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UN: 'दारफूर की सड़कों पर पड़े शवों पर पांव रखने से बचकर निकलना पड़ा', सूडानी महिलाओं ने यूएन को बताई आपबीती
Fri, 29 Mar 2024 01:36 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Fri, 29 Mar 2024 01:36 PM IST
सार
सूडान के दारफूर क्षेत्र में सेवारत रहीं संयुक्त राष्ट्र की एक पूर्व कर्मचारी ने यूएन न्यूज के साथ बातचीत में भीषण लड़ाई के दौरान अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसी देश चाड में शरण लेने के अनुभव को बयां किया है।
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सूडान में यूएन के कर्मी।
- फोटो : WFP
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विस्तार
सूडान के दारफूर क्षेत्र में सेवारत रहीं संयुक्त राष्ट्र की एक पूर्व कर्मचारी ने, यूएन न्यूज़ के साथ एक बातचीत में, भीषण लड़ाई के दौरान अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसी देश चाड में शरण लेने के अनुभव को बयान किया है। उन्होंने बताया कि सड़कों पर हर तरफ शव बिखरे हुए थे और छतों पर बैठे बंदूकधारी-निशानची, लोगों को निशाना बना रहे थे।
अप्रैल 2023 में सूडानी सशस्त्र बलों और RSF नामक अर्द्धसैनिक बलों के बीच लड़ाई भड़क उठी थी, जिसके बाद से सूडान, विशेष रूप से दारफूर क्षेत्र मानवीय और सुरक्षा संकट से जूझ रहा है। दारफूर में जातीय टकराव ने इस क्षेत्र को पिछले दो दशकों से अधिक समय से जकड़ा हुआ है।
फातिमा*
पश्चिमी दारफूर प्रान्त के अल जिनीना शहर की निवासी हैं और पहले अफ्रीकी संघ व यूएन के साझा मिशन, UNAMID, का हिस्सा रही हैं। इस प्रांत में हजारों लोगों के मारे जाने की खबर है और जब परस्पर विरोधी गुट के लड़ाके शहर पर नियंत्रण की लड़ाई लड़ रहे थे, तभी उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए अपने परिवार के साथ देश की सीमा पार की।
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उन्होंने कहा, “हम 57 दिनों से अधिक समय तक अपने घरों में फंसे हुए थे, जबकि लड़ाके व्यवस्थागत ढंग से जातीय आधार पर लोगों को निशाना बना रहे थे और उनकी हत्या कर रहे थे। उन्होंने महिलाओं, बच्चों और वृद्धजन को भी नहीं बख्शा। छतों पर निशानेबाज़ छिपे हुए थे और किसी भी व्यक्ति के नजर आने पर उसे निशाना बनाया जाता था। जिस तरह से लोगों को जान से मारा गया, उसे बयान नहीं किया जा सकता है।"
दारफूर में दो दशकों के हिंसक टकराव की वजह से हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और उनमें से अनेक की अब शिविरों और अल जिनीना शहर में आवाजाही रहती है। साल की शुरुआत में या फिर रमदान के महीने के दौरान ऐसा होता है, जब हत्याओं, विस्थापन व विध्वंस का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस दौरान लोगों की जिंदगी में व्यवधान आता है और बाजार, स्कूल और सरकारी संस्थान बन्द रहते हैं। फिर जब हमले रुक जाते हैं, तो लोग अपने सामान्य जीवन की ओर लौटने का प्रयास करते हैं। जब पिछले वर्ष अप्रैल महीने में युद्ध भड़का था, तो हमने सोचा कि इस बार भी ऐसा ही होगा, मगर दुर्भाग्यवश, ऐसा हुआ नहीं।
फातिमा ने कहा, "मैंने हथियारबंद पुरुषों को देखा, जिनमें से कुछ विदेशी थे और उन्होंने चारों ओर से हमारे शहर को घेर लिया था। मैं एक पत्रकार के तौर पर तस्वीरें लेने कुछ ऊंचाई वाले स्थान पर गईं और पड़ोसी भी अपने घरों की खिड़कियों से देख रहे थे। मिलिशिया सदस्य गोलियां चला रहे थे और कयामत के दिन के बारे में चिल्लाते हुए कह रहे थे कि पृथ्वी पर मौत व विध्वंस होगा। हम अपने घरों में फंसे हुए थे और हमें, अपने पलंग के नीचे छिपना पड़ा। गोला-बारुद हर जगह बिखरा हुआ था और मैं सड़कों पर लोगों को चीखते हुए और गोलियों की आवाजें सुन सकती थी।
यह युद्ध अल जिनीना के दक्षिणी हिस्से में 57 दिन तक चला और पूरे के पूरे इलाकों का सफाया हो गया। मिलिशिया के लड़ाकों ने व्यवस्थागत ढंग से काम किया। वे लोगों को मारने के लिए घर-घर गए। छतों पर निशानची भी बैठे हुए थे और किसी के भी दिखने पर उसे निशाना बना रहे थे। ये मौत का जैसा दृश्य था, मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती हूं।
