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US: जिस FBI के निदेशक बने काश पटेल, क्यों ट्रंप के निशाने पर रही है वह एजेंसी; क्या हैं पुराने विवाद? जानें
Fri, 21 Feb 2025 07:56 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 21 Feb 2025 07:56 PM IST
सार
एफबीआई आखिर क्या है? इस एजेंसी का कैसा इतिहास रहा है? किन-किन नेताओं और हस्तियों के खिलाफ एजेंसी पर एजेंडा चलाने के आरोप लगे हैं? डोनाल्ड ट्रंप के मामले से एजेंसी किस तरह जुड़ी रही है? आइये जानते हैं...
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फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका की घरेलू खुफिया एजेंसी- फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन इस वक्त पूरी दुनिया में चर्चा में है। वजह है इसके नए निदेशक का एलान। भारतीय मूल के काश पटेल को एफबीआई के नए निदेशक के तौर पर नियुक्ति मिलने के बाद जहां ट्रंप प्रशासन काफी खुश है, वहीं एजेंसी से जुड़े कई अधिकारियों और डेमोक्रेट नेताओें ने इसे चिंता का विषय बताया है। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के एलान के बाद से ही काश पटेल एफबीआई को लेकर हमलावर रहे। उन्होंने 2024 में ही कई मौकों पर दावा किया था कि एफबीआई स्वतंत्र तौर पर काम नहीं करती और एजेंसी की कार्यशैली को अब पूरी तरह बदलने की जरूरत है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि एफबीआई आखिर क्या है? इस एजेंसी का कैसा इतिहास रहा है? किन-किन नेताओं और हस्तियों के खिलाफ एजेंसी पर एजेंडा चलाने के आरोप लगे हैं? डोनाल्ड ट्रंप के मामले से एजेंसी किस तरह जुड़ी रही है? आइये जानते हैं...
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ऐसे में यह जानना अहम है कि एफबीआई आखिर क्या है? इस एजेंसी का कैसा इतिहास रहा है? किन-किन नेताओं और हस्तियों के खिलाफ एजेंसी पर एजेंडा चलाने के आरोप लगे हैं? डोनाल्ड ट्रंप के मामले से एजेंसी किस तरह जुड़ी रही है? आइये जानते हैं...
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क्या है फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन?
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) अमेरिका की घरेलू खुफिया और सुरक्षा एजेंसी है। यह देश की प्रमुख संघीय प्रवर्तन एजेंसी है। यह एजेंसी अमेरिकी खुफिया समुदाय का हिस्सा है और यह अपने अभियानों के लिए अमेरिकी अटॉर्नी जनरल (मौजूदा समय में पैम बोंडी) और राष्ट्रीय खुफिया विभाग की निदेशक (अभी तुलसी गबार्ड) को रिपोर्ट करती है। एफबीआई संघीय स्तर पर आपराधिक मामलों की जांच के साथ-साथ आतंकरोधी अभियानों में भी शामिल रहती है। एजेंसी 200 तरह के अलग-अलग वर्गों में अपराध की जांच करती है।
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) अमेरिका की घरेलू खुफिया और सुरक्षा एजेंसी है। यह देश की प्रमुख संघीय प्रवर्तन एजेंसी है। यह एजेंसी अमेरिकी खुफिया समुदाय का हिस्सा है और यह अपने अभियानों के लिए अमेरिकी अटॉर्नी जनरल (मौजूदा समय में पैम बोंडी) और राष्ट्रीय खुफिया विभाग की निदेशक (अभी तुलसी गबार्ड) को रिपोर्ट करती है। एफबीआई संघीय स्तर पर आपराधिक मामलों की जांच के साथ-साथ आतंकरोधी अभियानों में भी शामिल रहती है। एजेंसी 200 तरह के अलग-अलग वर्गों में अपराध की जांच करती है।
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क्या है इस एजेंसी का इतिहास?
