस नहीं आ सके। नेतन्याहू ने अगले एक घंटे में अपनी प्रेजेंटेशन में चार शर्तें रखीं, जो लगभग निश्चित जीत की ओर इशारा करती थीं। 

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वीडियो में सत्ता के संभावित दावेदारों का जिक्र
इस बैठक में इस्राइलियों ने एक छोटा वीडियो भी दिखाया, जिसमें वे संभावित नेता थे, जो ईरान की सत्ता संभाल सकते थे। इनमें ईरान के आखिरी शाह के निर्वासित बेटे और वॉशिंगटन में रहने वाले रजा पहलवी भी थे, जो खुद को एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में पेश करते रहे हैं। नेतन्याहू ने यह सब एक आत्मविश्वास भरे, शांत लहजे में कहा। यह ट्रंप पर अच्छा असर डालता दिखा। ट्रंप ने प्रधानमंत्री से कहा- यह लग तो अच्छा रहा है। नेतन्याहू के लिए यह हरी झंडी थी। ट्रंप के सलाहकारों को भी लगा कि राष्ट्रपति ने लगभग मन बना लिया है।

नेतन्याहू की योजना की कड़ी समीक्षा कैसे हुई?

12 फरवरी को सिर्फ अमेरिकी अधिकारियों की सिचुएशन रूम बैठक बुलाई गई। ट्रंप के आने से पहले दो वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों ने उनके करीबी सलाहकारों को ब्रीफ किया। ये अधिकारी अमेरिकी सैन्य क्षमताओं में गहरी विशेषज्ञता रखते थे और ईरानी तंत्र को अंदर से जानते थे। उन्होंने नेतन्याहू की प्रेजेंटेशन को चार हिस्सों में तोड़ा था। 

अमेरिकी अधिकारियों का आकलन था कि पहले दो लक्ष्य अमेरिकी खुफिया और सैन्य ताकत से हासिल किए जा सकते हैं। लेकिन तीसरा और चौथा हिस्सा- जिसमें कुर्दों द्वारा ईरान पर जमीनी आक्रमण की संभावना भी शामिल थी, पूरी तरह वास्तविकता से परे था। जब ट्रंप बैठक में पहुंचे तो सीआईए निदेशक रैटक्लिफ ने उन्हें यह आकलन सुनाया। उन्होंने नेतन्याहू की बातों को हास्यास्पद बताया। इस पर रूबियो ने फौरन टोका और कहा- दूसरे शब्दों में कहें तो यह सब एकदम बकवास है। रैटक्लिफ ने कहा कि किसी भी संघर्ष में अप्रत्याशित घटनाओं की वजह से सत्ता परिवर्तन हो सकता है, लेकिन इसे एक हासिल करने योग्य उद्देश्य नहीं माना जाना चाहिए।

कई और लोग बोले, जिनमें अजरबैजान से अभी-अभी लौटे उपराष्ट्रपति वेंस भी शामिल थे। उन्होंने भी ईरान के अंदर सत्ता परिवर्तन की संभावना पर गहरा संदेह जताया। ट्रंप ने जनरल केन की ओर देखा और पूछा- आपको क्या लगता है? जनरल केन ने जवाब दिया, ''सर, मेरे तजुर्बे में यह इस्राइल का आम तरीका है। वे अक्सर बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और उनकी योजनाएं हमेशा पूरी तरह तैयार नहीं होतीं। उन्हें पता है कि उन्हें हमारी जरूरत है, इसलिए वे ज्यादा जोर देकर अपनी मनवाने की कोशिश करते हैं।”



ट्रंप ने जल्दी से आकलन किया, लेकिन उनकी नजरें नेतन्याहू की प्रेजेंटेशन के पहले दो हिस्सों यानी सर्वोच्च नेता के खात्मे और ईरानी सेना को तबाह करने पर टिकी रहीं। तीसरा और चौथा हिस्सा उनके लिए मायने नहीं रखता था।

क्या-क्या चेतावनियां दीं गईं और ट्रंप उन्हें कैसे सुनते थे?

