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वार्ता फोरम से क्या हासिल करना चाहते हैं अमेरिका और यूरोपियन यूनियन?

Thu, 25 Mar 2021 03:49 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 25 Mar 2021 03:49 PM IST
सार

फोरम के गठन का एलान अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन की ब्रसेल्स यात्रा के दौरान हुआ है। ब्रसेल्स में ब्लिंकेन और ईयू के विदेश नीति संबंधी प्रमुख जोसेफ बॉरेल ने एक साझा प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया...

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US and European Union have announced the launch of a Common Dialogue Forum to determine a common intention to China
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन - फोटो : Agency

विस्तार

अमेरिका और यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने चीन के मामले में साझा रुख तय करने के लिए साझा वार्ता फोरम लॉन्च करने का एलान किया है। इस बारे में बनी सहमति को फिलहाल जो बाइडन प्रशासन की एक अहम कूटनीतिक कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसका क्या असर होगा, इसे लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं।

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फोरम के गठन का एलान अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन की ब्रसेल्स यात्रा के दौरान हुआ है। ब्रसेल्स में ब्लिंकेन और ईयू के विदेश नीति संबंधी प्रमुख जोसेफ बॉरेल ने एक साझा प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया। बॉरेल ने कहा- हमारे बीच ईयू-अमेरिका वार्ता शुरू करने पर सहमति बनी है कि ताकि हम मौजूद चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा कर सकें। गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच वार्ता फोरम शुरू करने की योजना अक्टूबर 2020 में बनी थी। लेकिन तब अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव के दौर में था। इसलिए इसे तब टाल दिया गया था।
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बॉरेल ने कहा कि एक पार्टनर, प्रतिद्वंद्वी और विरोधी के रूप में चीन की भूमिका के बारे में दोनों पक्षों में सहमति बनी है। ये फोरम चीन के मामले में बातचीत को आगे बढ़ाने और यूरोपीय सुरक्षा पहल के बारे में चर्चा करने का उचित मंच होगा। ब्लिंकेन ने कहा कि चीन नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर रहा है। उसका मुकाबला करने की जरूरत है।
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सामने आई जानकारी के मुताबिक ब्लिंकेन और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत में चीन का मुकाबला करने के लिए जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ भागीदारी को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इस दौरान राय जताई गई कि ये नई भागीदारी नाटो की तर्ज पर बननी चाहिए।

लेकिन ऐसा कोई सैनिक गठजोड़ बना पाएगा, इसे लेकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक है। दक्षिण कोरिया ने फिलहाल अमेरिकी योजना में शामिल होने की इच्छा नहीं दिखाई है। जापान भी एक हद के बाद चीन को नाराज करने को तैयार नहीं दिखता है। लेकिन पर्यवेक्षकों ने इस बात पर गौर किया है, जो बाइडन प्रशासन ने चीन का मुकाबला करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी हुई है।

अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज में चीन अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक एंड्र्यू मेर्था ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘चीन के उदय, उसके हाल के अंतरराष्ट्रीय व्यवहार और गुजरे वर्षों में ट्रंप प्रशासन के सहयोगी देशों के साथ गठबंधन बनाए रखने की उपेक्षा को देखते हुए बाइडन प्रशासन का रुख पूरी तरह लाजिमी है। जिस रफ्तार से बाइडन प्रशासन ने कदम उठाए हैं, उससे अमेरिका के सहयोगी देशों की अपेक्षा पूरी हुई है।’

यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स में एशिया प्रोग्राम के निदेशक जेन्का ओएर्टेल के मुताबिक चीन के जवाबी कार्रवाई के रूप में यूरोपीय राजनेताओं और अनुसंधानकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने के बाद यूरोप में चीन को लेकर बातचीत का रुख बदल गया है। चीन के राजनयिक और आर्थिक मामलों में अपनी शक्ति जताने को देखते हुए ईयू और अमेरिका में अधिक सहयोग की जरूरत और ज्यादा महसूस की जाने लगी है।

इसके बावजूद नाटो का एशिया प्रशांत क्षेत्र में विस्तार हो पाएगा, जानकार ऐसा नहीं मानते। अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से जुड़े ईयू और नाटो मामलों के जानकार एर्वान लैगाडेक ने कहा है कि हालांकि नाटो सहयोगी चीन से पैदा हो रही चुनौती से वाकिफ हैं, लेकिन नाटो का एशिया में विस्तार होने की संभावना नहीं है।


विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि नाटो के कई सदस्य देशों के पास ऐसी क्षमता नहीं है कि वे प्रशांत महासागर में अपनी नौसेना की तैनाती कर सकें। इसलिए वहां नाटो जैसे ढांचे को खड़ा करने का सारा बोझ अमेरिका को उठाना पड़ सकता है। इसके लिए वह शायद तैयार ना हो।

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