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है। हालांकि, इससे पहले अमेरिका के इतिहास पर बात करना जरूरी है। दरअसल, इस देश का इतिहास 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। यह देश मुख्यतः राज्यों के गठन से बना है, जो अपने आप में स्वतंत्र इकाई है। यानी संघीय ढांचे के तहत अमेरिका में कुछ मामलों पर वहां की संघीय सरकार का नेतृत्व काम करता है, जबकि अधिकतर मामलों में वहां के राज्य अपने फैसले के लिए स्वतंत्र हैं। फिर चाहे आर्थिक मुद्दों का मामला हो या कानूनी स्वतंत्रता का। हालांकि, अमेरिका का यह संघीय ढांचा कुछ हद तक उसके खुद के लिए परेशानी का सबब बन रहा था। मसलन अपराध से जुड़े मामलों में यह आंतरिक स्वतंत्रता मुश्किलें पैदा कर रही थी।
अमेरिका में हर राज्य की अपनी अलग पुलिस सेवा है, जिसका अधिकार अपने राज्य में सर्वोपरि माना जाता है और यह पुलिस सेवा देश (संघीय स्तर पर) में चुनी गई सरकार के दखल से स्वतंत्र थी। ऐसे में कई बार अलग-अलग राज्यों में अपराध करने वाले अपराधियों को सजा दिलाने में मुश्किल आती थी। अपराधी भी इसका फायदा उठाते थे और एक राज्य में अपराध को अंजाम देने के बाद दूसरे राज्य में खुलेआम घूमा करते थे। राज्यों की एक-दूसरे मामले में दखल देने की सीमित क्षमता के कारण अपराधियों पर कार्रवाई एक मुश्किल कार्य बन गया।
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है। हालांकि, इससे पहले अमेरिका के इतिहास पर बात करना जरूरी है। दरअसल, इस देश का इतिहास 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। यह देश मुख्यतः राज्यों के गठन से बना है, जो अपने आप में स्वतंत्र इकाई है। यानी संघीय ढांचे के तहत अमेरिका में कुछ मामलों पर वहां की संघीय सरकार का नेतृत्व काम करता है, जबकि अधिकतर मामलों में वहां के राज्य अपने फैसले के लिए स्वतंत्र हैं। फिर चाहे आर्थिक मुद्दों का मामला हो या कानूनी स्वतंत्रता का। हालांकि, अमेरिका का यह संघीय ढांचा कुछ हद तक उसके खुद के लिए परेशानी का सबब बन रहा था। मसलन अपराध से जुड़े मामलों में यह आंतरिक स्वतंत्रता मुश्किलें पैदा कर रही थी।
अमेरिका में हर राज्य की अपनी अलग पुलिस सेवा है, जिसका अधिकार अपने राज्य में सर्वोपरि माना जाता है और यह पुलिस सेवा देश (संघीय स्तर पर) में चुनी गई सरकार के दखल से स्वतंत्र थी। ऐसे में कई बार अलग-अलग राज्यों में अपराध करने वाले अपराधियों को सजा दिलाने में मुश्किल आती थी। अपराधी भी इसका फायदा उठाते थे और एक राज्य में अपराध को अंजाम देने के बाद दूसरे राज्य में खुलेआम घूमा करते थे। राज्यों की एक-दूसरे मामले में दखल देने की सीमित क्षमता के कारण अपराधियों पर कार्रवाई एक मुश्किल कार्य बन गया।
दशक आया 1900 का। अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजावेल्ट को एक ऐसी सुरक्षा एजेंसी की जरूरत महसूस हुई, जिसके पास संघीय स्तर पर शक्तियां हों और वह अलग-अलग राज्यों में अपराधियों पर कार्रवाई कर सके। 1908 में रूजावेल्ट ने अमेरिका के तत्कालीन अटॉर्नी जनरल चार्ल्स जे. बोनापार्ट (फ्रांसीसी जनरल नेपोलियन बोनापार्ट के भाई के बेटे) के सामने एक ऐसी एजेंसी बनाने का प्रस्ताव रखा, जो संघीय स्तर पर अपराधियों पर कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हो। इसके लिए रूजावेल्ट ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया।
