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संयुक्त राष्ट्र: पाकिस्तान के आर्म्स कंट्रोल प्रस्ताव के खिलाफ भारत-इस्राइल ने की वोटिंग, रूस ने भी छोड़ा साथ
Thu, 05 Nov 2026 04:45 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Thu, 05 Nov 2026 04:45 PM IST
सार
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और बेलारूस के पारंपरिक हथियार नियंत्रण प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इस्राइल ने भी विरोध किया। भारत का मानना है कि हथियारों पर नियंत्रण वैश्विक मुद्दा है और देशों की सुरक्षा चिंताएं क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं। दोनों देशों ने साझा रणनीति से इनकार किया।
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स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
भारत ने क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान की ओर से पेश किए गए संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। भारत का लंबे समय से यह रुख रहा है कि हथियारों का नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है और सुरक्षा संबंधी चिंताएं उप-क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे तक जाती हैं।
किसने विरोध किया?
इस हफ्ते भारत और इस्राइल, दोनों ने ही इस प्रस्ताव का विरोध किया, लेकिन संबंधित लोगों ने दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के राजनयिक तालमेल की बात को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इस समान वोटिंग को 'संयुक्त रुख' बताना, "मामले की गहरी समझ की भारी कमी' को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में 'पारंपरिक संतुलन' की धारणा नई दिल्ली को स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने इस संदर्भ में क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण (1993), पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण (1999) और पारंपरिक विश्वास-निर्माण उपायों (2017) पर निरस्त्रीकरण आयोग के दिशानिर्देशों का हवाला दिया।
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कितने वोट पक्ष में पड़े?
पाकिस्तान और बेलारूस द्वारा संयुक्त रूप से पेश किए गए इस प्रस्ताव का शीर्षक 'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण: क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण' था। इसे सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति ने मंजूरी दी, जिसमें 180 वोट पक्ष में पड़े, दो वोट विरोध में आए, और किसी ने भी वोटिंग से परहेज नहीं किया।
इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने यह भी कहा कि इस प्रस्ताव पर भारत का रुख उसके अपने राष्ट्रीय हितों और चिंताओं पर आधारित था। नई दिल्ली ने इस मामले में किसी के साथ कोई तालमेल नहीं किया था।
जानकारों ने क्या कहा?
एक व्यक्ति ने बताया, 'संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की पहली समिति में 'क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण' से जुड़े प्रस्ताव पर भारत का रुख पिछले लगभग तीन दशकों से एक जैसा ही रहा है। इस प्रस्ताव को पेश करने में पाकिस्तान मुख्य प्रायोजक (लीड स्पॉन्सर) है। हमारा मानना है कि पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है। देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं क्षेत्रीय या उप-क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं।'
उस व्यक्ति ने कहा कि भारत हर साल पहली समिति में अपना यह पक्ष रखता रहा है। इस साल भी उसने ऐसा ही किया। एक दूसरे व्यक्ति ने बताया कि इस प्रस्ताव को सभी का समर्थन हासिल नहीं है, और अपनी आपत्तियों को लेकर भारत अकेला नहीं है। उन्होंने बताया कि इस प्रस्ताव के मुख्य हिस्से, यानी 'ऑपरेटिव पैराग्राफ-2' के खिलाफ इस साल अमेरिका ने वोट दिया।
उस व्यक्ति ने आगे कहा कि रूस और यूरोपीय संघ के अधिकांश सदस्य देशों के साथ-साथ लगभग 50 अन्य देशों ने भी वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया (यानी वे तटस्थ रहे)। इससे पता चलता है कि कई देश भी यही मानते हैं कि इस प्रस्ताव को व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं है।
उस व्यक्ति ने कहा कि अगर कोई अन्य देश इस प्रस्ताव पर अपने वोट में बदलाव करता है, तो इसके पीछे उसके अपने राष्ट्रीय हित और चिंताएं होती हैं। उनका इशारा संभवतः भारत और इस्राइल की ओर था, जिन्होंने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया है।
ये फैसले हमारे साथ मिलकर नहीं लिए गए थे
एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'ये फैसले हमारे साथ मिलकर नहीं लिए गए थे, और न ही हमारी तरफ से ऐसा करने के लिए कहा गया था। अगर कोई अन्य देश इस प्रस्ताव पर वोट देता है, तो उसे हमारा साझा रुख या आपसी तालमेल समझना, गहरी समझ की कमी को दर्शाता है।' उन्होंने कहा, 'हमारा सुझाव है कि कोई भी राय बनाने से पहले, इस प्रस्ताव पर पिछले वर्षों में हुई वोटिंग के रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए।'
प्रस्ताव में क्या है?
