खतरे में सबसे बड़ा सैन्य गठजोड़!: फिनलैंड-स्वीडन के बहाने पूरे नाटो से बदला ले रहे हैं टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन
एर्दोआन का आरोप है कि फिनलैंड और स्वीडन ने टर्की की अलगाववादी कुर्द पार्टी पीकेके के सदस्यों को पनाह दे रखी है। पीकेके कुर्द बहुल इलाकों को टर्की से अलग कर स्वतंत्र देश बनाना चाहती है। इसके लिए वह दशकों से टर्की के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई में शामिल रही है...
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फिनलैंड और स्वीडन की नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) में शामिल होने की मंशा पर टर्की पानी फेरता नजर आ रहा है। इससे नाटो के सदस्य देश सकते में हैं। नाटो में किसी नए देश को सदस्यता देने जैसे अहम फैसले सर्व-सम्मति से होते हैं। इसलिए किसी एक सदस्य देश के सहमत न होने पर भी फैसला ठहर जाता है।
टर्की के राष्ट्रपति रजिब तैयिब एर्दोआन ने गुरुवार को दो टूक कह दिया कि वे नाटो में शामिल होने की इन दोनों देशों की योजना को ठुकरा देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि ये दोनों देश एक तरह से ‘आतंकवादियों का गेस्टहाउस’ रहे हैं। इसके पहले बुधवार को फिनलैंड और स्वीडन ने नाटो में शामिल होने की अर्जी औपचारिक रूप से दी थी। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद बने माहौल में इन दोनों देशों ने ये फैसला किया है।
दोनों देशों पर पीकेके को पनाह देने का आरोप
नाटो की स्थापना 1949 में हुई थी। टर्की 1952 में इसमें शामिल हुआ था। इस सैन्य संगठन में शामिल देशों के बीच सबसे बड़ी सेना के लिहाज से टर्की का दूसरा स्थान है। एर्दोआन का आरोप है कि फिनलैंड और स्वीडन ने टर्की की अलगाववादी कुर्द पार्टी पीकेके के सदस्यों को पनाह दे रखी है। पीकेके कुर्द बहुल इलाकों को टर्की से अलग कर स्वतंत्र देश बनाना चाहती है। इसके लिए वह दशकों से टर्की के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई में शामिल रही है। पीकेके को टर्की के अलावा अमेरिका और यूरोपियन यूनियन ने भी आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल रखा है।
विश्लेषकों के मुताबिक पीकेके के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के रुख से टर्की लंबे समय से नाराज रहा है। उसकी शिकायत रही है कि इन देशों ने कुर्द अलगाववादियों से लड़ाई में टर्की का साथ नहीं दिया है। स्वीडन पर टर्की का पहले से आरोप रहा है कि उसने कुर्द उग्रवादियों को अपने यहां पनाह दे रखी है। साथ ही उत्तरी सीरिया में उसने टर्की विरोधी गुटों की मदद की है। इन गुटों को टर्की पीकेके का ही हिस्सा समझता है।
टर्की का कहना है कि उसने कई बार फिनलैंड और स्वीडन के पास वहां मौजूद कुर्द उग्रवादियों के प्रत्यर्पण की अर्जी भेजी, लेकिन दोनों देशों ने कोई जवाब नहीं दिया। बताया जाता है कि इन दोनों देशों में फेटो नाम के गुट से जुड़े कुछ लोग भी मौजूद हैं। फेटो अमेरिका में रहने वाले मौलवी फेतुल्लाह गुलेन का संगठन है। टर्की का आरोप है कि इस गुट ने 2016 में एर्दोआन का तख्ता पलटने की कोशिश की थी।
स्पष्टीकरण देगा स्वीडन
फिनलैंड और स्वीडन की प्रतिक्रिया से संकेत मिला है कि एर्दोआन के सख्त रुख के बावजूद उन्होंने नाटो में शामिल होने की उम्मीद नहीं छोड़ी है। स्वीडन के विदेश मंत्री मिकाल डेमबर्ग गुरुवार को कहा कि उनका देश आतंकवाद का दोस्त नहीं है। इसलिए जो अनिश्चितताएं पैदा हुई हैं, उन पर स्वीडन स्पष्टीकरण पेश करेगा। उन्होंने कहा कि ईयू की तरह की उनका देश भी पीकेके को आतंकवादी संगठन मानता है।
विश्लेषकों के मुताबिक एर्दोआन की पश्चिमी देशों से जो पुरानी नाराजगी है, इस मुद्दे पर वे उसका बदला ले रहे हैं। थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल में सीनियर पॉलिसी फेलॉ अस्ली आईदिन्तेस्बास एक टिप्पणी में लिखा है- ‘ये मुद्दा सिर्फ स्वीडन और फिनलैंड से संबंधित नहीं है। एर्दोआन इस मौके का फायदा नाटो के वर्तमान सदस्यों के प्रति अपनी पुरानी शिकायत का बदला लेने के लिए उठा रहे हैं। खास कर उनकी शिकायत बाइडन प्रशासन से है, जिसने टर्की से दूरी बनाए रखी है।’