एफबीआई के इतिहास का सबसे अहम समय रहा एडगर जे. हूवर का इस एजेंसी के प्रमुख रहने का दौर। 1924 में हूवर इस ब्यूरो के निदेशक पद पर काबिज हुए। वह 48 साल यानी 1972 तक एफबीआई के निदेशक रहे। उनके दौर में ही एफबीआई ने अलग-अलग राज्यों में अपनी पहुंच को मजबूत किया और कई बड़े अपराधियों को मार गिराया। एफबीआई उस दौर में अलग-अलग राज्यों में टॉप-10 भगोड़े अपराधियों की लिस्ट जारी करती थी और उनकी जानकारी जुटाकर अभियानों के तहते उन्हें पकड़ती थी।
हूवर के दौर में ही एफबीआई ने जांच के अलग-अलग तरीकों को अपनाया। हैंडराइटिंग, फिंगरप्रिंट्स, बंदूकों-हथियारों के जरिए अपराधियों की पहचान का तरीका अमेरिका में उनके नेतृत्व में ही लाया गया। अपराधियों को पकड़ने के इन तरीकों को अपनाने के लिए उन्होंने वर्जीनिया के क्वांटिको में एक आधुनिक फॉरेंसिक लैब की नींव भी रखी। यह लैब अपराधियों का एक केंद्रीकृत डाटा रखती है।
हूवर के दौर में ही एफबीआई ने जांच के अलग-अलग तरीकों को अपनाया। हैंडराइटिंग, फिंगरप्रिंट्स, बंदूकों-हथियारों के जरिए अपराधियों की पहचान का तरीका अमेरिका में उनके नेतृत्व में ही लाया गया। अपराधियों को पकड़ने के इन तरीकों को अपनाने के लिए उन्होंने वर्जीनिया के क्वांटिको में एक आधुनिक फॉरेंसिक लैब की नींव भी रखी। यह लैब अपराधियों का एक केंद्रीकृत डाटा रखती है।
क्या-क्या रही हैं इस एजेंसी की उपलब्धियां?
- अमेरिका में एफबीआई की भूमिका सिर्फ घरेलू अपराधों को कम करने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस एजेंसी ने सेना छोड़कर भागने वालों को पकड़ने और अमेरिका में आए जासूसों को पकड़ने और उनसे अहम जानकारी निकलवाने की जिम्मेदारी भी निभाई।
- विश्व युद्ध के बाद एफबीआई ने अमेरिका में वाम गतिविधियों की निगरानी शुरू की। 1950-60 के दौर में ब्यूरो ने ऐसे समूहों को निशाना बनाया, जिन्हें अमेरिका के लिए नुकसानदेह करार दिया जाता था।
- 1960 से 1990 के दौर में एफबीआई की कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ता रहा। एजेंसी ने नस्लभेदी अपराधों से लेकर साइबरक्राइम तक के क्षेत्र में कार्रवाई शुरू कर दी थीं। इतना ही नहीं एजेंसी ने एक नेशनल क्राइम इन्फॉर्मेशन सेंटर की भी स्थापना कर दी, जो कि अपराधियों के बारे में स्थानीय पुलिस, राज्य पुलिस और अन्य संघीय एजेंसियों की मदद करता है।
- इतना ही नहीं राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की हत्या के मामले में भी जांच को स्थानीय पुलिस से लेकर एफबीआई को दे दिया गया। एजेंसी की कार्यशैली और मामले में खुलासों के बाद यह फैसला किया गया कि बड़ी हस्तियों की हत्या का मामला एफबीआई के कार्यक्षेत्र में रहेगा।
117 साल के इतिहास में क्या रही हैं एफबीआई की उपलब्धियां