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण पर मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तर पर काम करने की जरूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि 'शीत युद्ध' (कोल्ड वॉर) के बाद के दौर में शांति और सुरक्षा के लिए पैदा होने वाले ज्यादातर खतरे, मुख्य रूप से एक ही क्षेत्र या उप-क्षेत्र में स्थित देशों के बीच से ही आते हैं।
इसमें इस बात पर भी जोर दिया गया है कि ऐसे समझौतों को बढ़ावा दिया जाए, जिनका मकसद क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूत करना हो, और वह भी हथियारों और सैन्य बलों को कम से कम संभव स्तर पर रखते हुए।
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किसने विरोध किया?
इस हफ्ते भारत और इस्राइल, दोनों ने ही इस प्रस्ताव का विरोध किया, लेकिन संबंधित लोगों ने दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के राजनयिक तालमेल की बात को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इस समान वोटिंग को 'संयुक्त रुख' बताना, "मामले की गहरी समझ की भारी कमी' को दर्शाता है।
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उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में 'पारंपरिक संतुलन' की धारणा नई दिल्ली को स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने इस संदर्भ में क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण (1993), पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण (1999) और पारंपरिक विश्वास-निर्माण उपायों (2017) पर निरस्त्रीकरण आयोग के दिशानिर्देशों का हवाला दिया।
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कितने वोट पक्ष में पड़े?
पाकिस्तान और बेलारूस द्वारा संयुक्त रूप से पेश किए गए इस प्रस्ताव का शीर्षक 'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण: क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण' था। इसे सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति ने मंजूरी दी, जिसमें 180 वोट पक्ष में पड़े, दो वोट विरोध में आए, और किसी ने भी वोटिंग से परहेज नहीं किया।
इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने यह भी कहा कि इस प्रस्ताव पर भारत का रुख उसके अपने राष्ट्रीय हितों और चिंताओं पर आधारित था। नई दिल्ली ने इस मामले में किसी के साथ कोई तालमेल नहीं किया था।
जानकारों ने क्या कहा?
एक व्यक्ति ने बताया, 'संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की पहली समिति में 'क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण' से जुड़े प्रस्ताव पर भारत का रुख पिछले लगभग तीन दशकों से एक जैसा ही रहा है। इस प्रस्ताव को पेश करने में पाकिस्तान मुख्य प्रायोजक (लीड स्पॉन्सर) है। हमारा मानना है कि पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है। देशों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं क्षेत्रीय या उप-क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं।'
उस व्यक्ति ने कहा कि भारत हर साल पहली समिति में अपना यह पक्ष रखता रहा है। इस साल भी उसने ऐसा ही किया। एक दूसरे व्यक्ति ने बताया कि इस प्रस्ताव को सभी का समर्थन हासिल नहीं है, और अपनी आपत्तियों को लेकर भारत अकेला नहीं है। उन्होंने बताया कि इस प्रस्ताव के मुख्य हिस्से, यानी 'ऑपरेटिव पैराग्राफ-2' के खिलाफ इस साल अमेरिका ने वोट दिया।
उस व्यक्ति ने आगे कहा कि रूस और यूरोपीय संघ के अधिकांश सदस्य देशों के साथ-साथ लगभग 50 अन्य देशों ने भी वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया (यानी वे तटस्थ रहे)। इससे पता चलता है कि कई देश भी यही मानते हैं कि इस प्रस्ताव को व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं है।
उस व्यक्ति ने कहा कि अगर कोई अन्य देश इस प्रस्ताव पर अपने वोट में बदलाव करता है, तो इसके पीछे उसके अपने राष्ट्रीय हित और चिंताएं होती हैं। उनका इशारा संभवतः भारत और इस्राइल की ओर था, जिन्होंने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया है।
ये फैसले हमारे साथ मिलकर नहीं लिए गए थे
एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'ये फैसले हमारे साथ मिलकर नहीं लिए गए थे, और न ही हमारी तरफ से ऐसा करने के लिए कहा गया था। अगर कोई अन्य देश इस प्रस्ताव पर वोट देता है, तो उसे हमारा साझा रुख या आपसी तालमेल समझना, गहरी समझ की कमी को दर्शाता है।' उन्होंने कहा, 'हमारा सुझाव है कि कोई भी राय बनाने से पहले, इस प्रस्ताव पर पिछले वर्षों में हुई वोटिंग के रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए।'
प्रस्ताव में क्या है?
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण पर मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तर पर काम करने की जरूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि 'शीत युद्ध' (कोल्ड वॉर) के बाद के दौर में शांति और सुरक्षा के लिए पैदा होने वाले ज्यादातर खतरे, मुख्य रूप से एक ही क्षेत्र या उप-क्षेत्र में स्थित देशों के बीच से ही आते हैं।
इसमें इस बात पर भी जोर दिया गया है कि ऐसे समझौतों को बढ़ावा दिया जाए, जिनका मकसद क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूत करना हो, और वह भी हथियारों और सैन्य बलों को कम से कम संभव स्तर पर रखते हुए।