युद्ध को लेकर जनरल केन के मन में गंभीर चिंताएं थीं, लेकिन वे राष्ट्रपति के सामने अपने विचार बेहद सावधानी से रखते थे। उन्होंने ट्रंप और अन्य को बताया कि ईरान के खिलाफ बड़ा अभियान अमेरिकी हथियारों के भंडार, खासतौर पर मिसाइल इंटरसेप्टर को बुरी तरह खाली कर देगा, जो यूक्रेन और इस्राइल को दी जाने वाली मदद की वजह से पहले ही कम थे। उन्हें इन भंडारों को जल्दी भरने का कोई रास्ता नजर नहीं आया। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित रखने की जटिलताओं और ईरान द्वारा उसे बंद करने के जोखिम को भी रेखांकित किया। ट्रंप ने यह मानते हुए इस संभावना को खारिज कर दिया था कि ईरानी शासन उससे पहले झुक जाएगा।

जनरल केन की एक खास आदत थी। वे हर पहलू पर बोलते थे, हर बार पूछते थे कि फिर इसके बाद क्या होगा? इस तरह वे एक साथ सभी पक्षों की दलील देते दिखते थे, जिससे कभी-कभी ऐसा लगता था कि वे एक ही समय में सभी पक्षों की बात कर रहे हैं। एक व्यक्ति जो उनकी बातचीत से परिचित था, उसने नोट किया कि ट्रंप की आदत थी कि वे जनरल केन की रणनीतिक सलाह को सामरिक सलाह समझ लेते थे। अगर जनरल एक सांस में किसी ऑपरेशन के एक पहलू की मुश्किलें बताते और अगली सांस में कहते कि अमेरिका के पास सस्ते बमों की लगभग असीमित आपूर्ति है और वायु श्रेष्ठता हासिल करने के बाद हफ्तों तक ईरान पर हमले जारी रख सकता है, तो जनरल के लिए ये अलग-अलग टिप्पणियां थीं। लेकिन ट्रंप को लगता था कि दूसरी बात पहली को खारिज कर देती है।

जनरल ने कभी सीधे नहीं कहा कि ईरान से युद्ध एक बुरा विचार है। हालांकि उनके कई साथियों को यही लगता था कि जनरल केन की यही राय थी। जनरल केन अपने पूर्ववर्ती जनरल मार्क माइली से बिल्कुल अलग थे, जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में खुलकर बहस करते थे और खतरनाक या लापरवाह कदमों को रोकना अपना काम मानते थे।

वेंस सबसे बड़े विरोधी थे, उनकी दलीलें क्या थीं?

ट्रंप के किसी भी करीबी सलाहकार ने ईरान से युद्ध को लेकर जेडी वेंस से ज्यादा चिंता नहीं जताई और न ही उसे रोकने की ज्यादा कोशिश की। वेंस ने अपना पूरा राजनीतिक करियर ठीक इसी किस्म के सैन्य दुस्साहस का विरोध करते हुए बनाया था। उन्होंने ईरान से युद्ध को संसाधनों की भारी बर्बादी और बेहद महंगा बताया था। हालांकि, वेंस पूरी तरह शांतिवादी नहीं थे। वे चाहते थे सीमित, लेकिन सबक सिखाने वाला हमला हो। जैसे 2017 में सीरिया पर मिसाइल हमला हुआ था।

जब यह तय होता दिखा कि यह अभियान बड़ा होगा, तो उन्होंने तर्क दिया कि इसे पूरी ताकत से अंजाम दिया जाए ताकि लक्ष्य जल्दी हासिल हों। वेंस ने अपने साथियों के सामने साफ कहा कि युद्ध से क्षेत्रीय अराजकता बढ़ सकते हैं। कई जानें जा सकती हैं। यह ट्रंप को राजनीतिक तौर पर कमजोर कर सकता है और यह उन मतदाताओं के साथ धोखा होगा, जिन्होंने कोई नया युद्ध नहीं शुरू करने के वादे पर भरोसा किया था। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका के गोला-बारूद भंडार की समस्या को देखना होगा। कोई भी सैन्य विशेषज्ञता यह नहीं बता सकती कि अस्तित्व के संकट में ईरान क्या करेगा। होर्मुज बंद होने पर अमेरिका में गैसोलीन की कीमतें आसमान छुएंगी। इसके घरेलू परिणाम गंभीर होंगे। युद्ध के बाद शांतिपूर्ण ईरान बनाने की कोई संभावना भी नजर नहीं आती। 