1. आतंकरोधी अभियानों में सफलता
2001: 9/11 हमलों के बाद बदला एजेंसी का स्वरूप
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने 9/11 हमलों के बाद आतंकवाद पर कड़ी कार्रवाई शुरू की और सीआईए-एनएसए जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर अमेरिका के अंदर आतंकरोधी अभियानों को अंजाम दिया। 2001 में 9/11 हमलों के बाद, एफबीआई ने आतंकवाद विरोधी अभियानों को अपनी प्राथमिकता बना लिया। एफबीआई ने अल-कायदा और अन्य आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कई सफल ऑपरेशन किए। इसके अलावा एजेंसी ने टेररिस्ट स्क्रीनिंग सेंटर और ज्वाइंट टेररिज्म टास्क फोर्स (JTTF) स्थापित किए।
2013: बॉस्टन मैराथन बम विस्फोट
एफबीआई ने त्सरनेव ब्रदर्स को ट्रैक कर बॉस्टन बम विस्फोट के दोषियों को पकड़ा। हाई-टेक फोरेंसिक और सीसीटीवी विश्लेषण से अपराधियों की पहचान की गई।
1. आतंकरोधी अभियानों में सफलता
2001: 9/11 हमलों के बाद बदला एजेंसी का स्वरूप
फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने 9/11 हमलों के बाद आतंकवाद पर कड़ी कार्रवाई शुरू की और सीआईए-एनएसए जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर अमेरिका के अंदर आतंकरोधी अभियानों को अंजाम दिया। 2001 में 9/11 हमलों के बाद, एफबीआई ने आतंकवाद विरोधी अभियानों को अपनी प्राथमिकता बना लिया। एफबीआई ने अल-कायदा और अन्य आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कई सफल ऑपरेशन किए। इसके अलावा एजेंसी ने टेररिस्ट स्क्रीनिंग सेंटर और ज्वाइंट टेररिज्म टास्क फोर्स (JTTF) स्थापित किए।
2013: बॉस्टन मैराथन बम विस्फोट
एफबीआई ने त्सरनेव ब्रदर्स को ट्रैक कर बॉस्टन बम विस्फोट के दोषियों को पकड़ा। हाई-टेक फोरेंसिक और सीसीटीवी विश्लेषण से अपराधियों की पहचान की गई।
साइबर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा
1931 में एफबीआई ने कुख्यात गैंगस्टर अल-कैपोन को कर चोरी के आरोप में गिरफ्तार करवाया। इसके अलावा एजेंसी ने ड्रग एन्फोर्समेंट एजेंसी (डीईए) के साथ मिलकर पाब्लो एस्कोबार और अन्य ड्रग माफियाओं के नेटवर्क को तोड़ा। अमेरिका में ड्रग्स की तस्करी को रोकने के लिए वार ऑन ड्रग्स अभियान में बड़ी भूमिका निभाई।
- एफबीआई ने एनोनिमस और डार्कसाइड जैसे हैकर समूहों पर कार्रवाई की। रैंसमवेयर और साइबर हमलों पर रोक में अहम भूमिका।
- 2021 में कोलोनियल पाइपलाइन साइबर अटैक के हमलावरों को पकड़ने में मदद की।
- रूस और चीन की जासूसी पर रोकथाम। कई विदेशी जासूसों को पकड़ा और अमेरिका की खुफिया जानकारी चोरी होने से बचाई।
1931 में एफबीआई ने कुख्यात गैंगस्टर अल-कैपोन को कर चोरी के आरोप में गिरफ्तार करवाया। इसके अलावा एजेंसी ने ड्रग एन्फोर्समेंट एजेंसी (डीईए) के साथ मिलकर पाब्लो एस्कोबार और अन्य ड्रग माफियाओं के नेटवर्क को तोड़ा। अमेरिका में ड्रग्स की तस्करी को रोकने के लिए वार ऑन ड्रग्स अभियान में बड़ी भूमिका निभाई।
आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ
किन बड़े विवादों में घिरी है एजेंसी?
