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एच-1बी नियमों पर ट्रंप की स्ट्राइक: ₹95 लाख की फीस से 92% गिरे आवेदन, फिर क्यों भड़का भारतीय डायस्पोरा?
Sun, 20 Sep 2026 01:46 AM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, वाशिंगटन।
पीटीआई, वाशिंगटन।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 20 Sep 2026 01:46 AM IST
सार
व्हाइट हाउस द्वारा एच-1बी वीजा नियमों को सख्त करने और 1,00,000 डॉलर के शुल्क को बढ़ाने के बाद भारतीय डायस्पोरा संगठन एफआईआईडीएस ने संतुलित नीति की वकालत की है। संगठन का मानना है कि फर्जीवाड़ा रोकने और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए सख्ती जरूरी है, लेकिन एआई और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में कुशल प्रतिभाओं की कमी को देखते हुए नियमों को बहुत ज्यादा कठोर नहीं बनाया जाना चाहिए। पूर्व सलाहकार अजय भूटोरिया ने भी कहा कि कार्रवाई नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर होनी चाहिए, न कि कानून का पालन करने वाले प्रवासियों पर।
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एच1बी वीजा के तहत अमेरिका प्रवास अवधि बढ़वाने पर 88 लाख शुल्क नहीं देने होंगे (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
विस्तार
अमेरिका में एच-1बी वीजा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस वीजा कार्यक्रम की निगरानी को और ज्यादा कड़ा कर दिया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि कुछ आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों ने इस वीजा का काफी गलत इस्तेमाल किया है, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों के हक पर असर पड़ रहा था। नए नियमों के तहत अब वीजा आवेदनों को मंजूर करने से पहले यह देखा जाएगा कि क्या कंपनी ने हाल ही में वैसी ही योग्यता वाले किसी अमेरिकी कर्मचारी को नौकरी से निकाला है या निकालने की योजना बनाई है। इसके साथ ही एक बड़े फैसले के तहत आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों पर लगाया गया 1,00,000 डॉलर (करीब 95 लाख रुपये) का भारी शुल्क नियम एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है। प्रशासन का दावा है कि इस सख्ती के बाद बड़ी आईटी कंपनियों के एच-1बी रजिस्ट्रेशन में 92 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
अमेरिका के इस कड़े कदम पर भारतीय समुदाय का क्या रुख?
अमेरिका के इस रुख पर 'फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज' (एफआईआईडीएस) ने प्रतिक्रिया दी है। संस्था ने वीजा नियमों की सख्त जांच का स्वागत तो किया है, लेकिन साथ ही एक बड़ी चेतावनी भी दी है। एफआईआईडीएस के नीति और रणनीति प्रमुख खांडेराव कांद का कहना है कि फर्जीवाड़े को रोकना और स्थानीय कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना एक जायज कदम है, लेकिन यह सख्ती अमेरिकी इनोवेशन की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने साफ किया कि अत्यधिक कुशल नौकरियों को हमेशा तुरंत अमेरिकी श्रम बाजार से नहीं भरा जा सकता। संस्था ने सरकार से मांग की है कि कंपनियों की कुल संख्या या वीजा उपयोग के आधार पर बिना सोचे-समझे कार्रवाई करने के बजाय केवल गड़बड़ी करने वाले तत्वों पर ही सबूत के आधार पर कार्रवाई की जाए।
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विशेषज्ञ और पूर्व सरकारी सलाहकार इस पूरे मामले पर क्या राय रख रहे?
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के सलाहकार रहे अजय भूटोरिया ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय खुलकर सामने रखी है। उनके मुताबिक, सरकार को उन कानून का पालन करने वाले और कुशल प्रवासियों को निशाना नहीं बनाना चाहिए जो ईमानदारी से टैक्स देते हैं और अमेरिका के विकास में योगदान देते हैं। असली सुधार का मतलब यह है कि उन बड़ी कंपनियों और बॉडी शॉप्स (स्टाफिंग फर्मों) की जवाबदेही तय की जाए जो कम वेतन पर काम कराने या स्थानीय कर्मचारियों को निकालने के लिए वीजा नियमों का बेजा फायदा उठाती हैं। प्रणाली को सुरक्षित बनाने का मतलब प्रवासियों को दोष देना नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट लालच पर लगाम लगाना और सभी के लिए निष्पक्ष माहौल बनाना है।
यह भी पढ़ें: 'ट्रंप की नीति गलत': क्यूबा ने अमेरिका की टैरिफ नीति का किया विरोध, कहा- भारत के साथ दोस्ती बरकरार
एच-1बी वीजा विवाद से जुड़ी अहम बातें क्या?