ट्रंप ईरान के बारे में इतने आश्वस्त क्यों थे?

ट्रंप के लिए ईरान उनकी दो प्रेसीडेंसी में सामने आई सभी विदेश नीति चुनौतियों में सबसे अलग था। वे इसे एक विशिष्ट रूप से खतरनाक दुश्मन मानते थे और इसे परमाणु हथियार हासिल करने या युद्ध छेड़ने से रोकने के लिए बड़े जोखिम उठाने को तैयार थे। नेतन्याहू की मांग ट्रंप की उस गहरी इच्छा से मेल खाती थी जो 1979 से ईरानी धर्मतंत्र को खत्म करने की थी। यह 47 साल से अमेरिका के लिए कांटा बना हुआ था। अब वे ऐसे पहले राष्ट्रपति बन सकते थे, जिसने 47 साल बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन किया। अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप का अमेरिकी सेना पर भरोसा और भी बढ़ा था। जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी के बाद ईरान की कमजोर प्रतिक्रिया ने उन्हें उत्साहित किया। 3 जनवरी को वेनेज़ुएला के निकोलस मादुरो को उनके परिसर से पकड़ने वाली शानदार कमांडो छापेमारी ट्रंप के लिए अमेरिकी ताकत का और सबूत था। 
 

बाकियों का रुख क्या था?

पीट हेगसेथ ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के सबसे बड़े समर्थक थे। वहीं, मार्को रूबियो का मानना था कि ईरान किसी समझौते पर राजी नहीं होगा, लेकिन वे चाहते थे कि पूर्ण युद्ध के बजाय अधिकतम दबाव वाला अभियान शुरू किया जाए। हालांकि, उन्होंने ट्रंप को ऑपरेशन से नहीं रोका और युद्ध शुरू होने के बाद उन्होंने पूरे विश्वास के साथ इस फैसले का बचाव भी किया।

सुजी वाइल्स को चिंता थी कि एक नया विदेशी संघर्ष क्या परेशानी ला सकता है, लेकिन वे बड़ी बैठकों में सैन्य मामलों पर कड़ी राय नहीं देती थीं, बल्कि सलाहकारों को अपने विचार राष्ट्रपति के साथ साझा करने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। उन्होंने सहयोगियों से कहा था कि उन्हें डर है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में एक और युद्ध में घसीटा जाएगा। ईरान पर हमले से मिडटर्म चुनाव से महीनों पहले गैस की कीमतें आसमान छू सकती थीं, जो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दो साल को उपलब्धियों के बजाय मुश्किलों में बदल सकती थीं, लेकिन अंत में वाइल्स इस ऑपरेशन के साथ थीं।

कुशनर और विटकॉफ जिनेवा से क्या रिपोर्ट लेकर आए?

उसी हफ्ते जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ ने जिनेवा से ट्रंप को ताजा स्थिति बताई। ओमान और स्विट्जरलैंड में तीन दौर की बातचीत में उन्होंने ईरान की किसी समझौते की इच्छा को परखा था। एक मौके पर उन्होंने ईरान को उसके पूरे कार्यक्रम की अवधि के लिए मुफ्त परमाणु ईंधन का प्रस्ताव दिया। यह प्रस्ताव यह जांचने के लिए था कि क्या तेहरान का यूरेनियम संवर्धन पर जोर वास्तव में नागरिक ऊर्जा के लिए है या बम बनाने की क्षमता बनाए रखने के लिए।