एफबीआई के साथ कई उपलब्धियां जुड़ी रही हैं, हालांकि इसके कामकाज से जुड़े विवादों ने एजेंसी को ट्रंप प्रशासन की नजर में ला दिया। दरअसल, एफबीआई पर मानवाधिकार उल्लंघन, राजनीतिक दखल, खुफिया निगरानी और गलत तरीके से की गई जांच को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप और एफबीआई निदेशक पद के लिए चुने गए काश पटेल भी ऐसे ही कुछ आरोपों के चलते एजेंसी की आलोचना करते रहे हैं। दोनों ही नेता एफबीआई के डीप स्टेट से संचालित होने के आरोप लगाते रहे हैं और एजेंसी के ढांचे में बड़े बदलाव करने के पैरोकार रहे हैं।
1. नागरिक अधिकारों से जुड़े लोगों की जासूसी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब एफबीआई ने वाम गतिविधियों की निगरानी शुरू की तो शुरुआत में उसका निशाना ऐसे लोग थे, जिनका आपराधिक इतिहास था। हालांकि, धीरे-धीरे एजेंसी ने राजनीतिक कारणों से कई लोकप्रिय और अहम चेहरों की निगरानी शुरू कर दी।
इनमें मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मैल्कम एक्स, ब्लैक पैंथर पार्टी और अन्य नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की गुप्त निगरानी से जुड़े मामले शामिल रहे थे। 1991 में एक पत्रकार ने खुलासा किया था कि एफबीआई ने एक बार मार्टिन लूथर किंग जूनियर को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली चिट्ठी भी लिखी थी।
एफबीआई का यह निगरानी अभियान कॉइनटेलप्रो (COINTELPRO) के नाम से जाना गया। एजेंसी ने इसके तहत 1956 से 1971 तक नागरिक अधिकारों से जुड़े लोगों की निगरानी की। विवादों के बाद कॉइनटेलप्रो को 1971में बंद कर दिया गया।
एफबीआई के साथ कई उपलब्धियां जुड़ी रही हैं, हालांकि इसके कामकाज से जुड़े विवादों ने एजेंसी को ट्रंप प्रशासन की नजर में ला दिया। दरअसल, एफबीआई पर मानवाधिकार उल्लंघन, राजनीतिक दखल, खुफिया निगरानी और गलत तरीके से की गई जांच को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप और एफबीआई निदेशक पद के लिए चुने गए काश पटेल भी ऐसे ही कुछ आरोपों के चलते एजेंसी की आलोचना करते रहे हैं। दोनों ही नेता एफबीआई के डीप स्टेट से संचालित होने के आरोप लगाते रहे हैं और एजेंसी के ढांचे में बड़े बदलाव करने के पैरोकार रहे हैं।
1. नागरिक अधिकारों से जुड़े लोगों की जासूसी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब एफबीआई ने वाम गतिविधियों की निगरानी शुरू की तो शुरुआत में उसका निशाना ऐसे लोग थे, जिनका आपराधिक इतिहास था। हालांकि, धीरे-धीरे एजेंसी ने राजनीतिक कारणों से कई लोकप्रिय और अहम चेहरों की निगरानी शुरू कर दी।
इनमें मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मैल्कम एक्स, ब्लैक पैंथर पार्टी और अन्य नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की गुप्त निगरानी से जुड़े मामले शामिल रहे थे। 1991 में एक पत्रकार ने खुलासा किया था कि एफबीआई ने एक बार मार्टिन लूथर किंग जूनियर को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली चिट्ठी भी लिखी थी।
एफबीआई का यह निगरानी अभियान कॉइनटेलप्रो (COINTELPRO) के नाम से जाना गया। एजेंसी ने इसके तहत 1956 से 1971 तक नागरिक अधिकारों से जुड़े लोगों की निगरानी की। विवादों के बाद कॉइनटेलप्रो को 1971में बंद कर दिया गया।
2. जॉन एफ. कैनेडी के खिलाफ भी कथित तौर पर चलाए अभियान
एफबीआई के निदेशक हूवर पर कथित तौर पर कई अहम राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ झूठे सबूत इकट्ठा करने और उनके जरिए धमकाने के भी आरोप लगे। एडगर हूवर पर जिन लोगों के खिलाफ मुश्किलें खड़ी करने के आरोप लगे उनमें जॉन एफ. कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे बड़े नाम तक शामिल रहे।
3. ट्रंप के खिलाफ रूस कनेक्शन को लेकर जांच
