जो बाइडन की वादाखिलाफी: ऑकुस गठबंधन से खट्टे हुए यूरोप के साथ अमेरिका के रिश्ते
विश्लेषकों का कहना है कि अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाने का अमेरिका ने जिस एकतरफा ढंग से फैसला लिया, उससे ईयू में पहले से नाराजगी थी। राष्ट्रपति बनने के बाद बाइडेन ने कहा था कि सहभागिता के साथ कदम उठाने के लिहाज से ‘अमेरिका अब वापस आ गया है।’ लेकिन उनका अब तक का काम पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिकी फर्स्ट’ नीति की तरह ही चल रहा है...
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ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, और अमेरिका का नया त्रिगुट (ऑकुस- ऑस्ट्रेलिया- यूनाइटेड किंगडम- यूनाइटेड स्टेट्सः एयूकेयूएस) बनाने की अचानक की गई घोषणा से यूरोप में गहरी नाराजगी है। इसे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की वादाखिलाफी माना जा रहा है। यूरोपियन यूनियन (ईयू) में आम धारणा बनी है कि उसे अंधेरे में रखते हुए अमेरिका ने ये करार कर लिया। इससे चीन विरोधी मुहिम में सबको साथ लेकर चलने का उनका वादा बेबुनियाद साबित हो गया है।
इससे सबसे ज्यादा नाराजगी फ्रांस में देखी गई है। ये समझौता फ्रांस के साथ ऑस्ट्रेलिया के पहले हुए परमाणु पनडुब्बी निर्माण के करार की कीमत पर हुआ है। फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-यवेस ली दारियां ने इसे “फ्रांस की पीठ में छुरा मारना” बताया।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन कूटनीतिक संपादक पैट्रिक विंटॉर ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा है- ‘इस रक्षा समझौते पर फ्रांस का आक्रोश ही अकेला विवाद नहीं है। इससे चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका और यूरोप के गठजोड़ पर सवाल खड़ा हो गया है।’ गुरुवार को अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने जिस डील का एलान किया, उसके तहत अमेरिकी तकनीक से ऑस्ट्रेलिया में आठ परमाणु हथियार क्षमता से लैस पनडुब्बियां बनाई जाएंगी।
ईयू के मुख्यालय ब्रसेल्स में अधिकारियों ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा कि नए समझौते का एलान उस वक्त किया गया, जब ईयू के विदेश मंत्रालय संबंधी प्रतिनिधि ईयू की इंडो-पैसिफिक रणनीति का एलान करने वाले थे। इसीलिए इसे यहां एक ‘अशिष्ट’ तरीका समझा गया है। फ्रांस तो इस घटना से इतना नाराज हुआ कि उसने वाशिंगटन के अपने दूतावास में आयोजित एक रिसेप्शन समारोह रद्द कर दिया। ये समारोह अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के समय फ्रांस की ब्रिटेन पर नौसैनिक विजय की सालगिरह पर आयोजित किया गया था। समझा जाता है कि फ्रांस की उस जीत से अमेरिकी आजादी की लड़ाई को बड़ी मदद मिली थी।
सीएनएन ने एक रिपोर्ट में बताया है कि ब्रसेल्स स्थित अधिकारी अब चिंतित हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस टीवी चैनल से कहा- ‘अंग्रेजी भाषी राज्य, जो चीन के खिलाफ बहुत आक्रामक रहे हैं, उन्होंने अपना गठबंधन बना लिया है।’ अधिकारी ने कहा कि इन्हीं देशों ने अफगानिस्तान और इराक पर हमलों की पहल की थी। उसने कहा- ‘उसके क्या नतीजे रहे, हम जानते हैं।’
विश्लेषकों का कहना है कि अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाने का अमेरिका ने जिस एकतरफा ढंग से फैसला लिया, उससे ईयू में पहले से नाराजगी थी। अब उसके ऑकुस गठबंधन बना लेने से ईयू देशों का गुस्सा फूट पड़ा है। ईयू अधिकारियों ने ध्यान दिलाया है कि राष्ट्रपति बनने के बाद बाइडेन ने कहा था कि सहभागिता के साथ कदम उठाने के लिहाज से ‘अमेरिका अब वापस आ गया है।’ लेकिन उनका अब तक का काम पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिकी फर्स्ट’ नीति की तरह ही चल रहा है। फ्रांस के विदेश मंत्री ने ऑकुस के गठन पर अपनी दी गई आक्रोश भरी प्रतिक्रिया में कहा कि उन्हें ट्रंप की याद आ गई है।
थिंक टैंक ऑस्ट्रियन इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी की निदेशक वेलिना तचाकारोवा ने सीएनएन से कहा- ‘ये तथ्य कि ईयू के बजाय अमेरिका ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने सुरक्षा संबंधों में अधिक राजनीतिक पूंजी लगाना चाहता है, काफी कुछ साफ कर देता है। इसका अर्थ यह है कि ईयू को पहले इंडो-पैसिफिक में अपनी ताकत बनानी पड़ेगी, तभी उसके अंग्रेजी भाषी सहयोगी देश उसे गंभीरता से लेंगे।’