ईरान ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसे अपनी गरिमा पर हमला बताया। कुशनर ने ट्रंप को बताया कि कुछ समझौता शायद हो सकता है, लेकिन महीनों लगेंगे। अगर आप पूछ रहे हैं कि क्या हम आंख में आंख डालकर कह सकते हैं कि हम समस्या सुलझा सकते हैं, तो वहां पहुंचने के लिए बहुत कुछ करना होगा, क्योंकि ईरानी हमसे खेल खेल रहे हैं।

26 फरवरी की अंतिम बैठक में किस ने क्या कहा?

26 फरवरी की शाम करीब 5 बजे अंतिम बैठक शुरू हुई। यह करीब डेढ़ घंटे तक चली। सबकी स्थिति पहले से तय थी। यह पहले की बैठकों का सारांश था। ट्रंप अपनी सामान्य जगह पर बैठे। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट, ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड को बैठक बाहर रखा गया था। ट्रंप ने बारी-बारी सबकी राय मांगी। हेगसेथ और जनरल केन ने हमलों का क्रम समझाया।
  • जेडी वेंस ने कहा, ''जैसा कि आप जानते हैं कि मुझे लगता है यह एक गलत फैसला है, लेकिन अगर आप इसे करना चाहते हैं, तो मैं आपका समर्थन करूंगा।''
  • वाइल्स ने कहा कि अगर आपको अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह जरूरी लगता है, तो आगे बढ़ें।
  • रैटक्लिफ ने कहा कि खामेनेई के परिसर में ईरानी नेतृत्व के इकट्ठा होने की नई खुफिया जानकारी शानदार है। उन्होंने आगे बढ़ने पर कोई राय नहीं दी, लेकिन राष्ट्रपति को बताया कि अगर आप सर्वोच्च नेता को खत्म करना चाहते हैं तो ऐसा संभव है।
  • वॉरिंगटन ने कहा कि अगर इस्राइल किसी भी हाल में आगे बढ़ने वाला है, तो अमेरिका को भी साथ होना चाहिए।
  • ट्रंप की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट ने कहा, "यह आपका फैसला है, प्रेस टीम संभाल लेगी।"
  • हेगसेथ ने कहा कि ईरानियों से निपटना तो था ही, तो अभी क्यों नहीं। 
  • जनरल केन ने जोखिम और गोला-बारूद की कमी सब बताई। कोई राय नहीं दी। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रपति आदेश दें, तो सेना अपना काम करेगी।
  • रूबियो इस बार स्पष्ट थे। उन्होंने कहा, “अगर हमारा मकसद शासन परिवर्तन या किसी तरह का विद्रोह खड़ा करना है, तो हमें यह कदम नहीं उठाना चाहिए। लेकिन अगर लक्ष्य ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को नष्ट करना है, तो यह ऐसा लक्ष्य है जिसे हम हासिल कर सकते हैं।”

इतनी तरह की राय सामने आने के बाद सभी ने फैसला राष्ट्रपति पर छोड़ दिया। ट्रंप ने फिर कहा, मुझे लगता है कि हमें यह करना चाहिए। ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और वह इस्राइल या पूरे क्षेत्र पर मिसाइलें नहीं दाग सकता। 

आगे क्या हुआ?

27 फरवरी की दोपहर ट्रंप एयर फोर्स वन पर थे। जनरल केन की डेडलाइन शाम 4 बजे नजदीक आने वाली थी। डेडलाइन से ठीक 22 मिनट पहले ट्रंप ने आदेश भेजा, "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को मंजूरी दी जाती है। गुड लक।'' उनके इस आदेश में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। कोई शर्त नहीं थी। 'नो अबॉर्ट' यानी एक बार शुरू होने के बाद वापसी नहीं का भाव था। यह वह पल था, जब हफ्तों की बहस, सीआईए की चेतावनियों, वेंस के विरोध के बावजूद सब कुछ एक तरफ हो गया और दुनिया बदल गई।

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