कुछ इसी तरह के आरोप एफबीआई पर 2016 में भी लगे, जब एजेंसी ने अमेरिकी चुनाव में रूस के दखल को लेकर जांच शुरू की। इस दौरान कई धड़ों में यह खबर फैली की डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे रूस का हाथ है। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी ने इन आरोपों की कड़ी निंदा की। यही वह मौका था, जब डोनाल्ड ट्रंप ने एफबीआई में 'डीप स्टेट' की मौजूदगी का आरोप लगाते हुए एजेंसी पर खुलेआम राजनीतिक दखल देने का आरोप लगाया।
2024 को हुए चुनावों से पहले ट्रंप ने एफबीआई पर जुबानी हमले जारी रखे। उन्होंने एजेंसी के आधारभूत ढांचे में बदलाव का वादा किया और इसी के तहत ट्रंप ने एफबीआई के अगले निदेश के तौर पर काश पटेल की नियुक्ति कर दी। गुरुवार को अमेरिकी सीनेट ने पटेल की नियुक्ति पर मुहर लगा दी।
एफबीआई के निदेशक हूवर पर कथित तौर पर कई अहम राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ झूठे सबूत इकट्ठा करने और उनके जरिए धमकाने के भी आरोप लगे। एडगर हूवर पर जिन लोगों के खिलाफ मुश्किलें खड़ी करने के आरोप लगे उनमें जॉन एफ. कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे बड़े नाम तक शामिल रहे।
3. ट्रंप के खिलाफ रूस कनेक्शन को लेकर जांच
कुछ इसी तरह के आरोप एफबीआई पर 2016 में भी लगे, जब एजेंसी ने अमेरिकी चुनाव में रूस के दखल को लेकर जांच शुरू की। इस दौरान कई धड़ों में यह खबर फैली की डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे रूस का हाथ है। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी ने इन आरोपों की कड़ी निंदा की। यही वह मौका था, जब डोनाल्ड ट्रंप ने एफबीआई में 'डीप स्टेट' की मौजूदगी का आरोप लगाते हुए एजेंसी पर खुलेआम राजनीतिक दखल देने का आरोप लगाया।
2024 को हुए चुनावों से पहले ट्रंप ने एफबीआई पर जुबानी हमले जारी रखे। उन्होंने एजेंसी के आधारभूत ढांचे में बदलाव का वादा किया और इसी के तहत ट्रंप ने एफबीआई के अगले निदेश के तौर पर काश पटेल की नियुक्ति कर दी। गुरुवार को अमेरिकी सीनेट ने पटेल की नियुक्ति पर मुहर लगा दी।
4. नस्लीय भेदभाव और गलत लोगों को फंसाने के आरोप
- फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन पर 9/11 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका में रह रहे मुस्लिम समुदाय के लोगों को बिना सबूत में हिरासत में रखने और उनका उत्पीड़न करने से जुड़े आरोप लगे। इतना ही नहीं कुछ और मौकों पर अमेरिका में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदाय एजेंसी पर निशाना बनाने के आरोप लगा चुके हैं।
- इसके अलावा एजेंसी पर 1996 के अटलांटा बम धमाकों के बाद जांच में खानापूर्ति करने का भी आरोप है। इस मामले में एफबीआई ने रिचर्ड ज्वेल नाम के एक व्यक्ति को संदिग्ध करार दे दिया था। एजेंसी पर आरोप लगा कि उसने मीडिया में ज्वेल की छवि खराब करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, बाद में जब एफबीआई पर दबाव बढ़ा तो जांच का दायरा बढ़ाया गया। इसमें सामने आया कि मामले में असल अपराधी एरिक रूडोल्फ था।
5. निगरानी और जासूसी कार्यक्रम से जुड़े आरोप
- एफबीआई पर अवैध तरीके से लोगों की निजी जानकारी जुटाने का आरोप भी लग चुका है। 2016 में इसी कड़ी में एजेंसी का स्मार्टफोन निर्माता कंपनी एपल से विवाद हुआ था। यह मामला अदालत तक पहुंचा था। दरअसल, एफबीआई ने तब आतंक से जुड़े एक मामले में अपराधी का फोन अनलॉक करने के लिए एपल पर दबाव बनाया। हालांकि, फोन निर्माता कंपनी ने इससे इनकार कर दिया। हालांकि, एफबीआई ने बाद में इस फोन को निजी फर्म की मदद से अनलॉक कर दिया।
- एफबीआई पर अवैध तरीके से लोगों की निजी जानकारी जुटाने का आरोप भी लग चुका है। 2016 में इसी कड़ी में एजेंसी का स्मार्टफोन निर्माता कंपनी एपल से विवाद हुआ था। यह मामला अदालत तक पहुंचा था। दरअसल, एफबीआई ने तब आतंक से जुड़े एक मामले में अपराधी का फोन अनलॉक करने के लिए एपल पर दबाव बनाया। हालांकि, फोन निर्माता कंपनी ने इससे इनकार कर दिया। हालांकि, एफबीआई ने बाद में इस फोन को निजी फर्म की मदद से अनलॉक कर दिया।