हत्याएं-लूटपाट करने वाली टीमें
मिलिशिया ने दो टीमों में काम किया। एक टीम का ध्यान लोगों को जान से मारने पर केंद्रित था, जबकि दूसरी उनकी संपत्ति को लूट रही थी। कुछ बंदूकधारी अरबी भाषा में बात नहीं करते थे, और उन्होंने हमें धमकी दी कि यदि हमने सोना व धन नहीं दिया तो हमें जान से मार दिया जाएगा।
नक़ाब पहने हुए व्यक्तियों ने मेरे घर में प्रवेश किया, और ऐसा प्रतीत हुआ कि उनमें से एक व्यक्ति मुझे जानता था। उसने कहा कि तुम एक पत्रकार हो, तुम अतीत में ख़बरें लिखा करती थीं, मगर अब नहीं लिख सकती हो।
चाड में मिली शरण
उन्होंने बताया- मैंने अपना घर जल्दबाज़ी में छोड़ा था और अपना सारा धन, सोना और अन्य मूल्यवान सम्पत्ति वहीं छोड़ आई थी। इसलिए मैंने कुछ धन उधार लिया और एक कार किराए पर लेकर अपने बेटे व अन्य परिजन के साथ आद्रे पहुंची, जो कि चाड का एक शहर है। पहले दिन हमें वापस लौटना पड़ा चूँकि यह बेहद ख़तरनाक था और अगले दिन जब हमने फिर यात्रा करने की कोशिश तो हथियारबंद लोगों ने हमारी गाड़ी रोककर हमारा सारा सामान लूट लिया।
हम किसी तरह आद्रे में शरणार्थी शिविर तक पहुंच गए, लेकिन कई लोग रास्ते में ही मारे गए। अनेक बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया। चाड की सेना ने अनेक शरणार्थियों और कुछ घायलों को ऐल जिनीना से शिविरों तक पहुंचाने में मदद की और उन्हें भोजन व जल मुहैया कराया। चाड में भी हालात पीड़ादाई थे, लेकिन जो कुछ हमने पहले अनुभव किया था, ये पीड़ा उससे कम थी। मेरी मनोसामाजिक स्थिति बेहद खराब थी।
यदि मुझसे कोई बात करते तो मैं अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती थी। मुझे दिन और समय का भी ज्ञान नहीं रहा, मगर अब मेरी स्थिति बेहतर हो रही है। मैं इसके लिए ईश्वर का आभार प्रकट करती हूं। मेरे पति और अन्य लोग जो, अल जिनीना में ही पीछे छूट गए थे, वे भी दो सप्ताह पहले यहाँ शिविर में पहुंच गए। मेरे पास जो कुछ भी था, मैंने वो सब खो दिया है। मिलिशिया ने हमारे घर में लूटपाट की और हमारा सारा सामान ले लिया, यहाँ तक कि दरवाजे भी। हमने सुना है कि उसे ध्वस्त किया जा रहा है और ईंटे भी ले जाई जा रही हैं। मुझे डर है कि जब हमारी वापसी होगी तो हमें वहां बंजर जमीन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।”
*उनकी पहचान छिपाने के लिए यह उनका वास्तविक नाम नहीं है।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)
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अप्रैल 2023 में सूडानी सशस्त्र बलों और RSF नामक अर्द्धसैनिक बलों के बीच लड़ाई भड़क उठी थी, जिसके बाद से सूडान, विशेष रूप से दारफूर क्षेत्र मानवीय और सुरक्षा संकट से जूझ रहा है। दारफूर में जातीय टकराव ने इस क्षेत्र को पिछले दो दशकों से अधिक समय से जकड़ा हुआ है।
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फातिमा*
पश्चिमी दारफूर प्रान्त के अल जिनीना शहर की निवासी हैं और पहले अफ्रीकी संघ व यूएन के साझा मिशन, UNAMID, का हिस्सा रही हैं। इस प्रांत में हजारों लोगों के मारे जाने की खबर है और जब परस्पर विरोधी गुट के लड़ाके शहर पर नियंत्रण की लड़ाई लड़ रहे थे, तभी उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए अपने परिवार के साथ देश की सीमा पार की।
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उन्होंने कहा, “हम 57 दिनों से अधिक समय तक अपने घरों में फंसे हुए थे, जबकि लड़ाके व्यवस्थागत ढंग से जातीय आधार पर लोगों को निशाना बना रहे थे और उनकी हत्या कर रहे थे। उन्होंने महिलाओं, बच्चों और वृद्धजन को भी नहीं बख्शा। छतों पर निशानेबाज़ छिपे हुए थे और किसी भी व्यक्ति के नजर आने पर उसे निशाना बनाया जाता था। जिस तरह से लोगों को जान से मारा गया, उसे बयान नहीं किया जा सकता है।"
