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ईरान से समझौते पर अपने ही खफा: क्या रूबियो और पीट हेगसेथ को ट्रंप पर भरोसा नहीं? जानिए किसे क्या परेशानी
Tue, 16 Jun 2026 11:22 PM IST
राकेश कुमार
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 16 Jun 2026 11:22 PM IST
सार
अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के लिए एक अस्थाई परमाणु समझौता हुआ है। इस समझौते को लेकर खुद ट्रंप सरकार के मंत्री आपस में भिड़ गए हैं। विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को ईरान पर शक है, जबकि उपराष्ट्रपति इसके समर्थन में हैं।
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ट्रंप की बढ़ी मुश्किलें
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अमेरिका और ईरान के बीच एक नया समझौता हुआ है। इस समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टीम में ही भारी विवाद शुरू हो गया है। सरकार के बड़े अधिकारी दो गुटों में बंट गए हैं। सीआईए के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने इस समझौते पर बड़ा शक जताया है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान बाहर से कुछ और और अंदर से कुछ और खेल खेल रहा है। वह बातचीत में जो दावे कर रहा है, उसकी नीयत उससे बिल्कुल अलग है।
किन मंत्रियों को है ईरान पर शक?
इस पूरे मामले में ट्रंप सरकार के दो सबसे शक्तिशाली मंत्री एक तरफ हो गए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो को ईरान पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। उनके साथ देश के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी इस समझौते पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इन दोनों बड़े नेताओं का मानना है कि ईरान अपनी बात से पलट सकता है। खुफिया रिपोर्ट देखने के बाद इन दोनों मंत्रियों की चिंता और ज्यादा बढ़ गई है।
समझौते के पक्ष में कौन-कौन है?
दूसरी तरफ, सरकार के कुछ अन्य बड़े नेता इस समझौते का पूरा समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस डील के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर भी हैं। इन तीनों नेताओं ने 14 सूत्रीय अमेरिकी-ईरान समझौता ज्ञापन पर अपनी मुहर लगाई है। इनका मानना है कि बातचीत से रास्ता निकल सकता है।
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यह भी पढ़ें: ट्रंप पर हमले की एक और साजिश नाकाम: UFC कार्यक्रम पर हमले की थी योजना, एफबीआई ने कई संदिग्धों को किया गिरफ्तार
क्या है 14 सूत्रीय समझौता?
इस नए समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को कम करना है। इसके तहत दोनों देशों के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग होर्मुज को दोबारा खोला जाएगा। इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिनों की नई बातचीत शुरू होगी। इन 60 दिनों के दौरान ईरान अपने परमाणु काम को रोके रखेगा। बदले में, अमेरिका उस पर कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही वहां अपनी सेना बढ़ाएगा।
क्या है इस डील का असली खतरा?
इस बातचीत में ईरान के यूरेनियम भंडार और प्रतिबंधों को हटाने पर चर्चा होनी है। समझौते के समर्थकों का कहना है कि ईरान को पैसा और राहत तभी मिलेगी, जब वह परमाणु कार्यक्रम बंद करेगा। लेकिन विरोध करने वाले अधिकारियों का कहना है कि यह डील ईरान के लिए एक बड़ा फायदा है। अगर ईरान बाद में अंतिम समझौते को मानने से मना भी कर देता है, तो भी इन 60 दिनों में वह अमेरिका से कई बड़ी राहतें पा चुका होगा।
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किन मंत्रियों को है ईरान पर शक?
इस पूरे मामले में ट्रंप सरकार के दो सबसे शक्तिशाली मंत्री एक तरफ हो गए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो को ईरान पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। उनके साथ देश के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी इस समझौते पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इन दोनों बड़े नेताओं का मानना है कि ईरान अपनी बात से पलट सकता है। खुफिया रिपोर्ट देखने के बाद इन दोनों मंत्रियों की चिंता और ज्यादा बढ़ गई है।
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समझौते के पक्ष में कौन-कौन है?
दूसरी तरफ, सरकार के कुछ अन्य बड़े नेता इस समझौते का पूरा समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस डील के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर भी हैं। इन तीनों नेताओं ने 14 सूत्रीय अमेरिकी-ईरान समझौता ज्ञापन पर अपनी मुहर लगाई है। इनका मानना है कि बातचीत से रास्ता निकल सकता है।
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क्या है 14 सूत्रीय समझौता?
इस नए समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को कम करना है। इसके तहत दोनों देशों के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग होर्मुज को दोबारा खोला जाएगा। इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिनों की नई बातचीत शुरू होगी। इन 60 दिनों के दौरान ईरान अपने परमाणु काम को रोके रखेगा। बदले में, अमेरिका उस पर कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही वहां अपनी सेना बढ़ाएगा।
क्या है इस डील का असली खतरा?
इस बातचीत में ईरान के यूरेनियम भंडार और प्रतिबंधों को हटाने पर चर्चा होनी है। समझौते के समर्थकों का कहना है कि ईरान को पैसा और राहत तभी मिलेगी, जब वह परमाणु कार्यक्रम बंद करेगा। लेकिन विरोध करने वाले अधिकारियों का कहना है कि यह डील ईरान के लिए एक बड़ा फायदा है। अगर ईरान बाद में अंतिम समझौते को मानने से मना भी कर देता है, तो भी इन 60 दिनों में वह अमेरिका से कई बड़ी राहतें पा चुका होगा।