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अमेरिका के इस कड़े कदम पर भारतीय समुदाय का क्या रुख?
अमेरिका के इस रुख पर 'फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज' (एफआईआईडीएस) ने प्रतिक्रिया दी है। संस्था ने वीजा नियमों की सख्त जांच का स्वागत तो किया है, लेकिन साथ ही एक बड़ी चेतावनी भी दी है। एफआईआईडीएस के नीति और रणनीति प्रमुख खांडेराव कांद का कहना है कि फर्जीवाड़े को रोकना और स्थानीय कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना एक जायज कदम है, लेकिन यह सख्ती अमेरिकी इनोवेशन की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
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उन्होंने साफ किया कि अत्यधिक कुशल नौकरियों को हमेशा तुरंत अमेरिकी श्रम बाजार से नहीं भरा जा सकता। संस्था ने सरकार से मांग की है कि कंपनियों की कुल संख्या या वीजा उपयोग के आधार पर बिना सोचे-समझे कार्रवाई करने के बजाय केवल गड़बड़ी करने वाले तत्वों पर ही सबूत के आधार पर कार्रवाई की जाए।
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विशेषज्ञ और पूर्व सरकारी सलाहकार इस पूरे मामले पर क्या राय रख रहे?
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के सलाहकार रहे अजय भूटोरिया ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय खुलकर सामने रखी है। उनके मुताबिक, सरकार को उन कानून का पालन करने वाले और कुशल प्रवासियों को निशाना नहीं बनाना चाहिए जो ईमानदारी से टैक्स देते हैं और अमेरिका के विकास में योगदान देते हैं। असली सुधार का मतलब यह है कि उन बड़ी कंपनियों और बॉडी शॉप्स (स्टाफिंग फर्मों) की जवाबदेही तय की जाए जो कम वेतन पर काम कराने या स्थानीय कर्मचारियों को निकालने के लिए वीजा नियमों का बेजा फायदा उठाती हैं। प्रणाली को सुरक्षित बनाने का मतलब प्रवासियों को दोष देना नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट लालच पर लगाम लगाना और सभी के लिए निष्पक्ष माहौल बनाना है।
यह भी पढ़ें: 'ट्रंप की नीति गलत': क्यूबा ने अमेरिका की टैरिफ नीति का किया विरोध, कहा- भारत के साथ दोस्ती बरकरार
एच-1बी वीजा विवाद से जुड़ी अहम बातें क्या?
- वैश्विक प्रतिभा का योगदान: अमेरिका अपनी जिस तकनीकी और नवाचार क्षमता के लिए जाना जाता है, उसमें दुनिया भर से आए असाधारण हुनर का सबसे बड़ा हाथ रहा है।
- तकनीकी क्षेत्रों में स्किल्स गैप: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , साइबर सुरक्षा, एडवांस्ड सेमीकंडक्टर, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में अमेरिका के भीतर तुरंत योग्य कर्मचारी मिलना बेहद मुश्किल है।
- आउटसोर्सिंग कंपनियों पर लगाम: प्रशासन का मुख्य ध्यान उन आईटी कंपनियों पर है जो कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को लाकर अमेरिकी बाजार की मजदूरी दरों को प्रभावित करती हैं।
- 1,00,000 डॉलर का भारी शुल्क जारी: बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों के आवेदनों को हतोत्साहित करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने 1,00,000 डॉलर के अतिरिक्त शुल्क वाले नियम को एक और साल के लिए आगे बढ़ा दिया है।
- अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी पर नजर: नए वीजा आवेदन की समीक्षा करते समय अमेरिकी एजेंसियां अब यह ध्यान रखेंगी कि संबंधित कंपनी ने हाल-फिलहाल में किसी अमेरिकी कर्मचारी को नौकरी से तो नहीं निकाला है।
- भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर: एच-1बी वीजा का सबसे बड़ा लाभ उठाने वालों में भारतीय पेशेवर और आईटी विशेषज्ञ हमेशा से सबसे आगे रहे हैं, इसलिए यह फैसला सीधे भारत को प्रभावित करता है।
- पारदर्शी और मेरिट-बेस्ड सिस्टम की मांग: एफआईआईडीएस ने मांग की है कि प्रवासियों और अमेरिकी कर्मचारियों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय कड़ी धोखाधड़ी-रोधी जांच, वेतन सुरक्षा और अमेरिका में ही शिक्षा व री-स्किलिंग पर निवेश को बढ़ावा दिया जाए।