दारफूर में दो दशकों के हिंसक टकराव की वजह से हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और उनमें से अनेक की अब शिविरों और अल जिनीना शहर में आवाजाही रहती है। साल की शुरुआत में या फिर रमदान के महीने के दौरान ऐसा होता है, जब हत्याओं, विस्थापन व विध्वंस का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस दौरान लोगों की जिंदगी में व्यवधान आता है और बाजार, स्कूल और सरकारी संस्थान बन्द रहते हैं। फिर जब हमले रुक जाते हैं, तो लोग अपने सामान्य जीवन की ओर लौटने का प्रयास करते हैं। जब पिछले वर्ष अप्रैल महीने में युद्ध भड़का था, तो हमने सोचा कि इस बार भी ऐसा ही होगा, मगर दुर्भाग्यवश, ऐसा हुआ नहीं।
फातिमा ने कहा, "मैंने हथियारबंद पुरुषों को देखा, जिनमें से कुछ विदेशी थे और उन्होंने चारों ओर से हमारे शहर को घेर लिया था। मैं एक पत्रकार के तौर पर तस्वीरें लेने कुछ ऊंचाई वाले स्थान पर गईं और पड़ोसी भी अपने घरों की खिड़कियों से देख रहे थे। मिलिशिया सदस्य गोलियां चला रहे थे और कयामत के दिन के बारे में चिल्लाते हुए कह रहे थे कि पृथ्वी पर मौत व विध्वंस होगा। हम अपने घरों में फंसे हुए थे और हमें, अपने पलंग के नीचे छिपना पड़ा। गोला-बारुद हर जगह बिखरा हुआ था और मैं सड़कों पर लोगों को चीखते हुए और गोलियों की आवाजें सुन सकती थी।
यह युद्ध अल जिनीना के दक्षिणी हिस्से में 57 दिन तक चला और पूरे के पूरे इलाकों का सफाया हो गया। मिलिशिया के लड़ाकों ने व्यवस्थागत ढंग से काम किया। वे लोगों को मारने के लिए घर-घर गए। छतों पर निशानची भी बैठे हुए थे और किसी के भी दिखने पर उसे निशाना बना रहे थे। ये मौत का जैसा दृश्य था, मैं उसका वर्णन नहीं कर सकती हूं।
हत्याएं-लूटपाट करने वाली टीमें
मिलिशिया ने दो टीमों में काम किया। एक टीम का ध्यान लोगों को जान से मारने पर केंद्रित था, जबकि दूसरी उनकी संपत्ति को लूट रही थी। कुछ बंदूकधारी अरबी भाषा में बात नहीं करते थे, और उन्होंने हमें धमकी दी कि यदि हमने सोना व धन नहीं दिया तो हमें जान से मार दिया जाएगा।
नक़ाब पहने हुए व्यक्तियों ने मेरे घर में प्रवेश किया, और ऐसा प्रतीत हुआ कि उनमें से एक व्यक्ति मुझे जानता था। उसने कहा कि तुम एक पत्रकार हो, तुम अतीत में ख़बरें लिखा करती थीं, मगर अब नहीं लिख सकती हो।
चाड में मिली शरण
उन्होंने बताया- मैंने अपना घर जल्दबाज़ी में छोड़ा था और अपना सारा धन, सोना और अन्य मूल्यवान सम्पत्ति वहीं छोड़ आई थी। इसलिए मैंने कुछ धन उधार लिया और एक कार किराए पर लेकर अपने बेटे व अन्य परिजन के साथ आद्रे पहुंची, जो कि चाड का एक शहर है। पहले दिन हमें वापस लौटना पड़ा चूँकि यह बेहद ख़तरनाक था और अगले दिन जब हमने फिर यात्रा करने की कोशिश तो हथियारबंद लोगों ने हमारी गाड़ी रोककर हमारा सारा सामान लूट लिया।
हम किसी तरह आद्रे में शरणार्थी शिविर तक पहुंच गए, लेकिन कई लोग रास्ते में ही मारे गए। अनेक बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया। चाड की सेना ने अनेक शरणार्थियों और कुछ घायलों को ऐल जिनीना से शिविरों तक पहुंचाने में मदद की और उन्हें भोजन व जल मुहैया कराया। चाड में भी हालात पीड़ादाई थे, लेकिन जो कुछ हमने पहले अनुभव किया था, ये पीड़ा उससे कम थी। मेरी मनोसामाजिक स्थिति बेहद खराब थी।
यदि मुझसे कोई बात करते तो मैं अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती थी। मुझे दिन और समय का भी ज्ञान नहीं रहा, मगर अब मेरी स्थिति बेहतर हो रही है। मैं इसके लिए ईश्वर का आभार प्रकट करती हूं। मेरे पति और अन्य लोग जो, अल जिनीना में ही पीछे छूट गए थे, वे भी दो सप्ताह पहले यहाँ शिविर में पहुंच गए। मेरे पास जो कुछ भी था, मैंने वो सब खो दिया है। मिलिशिया ने हमारे घर में लूटपाट की और हमारा सारा सामान ले लिया, यहाँ तक कि दरवाजे भी। हमने सुना है कि उसे ध्वस्त किया जा रहा है और ईंटे भी ले जाई जा रही हैं। मुझे डर है कि जब हमारी वापसी होगी तो हमें वहां बंजर जमीन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।”
*उनकी पहचान छिपाने के लिए यह उनका वास्तविक नाम नहीं है।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)